बीते नौ नवंबर को अमेरिका में राष्ट्रपति चुनावों के नतीजों ने अमेरिका सहित दुनिया के ज्यादातर लोगों को हिलाकर रख दिया था. अमेरिका में रह रहे अल्पसंख्यकों सहित दुनिया के कई देशों के प्रमुख इस बात से परेशान थे कि आखिर अब क्या होगा? प्रचार के दौरान डोनाल्ड ट्रंप के विवादित बयानों और उनके उनके ऊपर लगे महिलाओं के शोषण के आरोपों को देखते हुए ऐसा लग रहा था कि उदार माने जाने वाला अमेरिकी समाज ट्रंप को अपना राष्ट्रपति नहीं चुनेगा. लेकिन, चुनावी नतीजों ने सभी की उम्मीदों पर पानी फेर दिया. ट्रंप की जीत के बाद से अमेरिकी मुस्लिम, हिस्पैनिक, अश्वेत और एलजीबीटी समुदाय के साथ-साथ अमेरिका में रह रहे अप्रवासी भी काफी घबराए हुए हैं.

हालांकि, 14 नवंबर को राष्ट्रपति चुने जाने के बाद अपने पहले साक्षात्कार में ट्रंप ने अपने स्वभाव से विपरीत जाकर सीबीएस न्यूज़ से कहा, ‘अमेरिका के लोगों को मुझसे घबराने की जरूरत नहीं है...मैं इस देश को एकजुट करने जा रहा हूं.’ इस दौरान डोनाल्ड ट्रंप का यह भी कहना था कि समाज के कुछ वर्गों के लोग उनको चुने जाने के बाद से घबराए हुए हैं और यह बात उन्हें मालूम है. उनके मुताबिक इसका कारण यह है कि ऐसे लोग उन्हें ठीक से नहीं जानते. ट्रंप ने अपने राष्ट्रपति चुने जाने के बाद मुस्लिमों, अफ्रीकी अमेरिकियों और लैटिनों पर बढे हमलों पर दुःख जताते हुए सार्वजनिक रूप से लोगों से ऐसा न करने की अपील भी की.

ट्रंप के व्यवहार में अचानक आये इस बदलाव से अमेरिका में रह रहे मुसलमानों और आप्रवासियों को बड़ी राहत मिली. उन्हें लगने लगा कि ट्रंप ने प्रचार के दौरान जो बातें कहीं थी वे केवल चुनाव जीतने के लिए कही गई थीं और अब वे वैसा कुछ भी करने नहीं जा रहे हैं. हालांकि, इसके पांच दिन बाद ही ट्रंप के कुछ फैसलों ने लोगों को हुई इस गलतफहमी को दूर कर दिया. 19 नवंबर को ट्रंप ने कुछ महत्वपूर्ण पदों पर ऐसे लोगों को चुना जिनमें से कुछ तो अमेरिका में अपनी नस्लभेदी और मुस्लिम विरोधी सोच के लिए जाने जाते हैं. और कुछ विदेश नीति पर वैसे ही विचार रखते हैं जैसे चुनाव प्रचार के दौरान डोनाल्ड ट्रंप के भाषणों में सुनने को मिले थे.

19 नवंबर को ट्रंप ने अलाबामा से सीनेटर जेफ़ सेशन्स को अटॉर्नी जनरल, कैनसस से सांसद माइक पोंपेयो को सीआईए प्रमुख और रिटायर्ड जनरल माइकल फ्लिन को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) के पद के लिए नामित किया.

चुनाव प्रचार के दौरान फ्लिन के विवादित ट्वीट काफी चर्चा में रहे थे. इनमें उन्होंने आतंकवाद के लिए सीधे तौर पर इस्लाम धर्म को जिम्मेदार ठहराया था  

