अमित तिवारी सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं और मुंबई में रहते हैं.


साल 1999 की बात है. मैं तब पांचवीं कक्षा में पढ़ता था. मेरा गांव गोरखपुर (उप्र) से 60 किमी दूर दक्षिण में पड़ता था. तब वो जगह गांव से कस्बा बन जाने के लिए दिन-रात मेहनत कर रही थी. मैं वहीं के एक स्कूल में पढ़ता था. स्कूल, वहां पढ़ने वाले बच्चे और उसके आसपास का माहौल टीवी और फिल्मों के शहर देखकर जितना अपग्रेड हो सकता था, हो रहा था.

मेरे घर का माहौल काफी सख्त था. पिताजी गंभीर और मितभाषी थे. ज्यादातर मौकों पर वो हमसे तभी बोलते थे जब उन्हें कुछ पूछना होता था. लेकिन अम्मा काफी सख्त थीं और गलतियों पर तत्काल सजा देने में यकीन करती थीं. झूठ, लापरवाही, अनुशासनहीनता, बदतमीजी और बाहर से आई किसी भी शिकायत का किचन के तमाम उपकरणों (बर्तन-भांडों) से हाथों-हाथ इलाज किया जाता था. नतीजतन कोई गलती करते हुए या उसको छिपाते हुए हमारी हड्डियां तक कांपती थीं.

पांचवीं में पढ़ते हुए मेरा यारी-दोस्ती का सर्कल बड़ा होने लगा था. मैं जो मौज घर में नहीं कर पाता था वो दोस्तों के साथ करने लगा था. हमारे स्कूल के बाहर वाले मैदान में शाम को एक आदमी चाट का ठेला लेकर आता था. उसके पास कई आइटम होते थे, जैसे फुल्की, चाट, टिक्की, भेल और भी बहुत कुछ. स्कूल छूटते ही सब उसी के ठेले पर जुट जाते थे और घंटेभर में ही उसका सब सामान ख़त्म हो जाता था. सारे बच्चों की तरह मुझे भी यह सब खाना खूब भाता था. मैं अक्सर वहां जाता और यार-दोस्तों की संगत में शुरू हुआ यह सिलसिला धीरे-धीरे चटोरपने की लत में बदल गया.

एक बार चाटवाला मुझ से पैसे लेने भूल गया. अब मैं इस फिराक में रहने लगा कि जब-जब मुमकिन हो चाटवाले के पैसे मारे जाएं

उन दिनों हमें पैसे नहीं या बहुत कम मिलते थे. मेरी दो रुपये की दिहाड़ी यानी जेबखर्च बंधा हुआ था. टेस्ट में अच्छे अंक लाने पर एकाध दिन के लिए उसको पांच कर दिया जाता था. मुझे उस ठेले वाले की फुल्की (पानीपूरी) की ऐसी लत लगी थी कि अब मैं रोज उसके ठेले पर जाने लगा था और दो हो या पांच रुपये, सारे-सारे वहां खर्च करके आ जाता था. इस तरह मेरी उससे जान-पहचान हो गई थी और उसका भी मुझ पर विश्वास जम गया था. इसी बीच एक बार ऐसा हुआ कि ज्यादा भीड़ के चलते वह मुझ से पैसे लेने भूल गया. उसका यह भूलना मुझे बड़ा अच्छा लगा क्योंकि अब पैसे चुकाकर फुल्की खाने का मेरे पास एक और मौका बन गया था. अब मैं इस फिराक में रहने लगा कि जब-जब मुमकिन हो चाटवाले के पैसे मारे जाएं. जब कम भीड़ होती तो मैं पैसे चुका देता और जब ज्यादा तो खूब सारा खाकर पीछे से निकल लेता था. कभी-कभी तो भीड़ के बढ़ जाने तक खाते रहता था और फिर मौका बनते ही बिना पैसा चुकाए गायब हो जाता था.

