‘सच तो यह है कि मैं आज तक दूसरे किसी ऐसे व्यक्ति से नहीं मिली, हिंदी सिनेमा के विषय में जिसकी सोच इतनी सुलझी हुई हो और जो कुछ ही पलों में हल्की-फ़ुल्की बातों से बहुत ही गहरी बातें करने में माहिर हो.’ नसरीन मुन्नी कबीर का यह बयान उनकी किताब - ‘सिनेमा के बारे में’ का हिस्सा है जो जावेद अख़्तर से हुई उनकी बातचीत का नतीजा है.

जादू आज 74 साल के हो गये हैं. शबाना केक लेकर आयी हैं और उन्होंने घर पर ही एक शानदार दावत का इंतज़ाम किया है. मजमा लगा हुआ है. झक सुफ़ेद बाल, आज भी गठीला बदन और रंगीन कुर्ता सुफ़ेद पायजामा पहने वे फ़िल्मों में दिखाए जाने वाले बड़े से हॉल में अपने बेडरूम से नीचे आती हुई सीढ़ियों से उतरते हैं. वे लोगों से हंसी-मज़ाक कर रहे हैं. सभी जावेद अख्तर के सेंस ऑफ़ ह्यूमर के क़ायल हैं. फ़रहान और ज़ोया खुश हैं और एक कोने में हनी ईरानी ख़ामोशी ओढ़े सब देख रही हैं. सलीम साहब आज एक अरसे बाद उनके घर आये हैं और वे ही मेहमानों की अगवानी कर रहे हैं.

अचानक उस हाल की बत्तियां बुझा दी जाती हैं और अमिताभ बच्चन के हाथों में माइक है: ‘नाम जादू उर्फ़ जावेद अख़्तर, वाल्दैन साफ़िया अख़्तर, वालिद जांनिसार अख़्तर जो एक अज़ीम शायर और कम्युनिस्ट थे. बाक़ी के रिश्ते-नातेदार भी ऐसे कि हैरत होती है यह सोचकर कि इतने जहीन लोग एक ही खानदान से कैसे हो सकते हैं. जल्दी से बता दूं - दादा का नाम मुज़्तर ख़ैराबादी, परदादा सयैद अहमद हुसैन ‘रुस्वा’ और परदादी सईदुन-निसा ‘हिरमा’ - ये भी दोनों शायर. मोहतरमा ‘हिरमा’ के वालिद अल्लामा फ़ज़ले-हक़ ख़ैराबादी ग़ालिब के ज़माने के अदीब शायर और ग़ालिब का दीवान संकलित (एडिट) करने वाले. वो लखनऊ कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे जिन्होंने 1857 ग़दर में अंग्रेजों के ख़िलाफ़ फ़तवा जारी किया. और फिर ख़ुद अपनी पैरवी की और इस शिद्दत से की कि सामने बैठा जज भी चक्कर खा गया. यही नहीं, जावेद मशहूर शायर मज़ाज के भांजे भी हैं.’

अमिताभ बच्चन के हाथ में गिलास है. हॉल में अंधेरा है लिहाज़ा यह नहीं मालूम कि उसमें है क्या. वे एक घूंट भरते हैं और फिर आगे कहते हैं, ‘अब जिसकी रगों में ऐसा खून दौड़ रहा हो, क्यों न उसकी वालिदा को अपने होनहार बच्चे के चिकने पैर पालने में दिखते? जादू छोटी उम्र से ही शायरी कहने लग गया है. वो जांनिसार को एक ख़त में लिखती हैं - वह तुम जैसे रोमानी इंकलाबपसंदों से आगे होगा. वह फ़रार का काइल नहीं हो सकता, डटकर लड़ेगा और आगे बढ़ जाएगा.