इन तीनों के चुनाव ने केवल अमेरिका में रह रहे अल्पसंख्यकों को ही नहीं बल्कि मानवधिकारों से जुडी संस्थाओं को भी चिंतित कर दिया है. नस्लभेदी विचार रखने वाले सीनेटर जेफ़ सेशन्स को महिलाओं, समलैंगिकों और आप्रवासियों के प्रति सख्त रुख रखने वाले के रूप में भी जाना जाता है. वे अमेरिका में अपराधियों के साथ पूछताछ के दौरान टॉर्चर किये जाने की वकालत करते रहे है. पेशे से वकील रहे सेशन्स अपने साथी अश्वेत वकीलों को श्वेत लोगों से ढंग से बात करने को लेकर चेतावनियां देने के लिए भी जाने जाते हैं. 1980 में एक नस्लीय टिप्पणी के कारण ही जेफ सेशन्स को संसद ने संघीय न्यायाधीश बनाने से इंकार कर दिया था. सीनेट में हमेशा आप्रवासियों और विदेशी कामगारों को लेकर मुखर रहने वाले सेशन्स ने पिछले दिनों ही कहा था कि वे सीनेट में ऐसा बिल लेकर आएंगे जिसमें वीजा नियमों को सख्त बनाने का प्रावधान होगा और कंपनियों को पहले अमेरिकियों को नौकरी देने का वादा करना होगा.

कुछ लोगों की चिंताएं इस बात से हैं कि जेफ़ सेशन्स अब आप्रवासन और निर्वासन के नियमों में मनमुताबिक बदलाव कर सकते हैं. क्योंकि अटॉर्नी जनरल बनते ही वे इस तरह के मामलों की सुनवाई करने वाली अदालतों के जजों को नियुक्त करने वाली संस्था के प्रमुख बन गये हैं. इससे सेशन्स को इन जजों का हटाने और आप्रवासन के नियमों को बदलने का अधिकार भी मिल गया है. कुछ लोग मानते हैं कि चुनाव प्रचार के दौरान आप्रवासियों से जुड़े विषयों पर ट्रंप ने सेशन्स की सलाह से ही जनता से वादे किये थे और इसी वजह से उन्होंने सेशन्स को अटार्नी जनरल के पद पर चुना है.

चुनाव में ट्रंप के सलाहकार रहे माइकल फ्लिन को अमेरिका में अपने मुस्लिम विरोधी विचारों के लिए जाना जाता है. चुनाव प्रचार के दौरान फ्लिन के विवादित ट्वीट काफी चर्चा में रहे थे. इनमें उन्होंने आतंकवाद के लिए सीधे तौर पर इस्लाम धर्म को जिम्मेदार ठहराया था. फ्लिन ने एक ट्वीट में लिखा था कि इस्लाम में इबादत करना ही समस्या की जड़ है और यह कोई धर्म नहीं है बल्कि एक राजनीतिक और कट्टरपंथी विचारधारा है. वे अपने ट्वीट में अमेरिका से मुसलमानों को निकाले जाने का समर्थन भी कर चुके हैं. फ्लिन को रूस का करीबी भी माना जाता है और रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से संबंधों के चलते ही 2014 में बराक ओबामा ने उन्हें डिफेंस इंटेलीजेंस एजेंसी के चीफ के पद से हटा दिया था. कुछ जानकारों के मुताबिक माइकल फ्लिन की वजह से ही डोनाल्ड ट्रंप रूस के प्रति नरम रुख बनाए हुए हैं. इनके मुताबिक फ्लिन ने ही ट्रंप को विश्वास दिलाया है कि अमेरिका सहित पूरी दुनिया के लिए एक मात्र सबसे बड़ा खतरा इस्लामिक आतंकवाद है और इससे निपटने के लिए अगर रूस से भी हाथ मिलाया जाए तो गलत नहीं होगा.

चीन, सीरिया और रूस से संबंधों को लेकर ट्रंप के रुख में चुनाव बाद भी कोई बदलाव नहीं आया है. ट्रंप ने प्रचार के दौरान रूस के साथ मित्रता करने और चीन को सबक सिखाने की वकालत की थी. चुनाव बाद ताइवान की प्रधानमंत्री से प्रोटोकॉल तोड़कर बात करना, चीन को नीतियां बदलने की चेतावनी देना और रूस से प्रतिबंध हटाने संबंधी बयान देना इस बात का संकेत हैं कि वे अपने पुराने रुख से पलटने वाले नहीं हैं.

