उत्तर प्रदेश चुनाव में अखिलेश यादव साइकिल की रेस जीत गए हैं. अब साइकिल भी अखिलेश की हुई और समाजवादी पार्टी भी. मुलायम सिंह यादव के पास न पार्टी बची, न पार्टी के झंडे पर दिखने वाली साइकिल, न समाजवादी झंडा उठानेवाले ज्यादातर कार्यकर्ता. और अमर सिंह भी वापस लंदन जा सकते हैं.

सवाल है कि पिता और पहलवान मुलायम को अखिलेश ने किस दांव से चारों खाने चित कर दिया? चुनाव आयोग के 42 पन्नों के आदेश का अध्ययन करें तो यह बात साफ होती है कि मुलायम सिंह को अखिलेश यादव ने नहीं उनकी खुद की गलतियों ने ही हराया. दांव-पेंच में इस बार वे कमजोर पड़ गए और इसका पूरा फायदा विरोधी टीम में उनके बेटे अखिलेश और चचेरे भाई रामगोपाल ने उठाया.

मुलायम सिंह यादव की पहली गलती यह थी कि समाजवादी पार्टी टूट चुकी थी. पूरी दुनिया को इसका पता था. लेकिन चुनाव आयोग के सामने वे बार-बार यही दलील देते रहे कि पार्टी टूटी नहीं है और वे अब भी इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. जबकि अखिलेश यादव ने इसके लिए पूरी तैयारी कर ली थी. चुनाव आयोग के दस्तावेज कहते हैं कि अखिलेश के समर्थन में 228 में से 205 विधायकों, 68 में से 56 विधान पार्षदों, 24 में से 15 सांसदों, 46 में से 28 राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्यों और 5731 में से 4400 डेलीगेट्स ने निजी हलफनामा दायर किया.

मुलायम ने दलील दी कि रामगोपाल यादव को पार्टी से निकाला जा चुका था इसलिए वे अधिवेशन नहीं बुला सकते थे. लेकिन रामगोपाल ने पार्टी के संविधान का हवाला दिया और कहा कि उन्हें पार्टी से निकालना ही संविधान का उल्लंघन था

चूंकि संख्याबल अखिलेश के साथ था और मुलायम खाली हाथ थे इसलिए चुनाव आयोग ने माना कि समाजवादी पार्टी टूट टुकी है और इसके दो टुकड़े हो गए हैं. पार्टी में विभाजन का आधार भी मुलायम सिंह की तीन चिट्ठियां बनीं - मुलायम सिंह यादव ने तीस दिसंबर 2016, एक जनवरी और दो जनवरी 2017 को अलग-अलग मसलों पर इन चिट्ठियों को लिखा. इनके जरिये पहले रामगोपाल और अखिलेश यादव को पार्टी से निकाला गया, फिर अधिवेशन को गलत बताया गया और कार्यकर्ताओं को इसमें शामिल न होने की अपील की गई. अधिवेशन हो जाने के बाद उन्होंने अखिलेश को राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने के फैसले को नहीं माना.

रामगोपाल यादव ने मुलायम की इन चिट्ठियों को ही आधार बनाया और चुनाव आयोग के सामने तर्क दिया कि ये चिट्ठियां साबित करती है कि पार्टी में बंटवारा हो चुका था. चुनाव आयोग ने अपने आदेश में कहा कि तीस दिसंबर को रामगोपाल यादव को निकाले जाने वाली चिट्ठी से साफ था कि पार्टी में दो धड़े हो चुके थे. आयोग ने कहा कि खुद मुलायम के पत्र से साबित हो जाता है कि पार्टी में दो खेमे थे.

