दिन... नहीं पता. महीना... वो भी नहीं पता. साल... शायद 1960.

जगह... लन्दन या पाकिस्तान का कोई एक शहर… एक बड़े हॉल में दो लोगों की बातचीत.

‘आपा आपका ख़त आया है.’

‘किसका है यासीन?’

‘अब आपने इतना भी नहीं पढ़ाया कि मैं अंग्रेजी समझ लूं. हां, खत के ऊपर तीन शेरों के मुंह वाली तस्वीर है.’

‘इधर लाएं, जल्दी. और एक ब्लैक कॉफ़ी बना ले आइये.’ वे शायद समझ गईं थीं.

वे ख़त पढ़ते-पढ़ते मुस्कुरा रही हैं.

कहां से है, ऐनी आपा और ऐसा क्या है जो आप मुस्कुरा रही हैं’ यासिन ने सवाल पहले दागा, कॉफ़ी बाद में दी.

ऐनी आपा: लिफ़ाफ़े पर तीन शेरों वाली जो तस्वीर है ना, ये दरअस्ल चार शेर हैं और ये निशान-ए-हिंदुस्तान है. मेरी हिंदुस्तान बसने की दरख़्वास्त मंज़ूर कर ली है वहां की सरकार ने, यासीन मियां.

यासीन: ‘पर क्यूं जा रही हैं वहां आपा? तक़सीम के वक़्त वहीं से तो आयी थीं आप अपने भाईजान के साथ. और फिर ये मुसलमानों का मुल्क़ है. मैंने तो सुना है कि आपका ख़ानदान बुख़ारा से ताल्लुक रखता है.’

आपा: ठीक ही सुना है. हमारे बुजुर्ग सैय्यद जलालुद्दीन बुख़ारी 1236 में बुख़ारा से हिंदुस्तान गए थे. उन दिनों दिल्ली में रज़िया सुल्तान गद्दीनशीं थीं. बुखारी साहब तबियत के सूफी थे, लिहाज़ा उन्हें दिल्ली सल्तनत की सरपरस्ती मिल गयी थी. फिर कुछ वक्त बाद....’तशरीफ़ रखिये मियां’... ‘अरे वहां नहीं... कितनी बार कहा है कि सोफे पर बैठा करें, नीचे क्यूं गद्दी जमा लेते हैं?

यासीन: ‘आपने जवाब नहीं दिया, आपा, कि वहां जाकर क्यों रहना अब?’

आपा: मेरी किताब ‘आग का दरिया’ पाकिस्तान सरकार को पसंद नहीं आई है.

यासीन: ‘ऐसा क्या लिखा है आपने उसमें... ?’

ऐनी आपा या कुर्रतुल ऐन हैदर अपने आप से सवाल करती हुईं, ‘मैंने ऐसा क्या लिख दिया था?’

पश्चिम और हिंदुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब का शानदार संगम कुर्रतुल ऐन हैदर हिन्दुतान के साहित्य में बड़ा दख़ल रखतीं हैं. वह चाहे इतिहास हो या फिर किस्सागोई या, राजनीति, या दूसरी ज़ुबान के अफसाना-निगारों का उर्दू में तर्जुमा, उनकी लिखी हुई हर चीज अहम् है.

पैदाइश अलीगढ़ (हिंदुस्तान) के एक नामी गिरामी खानदान में. वालिद सैय्यद सज्जाद हैदर ‘यलदरम’ अंग्रेजी हुकूमत में अफ़ग़ानिस्तान, तुर्की वगैरह के राजदूत रहे. ‘यलदरम’ के लिए कहा जाता है कि वो नयी उर्दू दास्तानगोई के पहले जायज़ उस्ताद थे. वालिदा नज़र सज्जाद भी एक मशहूर अफ़साना निग़ार थीं और उन्हें उर्दू का जेन ऑस्टिन कहा जाता था. जब कुर्रतुल पैदा हुईं तो घर और आसपास अदीब लोगों का जमघट था.

ऐनी आपा’ ने शुरूआती तालीम लखनऊ में हासिल की, अलीगढ से इंटर पास किया. बाद में लख़नऊ से ही बीए और जब 18वां लगा तो अफसानों की उऩकी पहली क़िताब ‘शीशे का घर’ शाया(प्रकाशित) हुई. 19 की होते -होते एमए कर किया और दूसरी किताब ‘मेरे भी सनमख़ाने’ को लोगों ने हाथों-हाथ लिया . बाद में उन्होंने लंदन के हीदरलेस आर्ट्स स्कूल से भी पढाई की.

कुछ ही महिला साहित्यकार जैसे ऐनी आपा, इस्मत चुग़ताई और अमृता प्रीतम हैं जिन्होंने तकसीम के ग़म को झेला है और उसपर शिद्दत से लिखा है. ये तो हम मानते हैं कि दंगों-फ़सादों में सबसे ज़्यादा अगर कोई झेलता है तो औरतें. वे बेवा होती हैं, बाप तो फिर भूल जाता है औलाद के मरने का ग़म वे नहीं भूलतीं. और फिर कहे जाने वाले मर्द के हाथों.... चुनांचे, इनकी ग़मबयानी मंटो, राजिंदर बेदी और गुलज़ार सरीखे अफ़साना-निगारों पर भारी पड़ जाती हैं.