इराक और अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना का नेतृत्व कर चुके मैटिस मध्य-पूर्व की स्थिरता और शांति के लिए ईरान को आईएस और अलकायदा से बड़ा खतरा मानते हैं.  

इसके अलावा ट्रंप ने तेल के सबसे बड़े व्यवसाईयों में से एक रेक्स टिलरसन को अमेरिका का नया विदेश मंत्री चुना है. टिलरसन को रूसी राष्ट्रपति पुतिन का करीबी माना जाता है. 2014 में क्रीमिया को यूक्रेन से अलग करने पर जब अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए थे तो इस फैसले का सबसे ज्यादा विरोध टिलरसन ने ही किया था.

डोनाल्ड ट्रंप ने माइक पोंपेयो को सीआईए प्रमुख और पूर्व कमांडर जेम्स मैटिस को रक्षा मंत्री के रूप में नामित करके भी काफी कुछ साफ़ कर दिया है. ये दोनों ही राष्ट्रपति बराक ओबामा की मध्य-पूर्व नीति, खास तौर पर ईरान संबंधी नीति के मुखर आलोचक रहे हैं. मैटिस और पोंपेयो दोनों ने ही जुलाई 2015 में कई सालों की कोशिश के बाद हुए ईरान परमाणु समझौते का विरोध किया था. ये दोनों ही इस समझौते को गलत मानते हैं. इराक और अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना का नेतृत्व कर चुके मैटिस मध्य-पूर्व की स्थिरता और शांति के लिए ईरान को आईएस और अलकायदा से बड़ा खतरा मानते हैं.

2014 में अफगानिस्तान में युद्ध खत्म करने के बाद मैटिस ईरान पर भी हमला करना चाहते थे और इसके लिए ओबामा सरकार पर दबाव बना रहे थे. बताया जाता है कि इसी वजह से ओबामा ने उन्हें मरीन कोर के जनरल के पद से हटा दिया था. अपने चुनाव प्रचार में कई बार डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर हमला बोला था उन्होंने ईरान के साथ परमाणु समझौते को कमजोर बताते हुए इसे खारिज करने की बात भी कही थी. ऐसे में ट्रंप द्वारा मैटिस को चुना जाना ईरान को लेकर उनकी सख्त नीति के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है.

अंतराष्ट्रीय मामलों के कुछ जानकार कहते हैं कि चिंता का विषय यह है कि डोनाल्ड ट्रंप ने ऐसे लोगों को सबकुछ सौंप दिया है जो उसके योग्य नहीं हैं. ये वे लोग हैं जो ओबामा के शासन के दौरान केवल सरकार की अच्छी नीतियों का विरोध करते रहे या विवादित बयान देकर चर्चा में बने रहे. इन जानकारों के मुताबिक दुर्भाग्य की बात यह है कि यही लोग प्रचार के दौरान भी ट्रंप के सलाहकार रहे और अब सरकार में भी हैं. ऐसे में इस बात की पूरी आशंका है कि ये ट्रंप से वही करवाएंगे जो इन्होने प्रचार के दौरान उनसे कहलवाया था.

डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के तुरंत बाद ही अपने इरादे जाहिर भी कर दिए हैं. उन्होंने शपथ लेने के कुछ देर बाद ही ‘अफोर्डेबल केयर एक्ट’ के कुछ प्रावधानों को रोकने और इस कानून को वापस लेने के आदेश पर हस्ताक्षर कर दिये. इस कानून को ओबामाकेयर के नाम से भी जाना जाता है. प्रचार के दौरान उन्होंने इसे खत्म करने का वादा किया था. ट्रंप के मुताबिक ओबामा केयर की वजह से सरकार को बड़ा आर्थिक बोझ झेलना पड़ता है. हालांकि, उन्होंने इसकी जगह दूसरी व्यवस्था लाने की बात भी कही है. स्वास्थ्य देखभाल से जुड़ा यह कानून सात साल पहले पारित हुआ था. इससे लगभग दो करोड़ अमेरिकी नागरिकों को स्वास्थ्य बीमा के दायरे में लाया गया था.