आज की युवा और अधेड़ पीढ़ी के एक बड़े वर्ग को दूरदर्शन का वो ज़माना याद होगा जब डीडी-1 और डीडी-2 हुआ करते थे. डी से पहले की सी और डीडी के बीच की वी तब नहीं हुआ करती थी. फिल्मों के मामले में सब अज्ञानी थे. फिल्म की शुरुआत में नीचे से ऊपर की ओर हिन्दी-अंग्रेजी में चलने वाले नामों से तय होता था कि फिल्म देखे जाने लायक है या नहीं. अमरीश पुरी और ओम पुरी ऐसे ही दो नाम थे, जो तय करते थे कि अगले तीन घंटे टीवी के आगे बीतने हैं. अमरीश पुरी का नाम आते ही कोई तो बोल ही देता था- ‘ओ बेट्टे! अमरीश पुरी’.

यह आवाज कानों में पड़ती और आंखें और ज्यादा चौड़ी हो जातीं. एक बार और थोड़े हिल-डुलकर एकाग्र मुद्रा में बैठ जाते और फिर शुरू होता सिनेमा. बुरे आदमी का पर्याय बनकर उभरे अमरीश पुरी उसी जमाने के विलेन हैं. आज का सिनेमा तो विलेनविहीन है. अमरीश पुरी संभवतः आखिरी विलेन थे. शायद यही वजह है कि आज भी अगर आप गूगल से पूछेंगे- सबसे बड़ा विलेन कौन, तो पहला नाम आएगा अमजद खान और दूसरा अमरीश पुरी. यह तो दुनिया जानती है कि जिस तरह अमजद खान गब्बर के नाम से लोगों के दिल-दिमाग में बैठे, ठीक वैसे ही अमरीश पुरी मोगैंबो के नाम से.

दरअसल, यह उस लंबे-चौड़े कद काठी के आदमी की बेहद दमदार, रौबदार और कड़क आवाज़ में बेहतरीन संवाद अदायगी का असर था जो आज भी उस दौर के तमाम लोगों के ज़ेहन में जिंदा है. क्या गोल-गोल अंगूठियों के साथ गोल-गोल टोपी के नीचे गोटियों की तरह गोल-गोल आंखें घुमाने वाला कोई और एक्टर याद आता है? (आशुतोष राणा और इरफान खान को छोड़कर) यह अमरीश पुरी के अंग-प्रत्यंग में भरी अदाकारी और उसकी अदायगी का हुनर था जो आज तक पर्दे पर दोबारा कभी दिखाई न दे सका. जिसे देखकर आज भी नाट्य विद्यालयों में रियाज किए जाते हैं. खुद अमरीश पुरी अपनी आवाज पर रोजाना तीन-चार घंटे रियाज किया करते थे. आखिर यूं ही तो कोई अमरीश पुरी नहीं हुआ करता.

अपनी अदाकारी के शैशव काल में ही जब हॉलीवुड निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग ने उनसे अपनी फिल्म के लिए अमेरिका आकर स्क्रीन टेस्ट देने को कहा तो उन्होंने साफ इनकार कर दिया था

अमरीश पुरी के संवादों की एक और ख़ासियत थी. वे एक दृढ़ निश्चयी व्यक्ति के संवाद लगते थे. उनकी अदायगी के लिए अमरीश पुरी जितने ही आत्मविश्वास की जरूरत थी. ‘डॉन्ग कभी रॉन्ग नहीं होता’ ऐसा ही एक संवाद है. अमरीश पुरी के संवादों से ही उनकी अदाकारी में छिपे विरोधाभास और वैविध्य को देखा-समझा-महसूसा जा सकता है. अगर आप उनके संवादों पर गौर करें तो उनमें एक दर्शन और सामाजिक ढांचा भी दिखाई देता है. डीडीएलजे का वो संवाद - ‘जा सिमरन जी ले अपनी जिंदगी’ तो आज तक छोटी-छोटी बातों में दोहरा लिया जाता है. बेटी अपनी पसंद के लड़के से शादी करना चाहती है और एक हिंदुस्तानी बाप लाख सोचने के बाद उसका हाथ छोड़ते हुए कहता है- जा जी ले अपनी जिंदगी. यह सामाजिक ढांचा ही तो है जो आज भी बेटी को अपनी पसंद का लड़का चुनने से रोकता है. यह दर्शन ही तो है कि लड़की उससे शादी करेगी जिससे उसका मन मिलता है तो अपनी जिंदगी और भी जिंदादिली और उत्साह के साथ जी सकेगी.