ऐसा हुआ तो सही, पर मुश्किलें काफी थीं और वो जावेद (शाश्वत) अख्तर (तारा) का ताब देखने को ज़्यादा दिन ज़िंदा न रहीं. जांनिसार तब भी घर कम आते जब साफ़िया ज़िंदा थीं और अब तो बिलकुल ही बंद कर दिया. नाना और खाला के घर जैसे-तैसे बचपन गुज़ारा और जवानी भोपाल में. कॉलेज डिबेट्स में हमेशा अव्वल आये. लिखने का हुनर तो विरसे में मिला था, लिहाज़ा दोस्तों ने अपनी महबूबाओं को जादू से ख़त लिखवाये और इससे वे ख़ासे मशहूर भी हुए.’ सारा हाल ठहाकों से गूंज उठता है.

अमिताभ बोल रहे हैं पर अख़्तर साहब कहीं खो जाते हैं...शायद बीते हुए सालों में.

शॉट 1, टेक 5, किरदार - सलीम साहब, कुछ निर्माता/निर्देशक, ‘अटन बटन’ और जावेद अख्तर खार के रेलवे स्टेशन की सीढ़ियों पर बैठे हुए, सोचते हुए...

कैमरा...एक्शन!

जांनिसार अख्तर- कहां जा रहे हो?

जावेद- अपनी मंज़िल की तरफ़

जांनिसार- कहां मिलेगी?

जावेद- नहीं पता.

जांनिसार - यहां इस घर में क्या तकलीफ है?

जावेद - आप

... बातचीत खत्म और जावेद हमेशा के लिए अपने वालिद का घर छोड़ देते हैं.

उन्हें याद है कि उस रात भयानक बरसात हो रही थी. शायद अक्टूबर 4, 1964 को वो रात थी. वो रात खार के स्टेशन पर ही गुज़ार देते हैं. उनके गुस्से से जलकर राख हुई उस रात की कालिख़ आज उनके ज़ेहन से मिट रही है. क्योंकि वो अब समझ गए है कि खुदमुख़्तारी भी तो उनको वालिद से ही मिली थी. लिहाज़ा, कोई रंजिश नहीं है. हां, पर जांनिसार को वो अपनी मां की वजह से कभी माफ़ नहीं करते.

वो काम के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं. मुश्किल से काम मिल पाता है और इसी बीच सलीम साहब से दोस्ती हो जाती है. क़िस्मत पलटा खाती है और 1971 में ‘अंदाज़’ के लिए पहली पटकथा लिखते हैं. पिक्चर हिट और जोड़ी चल निकलती है. फिर 1973 में जब इंस्पेक्टर विजय बदमाश पठान के बैठने से पहले कुर्सी को लात मारकर ज़मीन पर गिरा देता है और रौबदार आवाज़ में कहता है ; ‘ये पुलिस स्टेशन है, तुम्हारे बाप का घर नहीं...’ तो सिनेमा हॉल में सन्नाटा छा जाता है और ‘जंज़ीर’ सुपर-डुपर हिट हो जाती है. जब 1975 में ‘दीवार’ और ‘शोले’ के पोस्टर पर सलीम-जावेद का नाम आता है तो हिंदुस्तान का सिनेमा हमेशा के लिए बदल जाता है. लोग पहली बार एंटी हीरो को पसंद करने लगते हैं. अमिताभ सुपर स्टार बन जाते हैं और सलीम-जावेद स्टार पटकथा लेखक!

सोचते हुए ही उनके चेहरे पर हैरत पढ़ी जा सकती है: जो जोड़ी राजेश खन्ना की ‘अंदाज़’ से अपनी शुरुआत करती है और जिसे फिर उन्होंने ही ‘हाथी मेरे साथी’ जैसी ऊटपटांग फ़िल्म की पटकथा लिखने के लिए राज़ी किया था, वो राजेश खन्ना उसी जोड़ी की वजह से अपना स्टारडम अमिताभ बच्चन के हाथों गंवा बैठते हैं. उन्होंने सुना था कि एक बार राजेश ने किसी से अमिताभ के लिए कहा था, ‘ना जाने कितने ऐसे अटन-बटन आये और चले गए.’ बड़े-बड़े विश्लेषकों ने इस बदलाव पर अपनी दुकानदारी चलाई. किसी ने उस दौर को निर्णायक कहा, तो किसी ने अमिताभ को, और किसी ने सलीम-जावेद को इसके लिए ज़िम्मेदार बताया.

