जिन पांच राज्यों में फिलहाल चुनाव होने हैं, उनमें उत्तराखंड ही एकमात्र ऐसा है जहां मुख्य लड़ाई सीधे कांग्रेस और भाजपा के बीच है. अभी तक जो चुनावी सर्वेक्षण आए हैं, उनमें भाजपा को इस राज्य में बहुमत मिलता दिख रहा है. लेकिन इसके बावजूद भी अगर यहां भाजपा काफी चिंतित नज़र आती है तो उसके कुछ ठोस कारण हैं:

भाजपा के गले की हड्डी बने बागी:

प्रदेश में विधानसभा की कुल 70 सीट हैं. अधिकतर सर्वेक्षण दर्शा रहे हैं कि इस चुनाव में भाजपा को 33 से 40 सीट मिल सकती हैं. लेकिन यह स्थिति तब है जब हाल ही भाजपा में शामिल हुए दस कांग्रेसी बागियों को भाजपा के टिकट से जीतता हुआ दर्शाया जा रहा है. वरिष्ठ पत्रकार शिव प्रसाद सेमवाल बताते हैं, ‘सर्वेक्षणों के जो आंकड़े भाजपा को बहुमत मिलता दर्शा रहे हैं, वे यह भी साबित कर रहे हैं कि भाजपा अपने बूते आज भी बहुत पीछे है. यदि कांग्रेस से आए बागियों को हटा दिया जाए, तो इन्हीं आंकड़ों के अनुसार भाजपा बहुमत से बहुत पीछे दिख रही है.’

बागियों को हटाने की जो बात शिव प्रसाद सेमवाल कर रहे हैं, वही भाजपा में भी सबसे बड़ी चिंता का विषय है. अधिकतर बागी आज भाजपा के गले में फंसी ऐसी हड्डी बन गए हैं जो न निगलते बनती है न उगलते. हरक सिंह रावत, कुंवर प्रणव ‘चैंपियन’, सुबोध उनियाल, विजय बहुगुणा, प्रदीप बत्रा, उमेश शर्मा ‘काऊ’, रेखा आर्य और शैलेंद्र मोहन सिंघल इतने मजबूत प्रत्याशी माने जाते हैं कि इनका किसी भी सूरत में जीत कर आना लगभग तय है. ऐसे में यदि भाजपा इन्हें टिकट नहीं देती है तो यह उसके लिए आत्मघाती कदम माना जा रहा है. दूसरी तरफ हाल ही में पार्टी में शामिल हुए इन लोगों को टिकट देने का मतलब है अपनी पार्टी के सालों पुराने कार्यकर्ताओं और टिकट के दावेदारों को नाराज़ करना. और फिर इन पर चुनाव के बाद भरोसा करना भी उतना आसान नहीं है.

टिकट बंटवारे की समस्या भाजपा के लिए इसलिए भी गहरा गई है क्योंकि कुल 70 सीटों के लिए भाजपा में ढाई हजार से ज्यादा लोगों ने दावेदारी ठोकी है. और इनमें भी सबसे ज्यादा दावेदारियां बागी प्रत्याशियों वाली सीटों पर ही की गई हैं. ऐसी प्रत्येक सीट पर भाजपा में 40 से ज्यादा दावेदार खड़े हो गए हैं. वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत बताते हैं, ‘किसी भी सीट पर एक पार्टी में कम से कम तीन मजबूत दावेदार तो होते ही हैं. अब यदि भाजपा बाहर से आए बागियों को दस टिकट देती है तो इसका मतलब है वह अपने तीस मजबूत दावेदारों को नाराज़ करती है. इसका नुकसान अंततः भाजपा को ही झेलना पड़ेगा.’

