किताब का अंश - ‘मुझे जब लगा कि वे काफ़ी दूर निकल गये होंगे, मैं दरवाजा खोलकर कमरे में घुस गया. वहां एक तरफ़ चूल्हे में ठंडी होती राख़ और जली हुई लकड़ी के उनींदे कोयलों को देखकर मुझे अन्दाज़ा हो गया कि उन्होंने रोटियां बना ली हैं. मैंने चूल्हे के पास रखे कनस्तर को खोला, तो उसमें रखी रोटियों की ताज़ा-ताज़ा गन्ध ने मेरा ईमान डिगा दिया. मेरा अनुमान ठीक निकला. वहीं कनस्तर के पास रखी एल्यूमीनियम की पतीली से ढक्कन हटाकर देखा, तो उसमें उठती सब्ज़ी की भाप ने इस अनुमान की पूरी तरह पुष्टि कर दी. मैंने तेज़ी से कनस्तर से दो रोटियां निकालीं, उन पर पतीली से निकालकर चमचा भर सब्ज़ी रखी और जल्दी-जल्दी उन्हें भकोसकर कमरे से बाहर निकल, दरवाज़ा बन्द कर दिया. चौकन्नी नज़रों से देखा तो पाया आसपास फ़ैक्ट्री में कोई नहीं है. जल्दी-जल्दी खाने के कारण हिचकियां आने लगीं. मैंने फटाफट मुंह साफ किया अैर अपने कमरे पर आकर पानी पिया, तब कहीं जाकर हिचकियां बन्द हुई.‘

किताब : पकी जेठ का गुलमोहर

लेखक : भगवानदास मोरवाल

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन

मूल्य : 250 रुपये

हर किसी की जिंदगी में जेठ जैसी कड़ी धूप कभी न कभी आती है और देर तक ठहरती भी है. लेकिन हर कोई उस झुलसा देने वाली तपिश में गुलमोहर बनकर नहीं खिलता. भगवानदास मोरवाल हिंदी साहित्य के ऐसे ही एक लेखक हैं जो जिंदगी के जेठ में गुलमोहर बनकर खिले हैं.

‘पकी जेठ का गुलमोहर‘ भगवानदास मोरवाल की ‘स्मृति-कथा‘ है. यानी वे संस्मरण जिनमें मेवात में बीते बचपन से लेकर राजधानी में पैर जमाने और लेखक बनने तक के लंबे सफर के छोटे-बड़े किस्से दर्ज हैं. इस संस्मरण में आत्मकथा जैसी क्रमबद्धता है, मतलब कि बचपन, किशोरावस्था, युवावस्था के बारे में जीवन के क्रम के हिसाब से ही बताया गया है. आत्मकथा जैसे इस संस्मरण में बहुत जगह लगता है कि जैसे इसका ‘आत्म‘ भगवानदास मोरवाल न होकर खुद मेवात ही है.

पूरे संस्मरण में लेखक की भाषा काफी चुटीली और कहीं-कहीं हास्य पैदा करने वाली है. खुद पर हंसकर दूसरों को हंसाने का फन भगवानदास इस किताब में बखूबी दिखाते हैं. उदाहरण के तौर पर ‘हमारे कस्बे के कॉलेज का नायक, शरीफ़ खानदानी अल्हड़ युवतियों के सपनों का लुटेरा और हम जैसे नादान-नासमझ किशोरों के हृदय-सम्राट संदीप ज़ैदी की छब्बीस इंची बेलबॉटम और उनके साथ पहने जाने वाली सफ़ेद रेक्सीन की बद्धी वाली चप्पलें, हम जैसे किशोरों का एकमात्र सपना बन चुका था. इस सपने को पूरा करने का सबसे पहला गौरव मुझे मेरे ग़ैर-क़ानूनी रूप से किये गये लगभग बाल-विवाह के कारण प्राप्त हुआ था.‘

भगवानदास मोरवाल हरियाणा के ‘काला पानी‘ कहे जाने वाले मेवात के नगीना कस्बे के रहने वाले हैं. वे मेवात की नस-नस से वाकिफ हैं. बल्कि, यदि भगवानदास को मेवात का चलता-फिरता शब्दकोष कह दिया जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगा. उनके उपन्यास, ‘काला पहाड़‘, ‘बाबल तेरा देस में‘ इस बात का सबूत हैं. इस स्मृति-कथा का एक सशक्त पक्ष यह भी है कि लेखक ने मेवात की खूबियों के साथ-साथ मेवात की खामियों को भी तटस्थता से उजागर किया है. ‘हरियाणा वाले मेवों में पैतृक संपत्ति पर केवल पुत्रों का ही अधिकार होता है. घर के मुखिया (पुरुष) के देहान्त के बाद पत्नी और बेटियां उस संपत्ति (जिसमें खेत भी शामिल हैं) का उपयोग तो कर सकती हैं, किन्तु उसे न तो बेच सकती हैं और न ही वह बेटियों के नाम होती है....आज़ाद भारत में एक क़बीलाई स्त्री-विरोधी कानून का ऐसा खौफ़नाक चेहरा शायद ही कहीं देखने को मिले जैसा मेरे मेवात में देखने को मिलता है.‘