वो देख रहे हैं कि एक के बाद एक हिट फ़िल्में ये जोड़ी दे रही है. ‘सीता और गीता’, त्रिशूल’, ‘डॉन’, ‘यादों की बारात’. वो पहला फ़िल्मफेयर अवार्ड लेने सलीम के साथ स्टेज पर चढ़ते हैं. चारों तरफ तालियों का शोर है. जावेद को बख़ूबी याद है कि उन्होंने सलीम साहब के साथ 24 फिल्में लिखीं और इनमें से 20 हिट हुई थीं.

वो देख रहे हैं कि चारों तरफ क़ामयाबी बिखरी हुई है. निर्माता, निर्देशक और हीरो सब अपनी पिक्चरें सलीम-जावेद से लिखवाना चाहते हैं. पर अब लिखने की शिद्दत कम हो चली है. उन्हें कुछ कचोटने लगता है...जाने क्या है...दोनों फिर भी साथ काम करते हैं पर कुछ फ़िल्में अब फ़्लॉप होने लग गयी हैं. कौन ज़िम्मेदार है? उन्हें ये अब भी नज़र नहीं आता या वो ये देखना नहीं चाहते?

शॉट 2, टेक 20, क़िरदार- जावेद अख्तर, बच्चे, कुछ मौसिकीकार जैसे पंचम, अनु मलिक और जतिन ललित.

कैमरा...एक्शन!

सब कुछ तो पा लिया है, अब कौन सी मंज़िल पर जाना है यह सवाल उन्हें तंग करने लग जाता है और 1983 में सलीम-जावेद की जोड़ी टूट जाती है. उसके टूटने का दर्द आज भी उनके दिल में हैं. वो सोचने लग जाते हैं, क्या सलीम भी इस बात पर अब तक ग़मज़दा होंगे! वो कुछ कह नहीं सकते. जावेद देख रहे हैं कि हनी ईरानी उनसे दूर जा रही हैं और वो शबाना के क़रीब.

वो अपनी जड़ों की तरफ़ लौटने लगते हैं. वो गीत लिखते हैं और एक से एक हिट गीत उनकी क़लम से निकलने लग जाते हैं. ‘सिलसिला’, ‘साथ-साथ’, ‘मशाल’, ‘सागर’, ‘मिस्टर इंडिया’ जैसी फिल्मों के गाने हिट हो जाते हैं. फिर ‘1942 अ लव स्टोरी’ के गाने उन्हें वही मुक़ाम दिलाते हैं जिसके वो हक़दार हैं. पर अब वो पटकथा अकेले लिखते हैं और ‘रूप की रानी चोरों का राजा’, और ‘प्रेम’ जैसे हादसे रच देते हैं. ‘लक्ष्य’ भी हिट नहीं हुई तो सलीम ने एक इंटरव्यू में कहा, ‘जावेद एक अच्छे डायलाग राइटर तो हो सकते हैं पर अकेले कोई दमदार कहानी लिख पाएं, इस पर शक़ होता है.’ उनके बच्चे फ़रहान और ज़ोया अपनी फिल्मों - ‘दिल चाहता है’ और ‘ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा’ - की कहानी उनसे नहीं लिखवाते. पर जब फ़रहान ‘डॉन’ का रीमेक बनाते हैं तो पिता के पास आते हैं जो उन्हें पहले सलीम साहब से इजाज़त लेने को कहते हैं. दिल से जुड़ा हुआ दोस्त कैसे अपने दोस्त के बेटे को मना कर देता? ‘डॉन’ का रीमेक हिट हो जाता है क़ामयाबी का सेहरा फिर जावेद के सर बंध जाता है.