कमलेश्वर ने कभी इस तिकड़ी के लिए कहा था: अमृता प्रीतम, इस्मत चुगताई और कुर्रतुल ऐन हैदर जैसी विद्रोहिणियों ने हिंदुस्तानी अदब को पूरी दुनिया में एक अलग स्थान दिलाया है. जो जिया, जो भोगा या जो देखा, उसे लिखना शायद बहुत मुश्किल नहीं, पर जो लिखा वह झकझोर कर रख दे, तो तय है कि बात कुछ ख़ास ही होगी. ये कमलेश्वर की गोलमोल टिप्पणी है क्योंकि उन्होंने अपने द्वारा संकलित ‘शताब्दी की कालजयी काहिनयां’ में एक भी कहानी ऐनी आपा की नहीं उठाई. ख़ैर, वे कमलेश्वर के परिचय की मोहताज नहीं हैं.

दरअस्ल, जितनी बात कमलेश्वर ने कही है, कुर्रतुल का परिचय उससे ज़्यादा है. आइये देखें कैसे?

कुल 20 साल की उम्र में ही उन्होंने हिंदुस्तान के बंटवारे को देख लिया था. वो बंटवारा जिसने एक तहज़ीब, चलो संस्कृति कह लेते हैं, के दोफाड़ कर दिए थे. रातों-रात भाई से भाई जुदा ही नहीं हुआ बल्कि दुश्मन हो गया था. इस बंटवारे ने उनके खानदान को तहस-नहस कर दिया और उनके भाई-बहन पाकिस्तान चले गए. हिंदुस्तान में रह गईं कुर्रतुल और पिता. जब लखनऊ में पिता चल बसे तो अपने भाई मुस्तफ़ा हैदर के साथ वो भी पाक़िस्तान चली गयीं.

उन्होंने दुनिया के उतार-चढ़ावों, बंटवारों, कौमों के पतन को नज़दीक से देखा और महसूस किया और ये उनके अफसानों में झलकता भी है. उनके पात्र दर्शन की बातें करते हैं और अपने सुख-दुख को इतिहास के दर्पण में तौलते हैं. उन्हें हमेशा लगता था कि मज़हबी समस्याओं का हल मिली-जुली तहज़ीब में निहां(छुपा) है और उससे ही इसका हल किया जाए. उन्होंने कहीं लिखा था कि ‘ये तहज़ीब(हिंदुस्तान की) किसी अखबार की सुर्ख़ी नहीं, जो दुसरे दिन ही भुला दी जाए. यह तहज़ीब दुनिया के इतिहास का उन्वान(टाइटल) है जो अपनी जगह महफूज़ है और दूसरी तहज़ीबों को अपनी ओर खींचता है.’ दरअस्ल मेरी नज़र में बात ये है कि कुर्रतुल ऐन हैदर उस माला का एक मनका हैं जो अमीर खुसरो, तुलसीदास, कबीर जैसे मनकों से बनी है.

बड़ी बेख़ौफ़ बातें करने के लिए वे जानी जाती रहीं. अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहाये जाने पर उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया करते हुए हिन्दू-मुसलमान दोनों को खरी-खरी सुनाई थी. कबीर को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा था कि - ’अरे, इन दोउ राह न पाई.’ और कुछ ऐसी ही बात अपनी किताब ‘आग का दरिया’ में भी वे उठाती हैं.

यासीन: आपा, ऐसा क्या था उस किताब में? उसने ये सवाल दूसरी बार पूछा.

‘यासीन मियां, सुनना चाहते हैं, तो सुनिये, ये हिंदुस्तान कोई लक़ीर के उस पार का मुल्क नहीं है. ये 4500 साल की तारीख़ (इतिहास) है जिसका फैलाव ख़ैबर दर्रे से लेकर बंगाल की खाड़ी तक और हिमाले से लेकर हिंद महासागर तक है. इसमें कारवां आते गए और ये गुलिस्तां बनता गया. आर्य, हुन, कुशान और फिर मुसलमां सब आये और बस गए. राम यहीं हैं, बुद्ध यहीं हैं और यहीं हैं निज़ामुद्दीन औलिया और गरीब नवाज़. यहां आकर सब कुछ गड्ड-मड्ड हो गया. लकीर खींच कर पाकिस्तान तो बना लिया पर तहज़ीब वही रखी जो हिंदुस्तान की थी. वही पहनावा, वही खाना, ‘बाजरे के सिट्टे...’ यहां भी गाया जाता है और वहां भी. अगर हिंदुओं की तहज़ीब कमतर होती तो क्यूं रहीम ‘कृष्ण’ गाते और उनसे पहले खुसरो ‘राम’ गाते? चलो गाया सो गाया, अब भी तो जब बच्चा मुसलमान के घर पैदा होता है, गीत कृष्ण-कन्हैया के गाए जाते हैं, मुसलमान बच्चे मुंह नीला-पीला किए गली-गली टीन बजाते हैं, साथ-साथ चिल्लाते हैं- ’हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की.’ मुसलमान पर्दानशीं औरतें जिन्होंने पूरी उम्र किसी गैर मर्द से बात नहीं की, जब ढोलक लेकर बैठती हैं तो लहक-लहक कर अलापती हैं - भरी गगरी मेरी ढलकाई तूने, श्याम हां तूने. और सुनो हिंदू तहज़ीब की ख़ास बात ये है कि इसमें कोई किसी को हुक्म नहीं देता है कि ये करो, वो करो, ये करना ही है. मैंने इस तहज़ीब की बात की थी.’ थोड़ा रुकीं, फिर - ‘कुछ मुसलमानों का अच्छा है तो कुछ हिंदुओं का और यही मिली-जुली तहज़ीब इस ‘हिंदुस्तान’ की पहचान है. कुछ महासभाई यहां थे और कुछ मुस्लिम लीगी वहां. आप तो आ गए अपने पाकिस्तान में, मैं तो आज भी बीच में झूल रही हूं और मुझे सुकून उस धरती पर ही मिलता है क्योंकि आज भी वहां गंगा-जमुना तहज़ीब है. इसलिए जा रही हूं.’