मेवात हरियाणा का मुस्लिम बहुल इलाका है, जहां हिंदू-मुस्लिम आपस में इतने ज्यादा हिले-मिले हैं कि एक बार को विश्वास करना मुश्किल है. इस किताब में राजेन्द्र यादव का एक खत भी शामिल है जो उन्होंने भगवानदास की कहानी ‘भूकम्प‘ पढ़ने के बाद उन्हें लिखा था. उस खत में भी मेवात की हिंदू-मुस्लिम एकता का जिक्र करते हुए राजेन्द्र यादव लिखते हैं, ‘मेरी जानकारी में यह शायद पहली कहानी है जो ‘मेवों‘ के जीवन पर लिखी गयी है. हो सकता है एकाध रांगेय राघव ने भी लिखी हो. मगर यह हिन्दी पाठकों के लिए नयी ही है, क्योंकि नामों से लेकर रीति-रिवाज़ और धार्मिक विश्वासों में वहां हिन्दू-मुसलमान इतने ज़्यादा घुले-मिले हैं कि बाहर वालों के लिए उस स्थिति को समझना मुश्किल है‘.

कह सकते हैं कि ‘पकी जेठ का गुलमोहर‘ कथाकार भगवानदास मोरवाल की स्मृतियों के बहाने मेवात और उसके जैसे अन्य ग्रामीण-शहरी समाजों की परतों की पड़ताल है. अब गांव पहले जैसे गांव नहीं रह गए, यह तो हर कोई कहता हुआ दिखता है. पर गांवों की फिजा बदलने के कारणों पर हर कोई गहराई से बात नहीं करता. मोरवाल गांवों के इसी बदलते परिवेश की पड़ताल अपनी स्मृति-कथा में करते हुए लिखते हैं, ‘1986 तक आते-आते हमारे घर से दो काम हमेशा के लिए विदा हो गये. पहला, घर का पुश्तैनी धन्धा, माटी के बासन बनाना और दूसरा, जिससे घर का आधा ख़र्च पूरा होता था, यानी भैंस रखना. पुश्तैनी धन्धा विदा होने की ख़ास वजह थी एक-एक कर परिवार का एकल हो जाना. इसके इलावा हम तीनों भाइयों में से किसी ने इसमें दिलचस्पी नहीं ली....जबकि भैंसों को न रखने की मुख्य वजह पर्यावरण में तेज़ी से आया परिवर्तन था....पशु-चारे की क़िल्लत और दुधारू पशुओं, खासकर भैंस की बढ़ती बेतहाशा कीमत के चलते, एक आम भूमिहर परिवार भैंस रखने की कल्पना भी नहीं कर सकता.‘

राजनीतिक दलों ने किस तरह से अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए पूरे देश की सांप्रदायिक एकता को खत्म किया है, इसका बहुत सटीक उदाहरण इस किताब में मिलता है. देश की दो मुख्य राजनीतिक पार्टियों की सद्भावना रैली के दौरान मेवात में न सिर्फ हिंसा, बल्कि हत्याएं तक होती हैं. भगवानदास लिखते हैं ‘मेवात में जब लगा कि हालात ठीक हैं उसके लगभग पौने दो महीने बाद 30 जनवरी, 1993 को फिर से सद्भाव बहाल करने की ग़रज से, एक तरफ़ निकाली गयी सत्ताधारी कांग्रेस और दूसरी तरफ़ भारतीय जनता पार्टी द्वारा निकाली गयी नूंह में तथाकथित सद्भावना रैलियों ने स्थिति को सात दिसम्बर से भी ज़्यादा विस्फोटक बना दिया. इन दोनों राजनीतिक पार्टियों ने गांधी के इस शहीदी दिवस को मेवात के इतिहास में एक बदनुमा धब्बे की तरह दर्ज़ कर दिया. इन दोनों पार्टियों के तथाकथित देशभक्तों और राष्ट्रवादियों की ख़ूनी झड़प के चलते, ठाकुर बाहुल्य क़स्बे उजीना में चार लोगों को ज़िन्दा जला दिया गया.‘

जिंदगी यदि जेठ की दुपहरी है तो भगवानदास मोरवाल उसी दुपहरी खिला गुलमोहर जो अपने लेखन के चटख रंग से आंखों को सुकून देते हैं. पूरी किताब छोटे-छोटे संस्मरणों की एक लंबी लड़ी है, जिसमें विविध रंगों की यादें चुटीले अंदाज में बयान की गई हैं. हालांकि दिल्ली आने के बाद लेखक द्वारा आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए किये जाने वाले और बतौर लेखक स्थापित होने के संघर्षों से जुड़े संस्मरण इतने ज्यादा हैं कि पढ़ते-पढ़ते कुछ बोरियत सी होने लगती है. इस कारण पूरी किताब को अंत तक पढ़ने के लिए जिस ललक की जरूरत है वह बीच में खो जाती है. किताब के अंतिम हिस्से में मेवात के हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द के खोने के कारणों और उनके प्रभाव को लेखक ने जिस तरह से दूसरे लोगों के खतों के माध्यम से बताया है वह पढ़ने लायक है. कह सकते हैं कि लेखक ने अपनी स्मृतियों के बहाने इस किताब में बहुजातीय ग्रामीण-शहरी समाज का अच्छा समाजशास्त्रीय अध्ययन किया है.