हरीश रावत का स्थानीय तोड़ निकालना मुश्किल:

बागियों के अलावा भाजपा के लिए चिंता का दूसरा बड़ा कारण है उसके पास कोई स्थानीय चेहरा न होना. जो सर्वेक्षण प्रदेश में भाजपा को बहुमत मिलता दिखा रहे हैं, वही यह भी बता रहे हैं कि आज भी बतौर मुख्यमंत्री प्रदेशवासियों की पहली पसंद हरीश रावत ही हैं. जानकारों का मानना है कि बीते साल के अंत में प्रदेश में जो राजनीतिक उठापटक हुई, कांग्रेस में जो फूट पड़ी, जिस तरह से राष्ट्रपति शासन लगाया गया और जैसे न्यायालय ने राष्ट्रपति शासन को गलत बताते हुए सरकार की बहाली की, उसका लाभ अंततः हरीश रावत को ही हुआ. वे कांग्रेस का निर्विरोध चेहरा बन गए और कई लोगों की सहानुभूति उनसे जुड़ गई.

शिव प्रसाद सेमवाल बताते हैं, ‘हरीश रावत पिछले तीन महीने से पूरी तरह चुनावी मोड में उतर आए थे और चुनावी रणनीति तैयार करने लगे थे. बीते कुछ समय से जो जगह-जगह ‘सबकी चाहत, हरीश रावत’ के नारे दिखाई दे रहे हैं, वे उसी रणनीति के तहत है. हरीश रावत ने चुनावों की कमान पूरी तरह से अपने हाथों में काफी समय पहले ही ले ली थी और आज वे कांग्रेस का एकमात्र चेहरा बन गए हैं.’ इसके उलट भाजपा में मुख्यमंत्री पद के दावेदार तो कई हैं लेकिन इनमें एक भी ऐसा नाम नहीं है जिसपर सभी सहमत दिखते हों.

पत्रकार जय सिंह रावत बताते हैं, ‘भाजपा में रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, भगत सिंह कोश्यारी और भुवन चंद्र खंडूड़ी ऐसे नाम हैं जो पहले भी मुख्यमंत्री रह चुके हैं और आज भी इस पद की मुख्य दौड़ में शामिल हैं. लेकिन इनमें से किसी एक नाम पर सहमति बनाना आज पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है. ऊपर से अब सतपाल महाराज, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट और प्रवक्ता अनिल बलूनी भी मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदारी ठोक रहे हैं. इसलिए भाजपा किसी एक नाम पर चुनावों से पहले ही मोहर लगाने से बच रही है.’

पिछला चुनाव जहां भाजपा ने पूरी तरह ‘खंडूड़ी है जरूरी’ के नारे के साथ लड़ा था, वहीँ इस चुनाव में भाजपा किसी भी स्थानीय नेता को चेहरा बनाने से बच रही है. भाजपा के तमाम नेता और प्रवक्ता सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर ही जनता से वोट मांगते नज़र आ रहे हैं. कई लोग इसे हरीश रावत की पहली सफलता के रूप में भी देख रहे हैं कि उन्होंने इस चुनाव को इस हद तक तो अपने पक्ष में कर ही लिया है कि भाजपा को उनके मुकाबले अपने प्रधानमंत्री को चेहरा बनाना पड़ रहा है. जय सिंह रावत बताते हैं, ‘प्रदेश का चुनाव कुछ समय पहले तक ‘हरीश रावत बनाम अन्य’ लग रहा था लेकिन अब यह ‘हरीश रावत बनाम नरेंद्र मोदी’ हो रहा है. यह भी तय है कि यहां जो वोट पड़ेंगे वो कांग्रेस या भाजपा से ज्यादा हरीश रावत के पक्ष में या उनके विरोध में पड़ेंगे.’

स्थानीय मुद्दों पर न बोल सकने की मजबूरी:

भाजपा ने उत्तराखंड में चुनावों की तैयारी तो काफी पहले शुरू कर दी थी लेकिन इसमें स्थानीय नेताओं के नेतृत्व के साथ ही स्थानीय मुद्दों का भी टोटा बना हुआ है. हाल ही में जब प्रधानमंत्री मोदी चुनाव प्रचार के लिए राजधानी देहरादून आए थे तो उन्होंने स्थानीय मुद्दों को उठाने की कोशिश भी की लेकिन उनका यह दांव उल्टा पड़ गया. अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने प्रदेश सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, ‘आपने सुना होगा कि आदमी पैसा खाता है, मार लेता है. पर उत्तराखंड में तो स्कूटर भी पैसा खा जाता है. पांच लीटर की टंकी में यहां 35 लीटर तेल डाला गया.’ प्रधानमंत्री मोदी जब यह बोल रहे थे तो मंच पर उनके साथ बैठे भाजपा नेताओं की स्थिति ‘काटो तो खून नहीं’ जैसी हो गई थी. कारण यह था कि आपदा के दौरान हुए जिस घोटाले का जिक्र प्रधानमंत्री कर रहे थे, उस दौरान प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा थे जो अब भाजपा में शामिल हैं और भाषण के दौरान वे भी प्रधानमंत्री के साथ मंच साझा कर रहे थे.

