साल 2013 में दूसरी बार अमेरिका के राष्ट्रपति की शपथ लेने के बाद बराक ओबामा ने शानदार भाषण दिया था. दुनिया भर के मीडिया ने इसे कवर किया था और इसकी तारीफ़ की थी. उस समय ओबामा की छोटी बेटी साशा ओबामा अलग ही वजहों से सोशल मीडिया का ट्रेंडिंग टॉपिक बनी हुई थी. राष्ट्रपति ओबामा के बीस मिनट लंबे भाषण के दौरान जब वे शिक्षा पर बोल रहे थे. साशा दर्शक दीर्घा में बैठी हुई जम्हाई ले रही थी. उबासी लेती हुई 11 वर्षीय साशा की यह तस्वीर कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया पर वायरल होती दिखाई दी.

लोग सोने जाते हुए या सोकर उठते हुए जम्हाई लेते नजर आते हैं. जम्हाई को नींद आने या बोर होने से जोड़कर देखा जाता है. इसके उलट जम्हाई लेते इंसान की नींद आ नहीं बल्कि जा रही होती है. शरीर नींद को दूर कर दिमाग को सक्रिय करने के लिए जम्हाई लेता है. अक्सर ही ओलिंपिक खिलाड़ियों को उनका खेल शुरू होने के पहले भी जम्हाते देखा गया है. अगर जम्हाई का संबंध नींद से होता तो खिलाड़ियों का जम्हाई लेना संभव नहीं था. वास्तव में जम्हाई एक मानसिक स्थिति से निकल कर दूसरी मानसिक स्थिति में पहुंचने का सिग्नल है. संभव है साशा ओबामा भी उस दिन यही कर रही थीं. मनोविज्ञान के अनुसार किसी तरह की चिंता, उत्तेजना या सोच से गुजरने के बाद भी हम उबासियां लेते हैं.

2013 में स्विट्ज़रलैंड के म्यूनिख में साइकियाट्रिक यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल ने उबासी से जुड़ा एक प्रयोग किया. इसमें करीब तीन सौ लोगों को ऐसे वीडियो दिखाए गए जिनमें लोग सिर्फ उबासियां ले रहे थे. यह वीडियो देखने के दौरान दो सौ से ज्यादा लोग ऐसे थे जिन्होंने एक से पंद्रह बार तक उबासी ली. इस प्रयोग के दौरान पाया गया कि किसी को जम्हाई लेते हुए देखकर, देखने वाले में ह्यूमन मिरर न्यूरॉन सिस्टम एक्टिवेट हो जाता है. मिरर न्यूरॉन सिस्टम उन विशेष तंत्रिकाओं का समूह होता है जो हमें दूसरों के क्रियाकलाप या व्यवहार की नक़ल करने के लिए प्रेरित करता है. इसी के चलते दो लोग मानसिक या भावनात्मक रूप से एक दूसरे से जुड़ पाते हैं. बंदरों के नकलची होने के पीछे भी यही सिस्टम काम करता है. इसे परखने के लिए नीचे एम्बेड किया गया वीडियो क्लिक कर सकते हैं.

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जम्हाई संक्रामक इसलिए भी होती है कि यह लम्बे समय तक एक सामाजिक व्यवहार की तरह प्रयोग में लाई गई है. मनोविज्ञान इसे अचेतन मानवीय व्यवहार की संज्ञा देता है. असल में किसी को देखकर जम्हाई लेते हुए हम एक प्राचीन परंपरा का निर्वाह कर रहे होते हैं. ऐसा माना जाता है कि मनुष्यता के विकास के क्रम में मनुष्य जब समूहों में रहा करता था तब जम्हाई की शुरुआत हुई. खतरे का आभास होते ही समूह को सतर्क करने के लिए बिना ध्वनि के इस भाषा का आविष्कार किया गया था. ऐसा माने जाने के पीछे तर्क दिया जाता है कि जम्हाई लेने से दिमाग सक्रिय होता है और यह इशारा भी सतर्क करने के लिए किया जाता है.

आदिम मनुष्य सोने के पहले समूह को जम्हाई लेकर सबकुछ सुरक्षित होने का इशारा भी देते थे. सहमति में बाकी सदस्यों को भी ठीक वही इशारा करना होता था. यह ठीक वैसा ही है जैसे चिड़ियों का एक ही समय पर उड़ान भरना. मनुष्यों में एक-दूसरे को जम्हाते लेते देखकर जम्हाई लेने की प्रवृत्ति का एक संभावित कारण यह भी है.

जम्हाई समानुभूति जताने का एक तरीका भी है. आप अपने करीबी लोगों की जम्हाई से ज्यादा और जल्दी प्रभावित होते हैं. प्रयोग बताते हैं कि अगर आपका कोई रिश्तेदार उबासी ले रहा है तो आपके भी उबासी लेने की संभावना ज्यादा होगी. आगे बढ़कर आपके दोस्त के साथ आप जल्दी उबासी भरेंगे बजाय किसी अनजान व्यक्ति के साथ उबासी लेने के. यानी जम्हाने की संभावना रिश्तेदार से दोस्त और दोस्त से अनजान व्यक्ति तक पहुंचने के क्रम में कम होती जाती है. इसकी वजह यह है कि हम अपने करीबी लोगों के साथ घटित अनुभव को ज्यादा तीव्रता से महसूस कर सकते हैं. इसलिए अक्सर एक-दूसरे को देखकर जम्हाई लेते नजर आते हैं. ठीक वैसे ही जैसे किसी अपने को दुखी देखकर दुखी होते हैं.