डीडीएलजे का ही वो संवाद जब अमरीश पुरी अमेरिका में कबूतरों को चुग्गा डालते हुए खुद से कहते हैं - ‘जरूरतों ने पर काट दिए हैं, रोटी पांव की जंजीर बन गई है.’ फिल्म दीवाना का संवाद - ‘ये दौलत भी क्या चीज है, जिसके पास जितनी भी आती है, कम ही लगती है.’ परदेस का - ‘अमरीका में प्यार का मतलब है लेन-देन. लेकिन हिंदुस्तान में प्यार का मतलब है सिर्फ देना, देना, देना.’ इन संवादों में पूरी हिंदुस्तानी संस्कृति निहित है. इनकी अदायगी के लिए रग-रग में हिंदुस्तान होना पहली शर्त है. शायद यही वजह थी कि अमरीश पुरी पेशेवर गायक न होते हुए भी ‘आई लव माय इंडिया’ उतनी ही शिद्दत से गा सके और अपनी अदाकारी के शैशव काल में ही जब हॉलीवुड निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग ने उनसे अपनी फिल्म के लिए अमेरिका आकर स्क्रीन टेस्ट देने को कहा तो उन्होंने साफ इनकार कर दिया था. आखिर स्पीलबर्ग को हिंदुस्तान आना पड़ा और पहले ही झटके में उन्होंने अमरीश पुरी को साइन कर लिया. ‘इंडियाना जोन्स एंड द टेंपल ऑफ डूम’ में अमरीश पुरी पहली बार गंजे हुए और फिर उन्होंने इसे ही अपना स्टाइल बना लिया.

जुनून और जिजीविषा दो ऐसी चीजें हैं जो अमरीश पुरी से सीखी जा सकती हैं. वे मुंबई आए हीरो बनने आए थे. पहले ही स्क्रीन टेस्ट में फेल हुए. सगे भाई मदनपुरी ने भी कह दिया कि अपने दम पर अपनी जगह बनानी होगी. 20 साल तक कर्मचारी राज्य बीमा निगम में सरकारी नौकरी करते रहे पर जुनून नहीं छोड़ा. नौकरी के साथ-साथ अभिनय जारी रखा. गिरीश कर्नाड और सत्यदेव दुबे के लिखे नाटकों में खुद को मांजते रहे. गिरीश कर्नाड का नाटक हयवदन तो इंदिरा गांधी तक ने रुककर पूरा देखा था. 1970 में प्रेेम पुजारी में एक छोटी सी भूमिका से शुरू हुई उनकी फिल्म यात्रा ‘रेशमा और शेरा’, ‘निशांत’ और ‘मंथन’ से आगे बढ़ती रही. 1980 में ‘आक्रोश’ आई और 1982 में ‘विधाता’. फिर तो जगावर चौधरी से लेकर मोगैंबो और बलवंत राय तक उनके कितने ही किरदार अमिट छाप बन गए.

बॉलीवुड में जितना डरावना खलनायक, उतना ही अलहदा नायक यदि कोई हुआ है तो वो इकलौता अमरीश पुरी ही है. 21 फिल्मों में उनके साथ काम कर चुके रजा मुराद खुद कह चुके हैं, ‘जैसे एक अमिताभ बच्चन हैं तो वैसे ही एक अमरीश पुरी हैं.’