बीते गुरुवार को दूसरे अभ्यास मैच में भारत ने इंग्लैंड को छह विकेट से हरा दिया था. इससे पहले टेस्ट मैचों की श्रृंखला भी उसने इंग्लैंड को 4-0 से मात दी थी. लेकिन एकदिवसीय मैचों में इंग्लैंड उसका आसान शिकार नहीं होगा, इसके संकेत ब्रिटिश खिलाड़ियों ने मंगलवार को हुए पहले अभ्यास मैच में ही दे दिए हैं. महेंद्र सिंह धोनी जैसे कप्तान की अगुवाई में हुए इस मैच में युवराज सिंह, शिखर धवन और अंबाती रायडू जैसे दिग्गज भी थे. तीनों खिलाड़ियों ने प्रदर्शन में भी कोई कसर नहीं छोड़ी. रायडू ने शतक बनाया तो धवन और युवराज ने अर्धशतक. कप्तान धोनी ने नाबाद रहते हुए 40 गेंदों में आठ चौकों और दो छक्कों की मदद से 68 रन बनाकर टीम का स्कोर 300 के पार पहुंचा दिया. इन स्थितियों में 10 में से नौ बार यह माना जाता है धोनी अपनी टीम को जीत दिलाकर ही मैदान से लौटेंगे. लेकिन इंग्लैंड ने 48.3 ओवर में ही तीन विकेट से मैच जीत लिया.

नेतृत्व नया है और दिशा देने वाला भी

इंग्लैंड ने इस मैच में जिस आसानी से लक्ष्य का पीछा किया उससे यह बात साफ हो गई पिछले साल टेस्ट मैचों की श्रृंखला खेलने आई ब्रिटिश टीम से यह अलग है. इसमें ज्यादातर खिलाड़ी नए हैं. टीम का नेतृत्व (अभी इयॉन मॉर्गन, टेस्ट मैचों में एलेस्टर कुक कप्तान थे) और मार्गदर्शन करने वाले (कोच-ट्रेवर बेलिस) भी अलग हैं.

सबसे पहले इसी फर्क के बारे में समझते हैं. कोच बेलिस इस बात को बेहतर जानते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप में किस तरह का क्रिकेट खेला जाता है. वे श्रीलंका के कोच रह चुके हैं. उन्हीं के कार्यकाल में श्रीलंका की टीम 2011 के विश्वकप के फाइनल तक पहुंची थी. हालांकि फाइनल में श्रीलंका को भारत से हार का सामना करना पड़ा था. बेलिस आईपीएल (इंडियन प्रीमियर लीग) की कोलकाता नाइट राइडर्स के भी कोच रह चुके हैं. यानी उन्हें यह भी अच्छी तरह मालूम सीमित ओवरों के खेल में कब-किस तरह की रणनीति अपनाई जानी चाहिए.

भारत आने से पहले इंग्लैंड ने सात एकदिवसीय श्रृंखलाएं खेलीं हैं और वह इनमें से सिर्फ दो ही हारी. न्यूजीलैंड, श्रीलंका और पाकिस्तान के खिलाफ घरेलू श्रृंखलाओं में तो इस टीम से कमाल का क्रिकेट खेला है. उन्होंने यूएई (संयुक्त अरब अमीरात) में भी पाकिस्तान को हराया है. इसके अलावा बांग्लादेश को भी, जो अब सीमित ओवर के मैचों में किसी भी टीम के लिए चुनौती बनती जा रही है. बांग्लादेश को इंग्लैंड की टीम ने तब हराया जब उसके नियमित कप्तान इयॉन मॉर्गन और ओपनर बल्लेबाज एलेक्स हेल्स टीम में नहीं थे. ये सफलताएं बताती हैं कि अब वे दिन नहीं रहे जब इंग्लैंड को सीमित ओवरों की ऐसी टीम के तौर पर जाना जाता था, जिसका प्रदर्शन लड़खड़ाता रहता है. खास तौर पर जब से मॉर्गन ने कप्तानी संभाली है, तब से टीम रवैया पहले से कहीं ज्यादा आक्रामक हो गया है. ऐसा लगने लगा है, जैसे वे अपनी टीम में नए उत्साह का संचार कर चुके हैं.