उन्हें फिर दिखाई दे रहा है फिल्मफेयर का स्टेज और वो वे वहां खड़े अवार्ड ले रहे हैं, पहली बार किसी गाने के लिए मिला है. एक बार फिर तालियों की आवाज़ें उनके कान में गूंज उठती हैं.

शॉट 3, टेक 100, किरदार जावेद अख्तर

कैमरा...एक्शन!

सलमान (छोटा भाई) : अम्मी, अब्बा कब आएंगे?

जादू (तल्ख़ होकर) : सलमान, अब्बा किसी काम से गए हैं, जल्द आएंगे.

सलमान: बताओ न,अम्मी, कब आएंगे ?’... बीमार साफ़िया ख़ामोश रह जाती हैं.

जादू (साफ़िया को दवा देते हुए) अम्मी, कल स्कूल में मास्टरजी पूछ रहे थे कि मेरा पूरा नाम क्या है ?

अम्मी: जावेद जांनिसार अख़्तर.

जादू : जांनिसार’ का बीच में होना कोई ज़रूरी तो नहीं? ...और ‘अख़्तर’ भी क्यूं लगाया जाए?

जावेद: सलमान, अब्बा अब कभी नहीं आएंगे’.

(साफ़िया समझ गयीं कि जादू उस रात ही बड़ा हो गया था.)

साफ़िया: जादू, तुम कल आठ बरस के हो जाओगे...

याद आ रहा है कि मां ने बताया था कि अब्बू ने उनका नाम जादू अपनी शायरी, ‘लम्हा-लम्हा किसी जादू का फ़साना होगा’ से लिया था. उन्हें याद आ रही हैं अपनी मां की तक़लीफें, वालिद की बेरुख़ी, रिश्तेदारों के तंज़, उनकी ग़रीबी. वो अब थकने लग गए हैं. उनका हाथ किसी गिलास से टकरा जाता है तो उनका ध्यान उस आवाज़ की तरफ़ हो लेता है जो हाथ में पहने हुए कड़े और गिलास के टकराने से हुई. उन्हें झट से अपने दोस्त सरदार मुश्ताक़ सिंह का धुंधला चेहरा नज़र आने लगता है. कितने बरस हो गए हैं उससे मिले हुए. उन्हें याद है बॉम्बे में मिली शोहरत और नाक़ामयाबी. एक बार फिर खार का स्टेशन उन्हें नज़र आता है. वो ये सब अपनी शायरी में उड़ेल देते हैं और दिसंबर 1995 में उनकी पहली क़िताब ‘तरकश’ छपती है. क़िताब हिट है क्योंकि उसमें उनकी जिंदगी है.

‘अपनी मेहबूबा में अपनी मां देखें,

बिन मां के लड़कों की फ़ितरत होती है.’

या फिर अपने बचपन पर कुछ यूं लिखते हैं

‘हम तो बचपन में भी अकेले थे

सिर्फ़ दिल की गली में खेले थे .’

अपने पैसे कमाने की हवस को यूं कहते हैं

‘गिन गिन सिक्के हाथ मेरा खुरदुरा हुआ

जाती रही लम्स (स्पर्श) की नर्मी, बुरा हुआ.’

‘तरकश’ की हर एक ग़ज़ल, हर एक नज़्म मुकम्मल है. वो उतनी ही पैनी है, जितनी कि उनके लिखे हुए संवाद. उनकी समाजवादी सोच निखरकर पन्नों पर बिख़र जाती है, जब वो मदर टेरेसा से सवाल करते हैं :

...तूने कभी कभी ये क्यूं नहीं सोचा

कौन सी ताक़त

इंसानों से जीने का हक़ छीन के

उनको फुटपाथों और कूड़ाघर तक पहुंचाती है

तूने कभी क्यों ये नहीं देखा

वही निज़ामे-ज़र

जिसने भूखों से रोटी छीनी है

तिरे कहने पर

भूखों के आगे

कुछ टुकड़े डाल रहा है...’