मुलायम से दूसरी चूक हुई कि वे अपनी पार्टी का संविधान ही नहीं समझ पाए. समाजवादी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव थे, लेकिन संविधान रामगोपाल यादव के नेतृत्व में लिखा गया था. इसलिए रामगोपाल को इस संविधान की बारीकियां पता थीं. चुनाव आयोग के सामने मुलायम ने दलील दी कि रामगोपाल यादव को पार्टी से निकाला जा चुका था इसलिए वे अधिवेशन नहीं बुला सकते थे. लेकिन रामगोपाल ने पार्टी के संविधान का हवाला दिया और कहा कि उन्हें पार्टी से निकालना ही संविधान का उल्लंघन था. उन्होंने पार्टी संविधान के अनुच्छेद तीस का जिक्र किया जिसमें लिखा है कि पार्टी के किसी सदस्य को बर्खास्त करने के लिए तीन सदस्यीय कमेटी बनाना जरूरी है. रामगोपाल को पार्टी से निकालते वक्त मुलायम ने ऐसी कोई कमिटी नहीं बनाई थी.

जब मुलायम पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे उसी वक्त से रामगोपाल यादव ने आपातकालीन अधिवेशन के लिए प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर करवाने शुरू कर दिए थे

मुलायम सिंह से तीसरी गलती हुई कि उन्होंने राष्ट्रीय अधिवेशन को नहीं माना. रामगोपाल ने एक जनवरी को राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाया था, मुलायम की तरफ से कहा गया कि पार्टी के संसदीय बोर्ड ने इस अधिवेशन को रद्द कर दिया था. लेकिन चुनाव आयोग ने मुलायम की बनाई पार्टी के संविधान के अनुच्छेद 20 का जिक्र किया. इसमें बताया गया है कि पार्टी के संसदीय बोर्ड को सिर्फ उम्मीदवार चुनने का अधिकार है उसका अधिवेशन रद्द करने का नहीं. चुनाव आयोग ने यह भी बताया कि जून 2014 से समाजवादी पार्टी ने अपना राष्ट्रीय अधिवेशन नहीं बुलाया था, ढाई साल से ज्यादा हो गए थे. जबकि पार्टी का संविधान कहता है कि साल में दो बार अधिवेशन जरूर होना चाहिए. अगर मुलायम खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते हुए साल 2016 में पार्टी का अधिवेशन बुला लेते तो उनकी बात में ज्यादा वजन होता.

जब बात पार्टी के संख्याबल पर आई तो 5731 में से 4716 प्रतिनिधि अखिलेश के साथ आ गए. चुनाव आयोग के सामने मुलायम के वकीलों ने जिरह तो की लेकिन सबूत के तौर पर हलफनामे नहीं सौंप पाए.

समाजवादी पार्टी में अखिलेश के एक करीबी मंत्री के मुताबिक रामगोपाल यादव ने इस दिन की तैयारी बहुत पहले शुरू कर दी थी. पिछले छह महीने से वे चुनाव आयोग के वर्तमान और पूर्व अधिकारियों से इस सिलसिले में मुलाकात कर रहे थे. रामगोपाल ने वकीलों से भी संपर्क किया था. चुनाव अधिकारियों और वकीलों के परामर्श पर ही उन्होंने अपातकालीन अधिवेशन बुलाया था. इस आपातकालीन अधिवेशन के लिए करीब बीस फीसदी प्रतिनिधियों के दस्तखत चाहिए थी. जब मुलायम पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे उसी वक्त से रामगोपाल यादव ने आपातकालीन अधिवेशन के लिए प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर करवाने शुरू कर दिए थे.

जब तक मुलायम को यह खबर लगती तब तक देर हो चुकी थी. मुलायम सिंह यादव ने सोचा कि रामगोपाल अलग पार्टी बना रहे हैं, खबर उड़ी कि अखिलेश मोटरसाइकिल के पीछे दौड़ रहे हैं. लेकिन वे नहीं जानते थे कि अखिलेश को सिर्फ साइकिल ही चाहिए थी. अखिलेश के बंगले के सामने खड़े एक कार्यकर्ता ने बड़े पते की बात कही, आज अखिलेश ने दल जीता, कल पिता का दिल जीत लें तो परसों उत्तर प्रदेश भी जीत सकते हैं.