सलमान खान इन दिनों फिर से चर्चा में हैं. उन्हीं कारणों के चलते, जिनके चलते वे पहले भी कई बार चर्चित हो चुके हैं - आपराधिक मुकदमों में फंसने और फिर उनसे बच निकलने के लिए. इस बार सलमान खान जिस मुक़दमे से बरी हुए हैं वह आर्म्स एक्ट की धाराओं के तहत दर्ज किया गया था. इस मामले में उन पर अवैध हथियार रखने के आरोप थे. 1998 में दर्ज हुए इस मामले में न्यायालय ने बीती 18 जनवरी को उन्हें बरी कर दिया है.
इस मामले में न्यायालय ने कुल 102 पन्नों का फैसला लिखवाया है. इस फैसले को पूरा पढ़ने पर कई दिलचस्प जानकारियां सामने आती हैं. इनसे अच्छी तरह से यह भी समझा जा सकता है कि कैसे सलमान खान हर बार अपने ऊपर लगे आरोपों से मुक्त हो जाया करते हैं. मसलन, इस मामले में न्यायालय यह तक मानने को तैयार था कि अपराध करने वाला मशहूर एक्टर सलमान खान नहीं, बल्कि कोई जोधपुर निवासी सलमान खान भी हो सकता है. इस मामले की ऐसी ही दिलचस्प बारीकियों को जानने से पहले बेहद संक्षेप में यह जान लेते हैं कि सलमान खान के खिलाफ इससे जुड़े कुल कितने और कौन-कौन से मामले दर्ज हुए थे.
बात 1998 की है. सलमान उन दिनों राजस्थान में फिल्म ‘हम साथ साथ हैं’ की शूटिंग कर रहे थे. इसी दौरान उन पर जंगली जानवरों का शिकार करने के आरोप लगे. इन आरोपों में कुल चार मुकदमे दर्ज हुए. इनमें से दो चिंकारा का शिकार करने के थे. आरोप थे कि सलमान खान ने 26-27 सितंबर की रात जोधपुर के गांव भवाद में दो चिंकारा और 28-29 सितंबर की रात मथानिया गांव में एक चिंकारा का शिकार किया है. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धारा 51 के तहत दर्ज हुए इन दो मामलों में निचली अदालत ने सलमान खान को कुल छह साल की सजा सुनाई थी. लेकिन बीते साल उच्च न्यायालय ने उन्हें इन दोनों मामलों में बरी कर दिया है.
न्यायालय ने अपने फैसले में लिखा है कि अभियोजन स्वीकृति मुंबई, महाराष्ट्र के रहने वाले सलमान खान के विरुद्ध नहीं बल्कि किसी ‘मुंबई, पीएस लूणी, जिला जोधपुर के निवासी सलमान खान पुत्र सलीम खान के विरुद्ध जारी हुई.’
चिंकारा के शिकार के अलावा उन पर दो अन्य मामले दर्ज हुए थे. इनमें आरोप थे कि सलमान खान ने 1-2 अक्टूबर की रात कांकाणी गांव में दो काले हिरणों (कृष्ण मृगों) का शिकार किया है. इसके लिए उन पर दो अलग-अलग मुक़दमे दर्ज हुए. एक मुकदमा वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत दर्ज हुआ जिसकी अगली सुनवाई आने वाली 25 जनवरी को होनी है. दूसरा एआरएम या आर्म्स एक्ट के तहत दर्ज हुआ था. इसी दूसरे मामले में बीती 18 जनवरी को सलमान खान के पक्ष में फैसला सुनाया गया है जिसकी चर्चा अब हम विस्तार से करते हैं.
102 पन्नों का यह फैसला मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम), जोधपुर की अदालत ने सुनाया है. सीजेएम दलपतसिंह राजपुरोहित ने अपने इस फैसले में लिखा है कि 1-2 अक्टूबर 1998 की रात सलमान खान ने काले हिरणों का शिकार किया या नहीं, इस सवाल का जवाब तलाशना इस मामले में जरूरी नहीं है. इस सवाल का निर्धारण उस दूसरे मुकदमे में होना है जो वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धाराओं के तहत चलाया जा रहा है और जिसकी अगली सुनवाई 25 जनवरी को होनी है. इसलिए उन्होंने माना कि इस मामले में अदालत के सामने सिर्फ तीन मुख्य सवाल हैं:
1. क्या सलमान खान ने 1-2 अक्टूबर, 1998 की रात कांकाणी गांव में रिवाल्वर एस एंड डब्ल्यू .32 बोर नंबर (87011) और राइफल .22 बोर (नंबर 2118) को बिना वैध लाइसेंस के अपने कब्जे में रखकर आर्म्स एक्ट की धारा 3/25 का उल्लंघन किया है?