हालांकि कहीं न कहीं मुझे लगता था कि जो मैं कर रहा हूं वह गलत है. ठेलेवाला गरीब है और मेहनत करता है और उसे उसकी मेहनत की कीमत मिलनी चाहिए. लेकिन उस उम्र में गलती करके बच निकलने का एक अलग ही मजा होता है और यहां तो मैं अपने पैसे भी बचा ले रहा था. यह सिलसिला कई महीनों तक चलता रहा. मैं छठवीं कक्षा में आ गया. तब तक वो चाटवाला शक्लो-सूरत से परेशान-कमजोर सा दिखने लगा था. एक दिन अचानक उसने मैदान में आना बंद कर दिया. अपनी तलब पूरी करने के लिए हफ्तेभर तक उसका इंतजार करने के बाद जब नहीं रहा गया तो वहीं मैदान में नानखटाई का ठेला लगाने वाले से मैंने उसके बारे में पूछ ही लिया.

उसने जो बताया उसे सुनकर मैं हिल गया. नानखटाई वाले ने कहा कि चाटवाले की बीवी के पेट में ट्यूमर हो गया था और डॉक्टर ने कई महीने तक उसको दवा से गलाने की कोशिश की. जब मर्ज बढ़ा तो ऑपरेशन के लिए शहर रेफर कर दिया. उसका परिवार बड़ा था और कमाने वाला वो अकेला था. सही समय पर पैसे नहीं जुट पाए और एक दिन दर्द से तड़पते हुए उसकी बीवी की मौत हो गयी थी.

मैंने अम्मा को सब सच-सच बता दिया. और शायद वो पहला मौका था जब मुझे गलती पर मार नहीं पड़ी. उनका इस बात पर कुछ न बोलना मुझे बहुत खल गया  

मैंने शायद पहली बार ऐसी खबर... किसी की मौत की खबर इतने पास से सुनी थी और जो मेरे ईमान को झकझोर देने वाली खबर थी. स्कूल से आने के बाद मुझे बार-बार वो सारे दिन याद आ रहे थे जब मैं उसको पैसे दिए बिना भाग आया था. जाने कितने और बच्चे ऐसा करते होंगे. इस सब के चलते उसका कितना नुकसान होता रहा होगा. बार-बार यही मन में आता था कि अगर मैंने हर बार उसको पैसे दिए होते तो शायद उसकी बीवी बच जाती. मेरा यह गुणा-भाग पूरा पक्का नहीं था लेकिन इससे से पैदा हुई शर्म मेरे मन में घर कर गयी. यह बात मैं किसी को बता सकने की हालत में भी नहीं था. दोस्त मजाक बना देते और घर में पीठ पर रेखागणित उतार दिया जाता.

मेरा गुणा-भाग कहता था कि उस मौत की जिम्मेदारी से मैं खुद को दूर नहीं कर सकता. इसी अपराधबोध के बीच मेरे दिन बीत रहे थे. लेकिन जब हद पार हुई और इस शर्मिंदगी और पछतावे ने खाना-पीना-पढ़ना-खेलना सब हराम कर दिया तो मैंने अम्मा को सब सच-सच बता दिया. और शायद वो पहला मौका था जब मुझे गलती पर मार नहीं पड़ी. अम्मा ने कुछ नहीं कहा, एक शब्द भी नहीं. बस चुपचाप उठ कर चली गयीं. उनका इस बात पर कुछ न बोलना और खल गया. गलती की शारीरिक सजा उस बात से जम गयी शर्म को शायद खत्म कर सकती थी. उनका यूं चुप रहना मुझे और अंदर तक रुला गया.

जाहिर है कि मेरे इस अपराधबोध और शर्मिंदगी से उस चाटवाले की जिंदगी पर अब कोई असर नहीं पड़ने वाला था. हां लेकिन इस पूरे वाकये का मेरे ऊपर जरूर भारी असर पड़ा. उस घटना ने मेरे उजड्ड हो रहे चरित्र को एक मानवीय कोण दे दिया था. मेरी आज हरसंभव कोशिश रहती है कि अगर किसी की मेहनत का इस्तेमाल कर रहा हूं तो मैं उसकी उचित कीमत ईमानदारी से चुकाऊं.