प्रधानमंत्री द्वारा कही गई ‘स्कूटर में तेल’ वाली बात ही उनकी रैली का मुख्य विषय बन गई जिसके चलते उनकी रैली में उमड़ा विशाल जनसैलाब भी गौण हो गया. अगले दिन की सुर्ख़ियों में भीड़ से ज्यादा चर्चा इसी मुद्दे की रही जिसका सीधा फायदा कांग्रेस को मिला.

भाजपा के पास स्थानीय मुद्दों का इसलिए भी टोटा है क्योंकि कांग्रेस के अधिकतर विवादित विधायक और मंत्री तो अब भाजपा में ही शामिल हो चुके हैं. इसलिए जिन मुद्दों पर वह कांग्रेस को घेर सकती थी, वह मुद्दे अब भाजपा के ही गले की फांस बन रहे हैं. कई जानकार यह भी मानते हैं कि जो सत्ता-विरोधी लहर असल में कांग्रेस को झेलनी थी, वह अब बागी विधायकों को शामिल करने के चलते भाजपा को भी झेलनी पड़ सकती है.

हालांकि स्थानीय स्तर पर भुनाने के लिए भाजपा के पास यह मुद्दा जरूर है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में देश की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार लगभग सभी महत्वपूर्ण पदों पर उत्तराखंड के ही लोगों को चुना गया है. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, नए आर्मी चीफ बिपिन रावत और नए रॉ प्रमुख अनिल कुमार धस्माना, तीनों ही उत्तराखंड से आते हैं. लेकिन ये तीनों ही लोग गढ़वाल क्षेत्र से आते हैं जहां भाजपा को पहले से ही मजबूत माना जा रहा है.

दरअसल कांग्रेस में हुई बगावत में जो विधायक शामिल थे, लगभग वे सभी गढ़वाल क्षेत्र से आते हैं. इसलिए उन्होंने जब कुमाऊं क्षेत्र से आने वाले हरीश रावत के खिलाफ बगावत की, तो इस मुद्दे ने ‘गढ़वाल बनाम कुमाऊं’ का रूप भी लिया. इससे कुमाऊं क्षेत्र में हरीश रावत के प्रति सहानुभूति बढ़ी जिस कारण वहां आज भी कांग्रेस भाजपा से ज्यादा मजबूत स्थिति में लगती है.

इन्हीं तमाम कारणों के चलते सर्वेक्षणों में आगे होने के बावजूद भाजपा उत्तराखंड में परेशान नज़र आ रही है. कई जानकार यह भी मानते हैं कि भाजपा को अभी यह भी डर है कि टिकट बंटवारे के समय कहीं उसमें फूट न पड़ जाए. जय सिंह रावत कहते हैं, ‘कांग्रेस में जो टूट होनी थी, वह हो चुकी है. लेकिन भाजपा में यह टूट अभी होनी है. बाहर से आए लोगों को जब टिकट मिलेंगे तो निश्चित ही पुराने कार्यकर्ता नाराज़ होंगे. हालांकि भाजपा कैडर-बेस्ड पार्टी है. उनके वोटर प्रत्याशी से ज्यादा पार्टी के नाम पर वोट डालते हैं. इसलिए ऐसा तो शायद कम होगा कि टिकट न मिलने से उनके असंतुष्ट दावेदार निर्दलीय ही चुनाव में उतर आएं. लेकिन वे बाहर से प्रत्याशियों के लिए काम करेंगे, यह यकीन करना मुश्किल है.’