नए ब्रांड का क्रिकेट

मॉर्गन ने 2015 के विश्व कप से पहले इंग्लैंड की टीम की कप्तानी संभाली थी. इसके चंद महीने बाद से ही टीम में बदलाव नजर आने लगा था. इस बदलाव के साथ-साथ ऐसे चुनिंदा खिलाड़ियों का उभार भी हुआ, जो विपक्ष के हमले का पहला संकेत मिलते ही आक्रामकता के साथ उसका मुकाबला करना जानते हैं. जो रूट, जॉनी बेयरस्टॉ, बेन स्टोक्स, जोस बटलर, इस आक्रामक टुकड़ी के केंद्रीय धुरी हैं. ये सब सीमित ओवरों के मैचों में इंग्लैंड के क्रिकेट को नए तरीके से परिभाषित कर रहे हैं. इसमें भी सबसे मार्के की बात यह है कि ये करीब-करीब सभी खिलाड़ी इंग्लैंड की टेस्ट टीम के भी सदस्य हैं. यानी टेस्ट के तुरंत बाद सीमित ओवरों के मैच के लिहाज से ये सभी बड़ी तेजी से अपना कलेवर बदलना भी जानते हैं. इस तरह ये कप्तान और कोच के लिए भी आगे की रणनीति तय करने में मददगार होते हैं क्योंकि सभी टीम के आधार स्तंभ की तरह जमे हुए हैं.

एक और अहम बात ये कि सीमित ओवरों के खेल में इंग्लैंड के खिलाड़ियों की सहभागिता अब अपने देश से बाहर भी बड़ रही है. टीम के कई खिलाड़ी या तो भारत में आईपीएल की किसी न किसी फ्रैंचाइजी से जुड़े हैं या फिर ऑस्ट्रेलिया की बिग बैश लीग की टीमों के साथ. इसके अलावा उनके शीर्ष क्रम को देखिए. खास तौर जैसन रॉय एक चमकता हुआ सितारा हैं और उनके साथ सैम बिलिंग्स. सीमित ओवरों के खेल के लिहाज से दोनों की सोच काफी मिलती-जुलती है. दोनों चिंता मुक्त होकर, निर्बाध तरीके से खेलते हैं. सामने से होने वाले आक्रमण को तो जैसे वे अनदेखा ही कर जाते हैं. ये नए खिलाड़ी कई मोर्चों पर तो अपने प्रदर्शन के लिहाज से दुस्साहस करने से भी गुरेज नहीं करते थे. टीम के इस दृष्टिकोण का ही नतीजा था कि वह आलोचकों का मुंह बंद करते हुए 2016 के टी-20 विश्व कप के फाइनल तक पहुंची. हालांकि उसे वेस्टइंडीज से पराजित होना पड़ा.

लेकिन इससे उनकी प्रतिष्ठा फर्क नहीं पड़ा क्योंकि सभी जानते हैं कि वेस्टइंडीज छोटे प्रारूप की बड़ी टीम के तौर पर स्थापित हो चुकी है. इससे बल्कि हुआ ये कि इंग्लैंड की खुद की अपेक्षाएं ही अपनी टीम से बढ़ गईं. यही वजह है कि अब जब यह टीम भारत की जमीन पर एकदिवसीय श्रृंखला के लिए रविवार को पहले मैच में उतरेगी तो सभी की निगाहें उस पर होंगी.

इंग्लैंड की टीम ने भारत में इससे पहले 1984 में एकदिवसीय श्रृंखला जीती थी. उसने 1933 और 2002 में 3-3 से श्रृंखला बराबर की. इसके बाद से अब तक वह भारत दौरे में सिर्फ तीन एकदिवसीय मैच ही जीत सकी है. इसके उलट भारतीय टीम इंग्लैंड से लगातार चार श्रृंखलाएं जीत चुकी है. उसने 2008 और 2011 में तो 5-0 से श्रृंखलाएं जीतकर इंग्लैंड का सूपड़ा ही साफ कर दिया था. इसके बावजूद अब जिस तरह से इंग्लैंड ने सीमित ओवरों में वापसी की है, इस बार उसकी चुनौती को हल्के में नहीं लिया जा सकता.