‘शिकस्त’, ‘एक मोहरे का सफ़र’, ‘फसाद से पहले’, ‘फसाद के बाद’, ‘आवारगी’, ‘वक़्त’, ‘भूख’, ‘वो कमरा याद आता है’ कुछ चंद ऐसी नज़्में हैं जो क्लासिक का दर्ज़ा रखती हैं. बकौल क़ुर्रतुल ऐन हैदर - ‘जावेद अख़्तर ने उर्दू की महान सिंफ़नी में आप नाम दर्ज़ कर लिया है.’

उनकी दूसरी क़िताब ‘लावा’ 2012 में प्रकाशित हुई. जब उनसे पूछा गया कि इतने साल क्यों लगे ‘तरकश’ के बाद तो उन्होंने कहा ‘जब तक कोई नया खयाल या कोई नया तरीका न हो पुरानी बात कहने का, तब तक पाठकों को क्यों परेशान किया जाए.’ कुछ ऐसा ही उनके एक शेर से ज़ाहिर होता है

‘जिधर जाते हैं सब, जाना उधर अच्छा नहीं लगता

मुझे पामाल (घिसे पिटे) रास्तों का सफ़र अच्छा नहीं लगता.

इस किताब में भी उनके तेवर ज़रा कम नहीं होते. मसलन,

जब जल रहा था शहर तो सुर्ख़ (लाल) आसमान था

मैं क्या कहूं थी कैसी क़यामत की रौशनी.’

उनकी एक नज़्म ‘कच्ची बस्ती’ पूंजीवादी व्यवस्था पर बड़ा प्रहार करती है. उन्हें फिर याद आ रहा है ‘लावा’ में लिखा एक शेर जो उनके ताज़िन्दगी के सफ़र को बयां करता है.

‘बज़ाहिर क्या है जो हासिल नहीं है

मगर ये तो मिरी मंज़िल नहीं है.’

वो एक बार फिर सुन रहे हैं चारों तरफ तालियों की आवाज़ें. ये सिर्फ़ और सिर्फ़ उनकी क़ामयाबी है और इसमें किसी दूसरे का कोई हाथ नहीं है. उन्हें इसकी ही तलाश थी या कुछ और भी बचा है...?

अचानक बत्तियां जल उठती हैं और हॉल तालियों की गड़गडाहट से गूंज उठता है. उनका खयाल टूटता है जब शबाना उनके हाथों में चाक़ू थमा देती हैं. वे केक काटते हैं. लोग गा उठते हैं - ’हैप्पी बर्थडे जावेद.’ शबाना उन्हें केक खिलाती हैं और वे शबाना को...सलीम से गले लगते हैं. अमिताभ से हाथ मिलाते हैं और फिर एक केक का टुकड़ा लेकर हनी ईरानी की तरफ़ चल देते हैं... पार्टी जल्द ख़त्म हो जाती है क्योंकि अगले दिन उनकी मां की बरसी है.

चलते-चलते

जावेद अख्तर पर इब्ने सफ़ी (अपने ज़माने के मशहूर जासूसी अफसाना निग़ार) का असर हमेशा हावी रहा. इब्ने सफ़ी की तरह उनका सेंस ऑफ़ ह्यूमर भी क़माल का है. दो साल पहले जब वे राज्यसभा से रुख़सत हो रहे थे तब उन्होंने एक शानदार स्पीच दी जो तय समय सीमा के पार हो गई थी. सम्मोहित सा सदन उन्हें सुने जा रहा था तब सभापति ने कहा - ‘जावेद साहब, मेरी नज़र सुई की घड़ी पर भी है.’ इससे पहले कि उनकी बात ख़त्म होती, वे बोले, ‘जानता हूं सर, समय ख़राब चल रहा है.’