2. क्या सलमान खान ने बिना वैध लाइसेंस के कब्जे में रखे हथियारों को उस रात शिकार के लिए प्रयोग कर आर्म्स एक्ट की धारा 27 का उल्लंघन किया है?
3. यदि हां, तो इसका उचित दंड क्या हो?
तत्कालीन जिला कलेक्टर रजत कुमार मिश्रा से जिरह की गई तो उन्होंने ‘स्वीकार किया कि एक ही नाम के गांव कई राज्यों में हो सकते हैं. जैसे भटिंडा नाम की एक जगह थाना लूणी में भी है और पंजाब में भी’
इन तीन सवालों के जवाब तलाशते हुए जब न्यायालय ने ‘अभियोजन स्वीकृति’ पर चर्चा शुरू की, तो यह मामला बेहद दिलचस्प हो गया. बताते चलें कि ‘अभियोजन स्वीकृति’ का प्रावधान आर्म्स एक्ट की धारा 39 में दिया गया है. इसके अनुसार जब भी किसी व्यक्ति के खिलाफ आर्म्स एक्ट की धारा 3 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज किया जाता है तो उसके लिए ‘अभियोजन स्वीकृति’ लेना अनिवार्य होता है. यह अनुमति जिला मजिस्ट्रेट द्वारा दी जाती है. चूंकि सलमान खान के खिलाफ भी इस एक्ट की धारा 3 लगाई गई थी इसलिए इस मामले में भी ‘अभियोजन स्वीकृति’ लेना अनिवार्य था. उस दौरान रजत कुमार मिश्रा जोधपुर के जिला कलेक्टर हुआ करते थे. उनके पास यह मामला अभियोजन स्वीकृति के लिए आया तो उन्होंने संबंधित पुलिस अधिकारियों से बात करने के बाद यह स्वीकृति जारी कर दी.
जब यह मामला न्यायालय पहुंचा तो सलमान खान के वकील ने तर्क दिया कि यह ‘अभियोजन स्वीकृति’ अवैध है, कानून की नज़र में शून्य है क्योंकि इसे बिना सोचे-समझे जारी किया गया है. इस तर्क का जो आधार उनके वकील ने लिया और जिसे न्यायालय ने भी सही माना, वह बेहद दिलचस्प है. यह अभियोजन स्वीकृति सलमान खान पुत्र सलीम खान निवासी मुंबई के खिलाफ जारी की गई थी. चूंकि यह मामला थाना लूणी, जोधपुर का था, तो इस स्वीकृति पत्र में सलमान के नाम, वल्दियत और पते के बाद यह थाना क्षेत्र भी दर्ज किया गया था. लेकिन न्यायालय ने माना कि, ‘उक्त अभियोजन स्वीकृति का अध्ययन करने से यह स्पष्ट प्रकट होता है कि यह अभियुक्त श्री सलमान खान पुत्र सलीम खान निवासी मुंबई, थाना लूणी, जिला जोधपुर के विरुद्ध जारी की गई. जबकि इस प्रकरण में जो अभियुक्त - सलमान खान - गैलेक्सी अपार्टमेंट, बांद्रा, मुंबई, महाराष्ट्र का निवासी है.’
इस कारण न्यायालय ने अपने फैसले में लिखा है कि अभियोजन स्वीकृति मुंबई, महाराष्ट्र के रहने वाले सलमान खान के विरुद्ध नहीं बल्कि किसी ‘मुंबई, पीएस लूणी, जिला जोधपुर के निवासी सलमान खान पुत्र सलीम खान के विरुद्ध जारी हुई.’ इस मामले की जांच करने वाले अधिकारी अशोक पाटनी - जो कि सरकारी गवाह भी थे - उन्होंने इस संबंध में अपनी मुख्य परीक्षा में कहा कि जिस व्यक्ति के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति जारी की गई थी वह थाना लूणी, जिला जोधपुर का ही निवासी था.