यासीन सिर्फ सुनता रह गया और उनके पूछने पर बोला, ‘... किताब का उन्वान तो आपने ग़ालिब के शेर से लिया है ना.’ उसकी आंखे चमक उठीं ये कि चलो कुछ तो बोल पाया वो?

‘एक बात बोलूं? और न भी कहो तो फिर भी कहे देता हूं, निक़ाह पढ़ लीजिएगा हिंदुस्तान जाकर.’

1960 में आपा अपने ख़्वाबों के हिंदुस्तान चली आयीं. यहां आकर भी उन्होंने कई बेशकीमती अफ़साने जैसे ’अगले जन्म मोहे बिटिया ना कीजो’, ‘कलंदर’, ‘कारमिन’, ‘कोहरे के पीछे’ ‘सीता हरण’ और नक्सलवाद पर ‘आखिरी शब के हमसफ़र’ लिखा. ‘आख़िरी शब् के हमसफ़र’ महाश्वेता देवी के उपन्यास ‘जंगल के दावेदार’ की याद दिलाता है. साहित्य अकादेमी, ज्ञानपीठ और न जाने कितने सम्मान उन्हें दिए गये. बस ताउम्र यासीन की शादी वाली बात टालती रहीं. ‘अगले जनम मोहे ...’ को एक तरह से उनकी जीवनी भी कह सकते हैं. औरतों के शोषण पर आधारित इस कहानी की कुछ पंक्तियां लिखने से अपने-आप को रोक नहीं पा रहा हूं:

कहानी की पहली लाइन - ‘लगाके काजल चले गौसाईं’ भूरे क़व्वाल की गगनभेदी तान से दीपक की लौ थर्रा उठी. इससे आगे है - ‘अरे लगाके काजल चले गौसइयां’ भूरे खान का 10 वर्षीय सुपुत्र शदूदू भी अपनी बारीक़ आवाज़ में गाने लगा.’

इसे अगर ध्यान से पढ़ें तो पाएंगे कि कितने सलीक़े से इसमें गौसाईं गोसइयां बन जाते हैं. और देखिये आपा भूरे खां और उसके बेटे से ये क़व्वाली शबे मेराज(वह रात जिसमे पैग़ंबर साहब ईश्वर से मिलने गए थे) के किस्से पर गवाती हैं!

एक और लाइन: ‘... मैंने खाला से कहा हो जाओ ईसाई. ख़ुदा न यहां है न वहां, फर्क क्या पड़ता है.’

और आखिरी बात, वो दोहा जिससे उन्होंने इस कहानी का उन्वान बनाया था:

’औ रे विधाता बिनती करूं तोरी पैयां पडूं बारंबार,

अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो चाहे नरक दीजो डार .’

चलते-चलते

आग का दरिया के बारे में मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली ने यहां तक कहा है कि मोहम्मद अली जिन्ना ने हिन्दुस्तान के साढ़े चार हज़ार सालों की तारीख़ (इतिहास) में से मुसलमानों के 1200 सालों को अलग करके पाकिस्तान बनाया था. क़ुर्रतुल ऐन हैदर ने नॉवल ‘आग़ का दरिया’ लिख कर उन अलग किए गए 1200 सालों को हिंदुस्तान में जोड़ कर उसे फिर से एक कर दिया.

और एक बात जो बात है कि कमलेश्वर ने उनकी एक भी कहानी का चयन ‘शताब्दी की कालजयी कहानियां, में नहीं किया पर मगर ध्यान से दखें तो उनकी ‘कितने पाकिस्तान’ का कथानक कुछ-कुछ ‘आग का दरिया’ जैसा ही है.

ऐनी आपा के ‘हिंदुस्तान’ की तमाम बेटियों के उज्जवल भविष्य की कामना के साथ...