फैसले में यह भी लिखा गया है कि जब यह अभियोजन स्वीकृति जारी करने वाले तत्कालीन जिला कलेक्टर रजत कुमार मिश्रा से जिरह की गई तो उन्होंने ‘स्वीकार किया कि एक ही नाम के गांव कई राज्यों में हो सकते हैं. जैसे भटिंडा नाम की एक जगह थाना लूणी में भी है और पंजाब में भी.’ इसलिए न्यायालय ने माना कि ‘ऐसी स्थिति में अभियोजन स्वीकृति में अंकित ‘मुंबई’ थाना लूणी, जिला जोधपुर का कोई गांव नहीं हो, और महाराष्ट्र का ही हो, ऐसा कयास नहीं लगाया जा सकता.’ इन बातों के चलते न्यायालय ने माना कि मुंबई (महाराष्ट्र) वाले मशहूर एक्टर सलमान खान के खिलाफ तो अभियोजन स्वीकृति कभी जारी ही नहीं हुई थी.
ऐसे में न्यायालय ने माना कि अभियोजन स्वीकृति सलमान खान से जुड़े हथियारों के लिए जारी नहीं हुई है क्योंकि सलमान खान के हथियार तो ‘रिवाल्वर .32 बोर और राइफल .22 बोर हैं, न कि 32 बोर और 22 बोर.
इसी अभियोजन स्वीकृति से जुड़े कुछ और तथ्य भी बेहद दिलचस्प हैं. यह स्वीकृति दो हथियारों के लिए जारी की गई थी. रिवाल्वर 32 बोर और राइफल 22 बोर. ऐसे में न्यायालय ने माना कि यह सलमान खान से जुड़े हथियारों के लिए जारी नहीं हुई है क्योंकि सलमान खान के हथियार तो ‘रिवाल्वर .32 बोर और राइफल .22 बोर हैं, न कि 32 बोर और 22 बोर.’ यानी अभियोजन स्वीकृति में 32 और 22 के आगे बिंदी नहीं लगी थी. जब स्वीकृति जारी करने वाले रजत कुमार मिश्र से इस बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि वे ‘.22 बोर और 22 बोर में अंतर नहीं जानते.’ इसलिए न्यायालय ने माना कि ऐसे में यह विश्वास करना मुश्किल है कि यह स्वीकृति सलमान खान वाले हथियारों के लिए ही जारी हुई हो.
इस तरह से सलमान खान के नाम, वल्दियत और पते के साथ ही जब अधिकारियों ने घटना के थाना क्षेत्र का उल्लेख कर दिया तो न्यायालय को संदेह हो गया कि मुंबई नाम का कोई गांव जोधपुर के लूणी थाना क्षेत्र में भी हो सकता है. यह भी संदेह हुआ कि उस मुंबई गांव में कोई ऐसा सलमान खान रहता हो जिसके पिता नाम भी सलीम खान ही हो. और संदेह यह भी हुआ कि शायद उस गांववाले सलमान खान ने भी वैसे ही दो हथियार अवैध तरीके से अपने पास रखें हो. साथ ही जब हथियारों के बोर लिखने के दौरान अधिकारियों ने 32 और 22 से पहले बिंदी नहीं लगाई तो न्यायालय को संदेह हुआ कि ऐसे हथियार तो सलमान खान के पास हैं ही नहीं.
ऐसे ही कुछ और संदेह भी न्यायालय में जिरह के दौरान पैदा हुए जिनका लाभ सलमान खान को मिल गया. ऐसे ही संदेहों के लाभ उन्हें अक्सर मिल जाते हैं और वे बरी हो जाते हैं. जानवरों के शिकार के अलावा सलमान खान पर मुंबई में एक मुकदमा ‘हिट एंड रन’ का भी था. उस मामले में निचली अदालत ने सलमान खान को दोषी मानते हुए सजा भी सुना दी थी. लेकिन इसके कुछ ही महीने बाद जब सलमान खान उच्च न्यायालय पहुंचे तो वहां भी न्यायालय को कुछ ‘संदेह’ हुआ जिसके चलते दिसंबर 2015 में वे उस मामले से भी बरी हो गए.
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