सर्दियों की छुट्टी में मेरी बहन और उसका 10 साल का बेटा मेरे घर पर आए हुए थे. कहीं घूमने का मन था तो सोचा कि रेल म्यूजियम जाया जाये. घूमने का घूमना होगा और कुछ जानने-समझने को भी मिल जाएगा. बस हम वहां पहुंच गए. रेल म्यूजियम बेहद सुंदर और साफ-सुथरा था. पहले हम अंदर घूमे. फिर बाहर आकर जॉयट्रेन के मजे लिए. यहां तक तो सबकुछ बहुत अच्छा लग रहा था. घूमते-घूमते एक घंटे से ज्यादा और घर से निकले 2-3 घंटे हो चुके थे. अब हम सबको बाथरूम जाने की जरूरत महसूस हुई. हम घूमना छोड़कर बाथरूम ढूंढ़ने लगे. हम सबको - खासकर अपनी ढाई साल की बेटी को गोद में उठाए मुझे - दस एकड़ में बने उस रेल म्यूजियम में यह बड़ा मुश्किल काम लग रहा था. काफी देर भटकने के बाद आखिरकार हम लोगों को एक टॉयलेट दिख गया.

मैंने अपनी बहन से कहा, ‘मैं बच्चों को देख रही हूं तुम चली जाओ.’ वह अभी कुछ ही दूर गई थी कि उधर से एक बुजुर्ग महिला आती दिखाई दीं. उन्होंने कहा- ‘बेटा, वहां बिल्कुल मत जाना टॉयलेट बहुत ही गंदा है, उल्टी कर दोगी.’ ये सुनकर मेरी बहन की हिम्मत जवाब दे गई और वो उल्टे पैर भागी. लेकिन जरूरत थी तो हमने आगे बढ़कर संग्रहालय के एक कर्मचारी से पूछा कि ‘भैया, यहां कहीं कोई वॉशरूम होगा?’ उसने कहा – ‘है ना मैडम, म्यूजियम के पीछे की तरफ है.’ हम पीछे की तरफ जाने लगे तो वहां इतना सन्नाटा था कि मैं और मेरी बहन डर गए. उसी वक्त वहां काम करने वाले एक अंकल ने हमें देखा और हमारे चेहरे को पढ़कर पूरी बात समझ गए. उन्होंने कहा - ‘पीछे ही है, आओ मैं दिखा देता हूं.’

दो मिनट बाद वाशरूम हमारे सामने था. वहां पानी रिस रहा था और रास्ते पर कीचड़ था. हमें कुछ पल रुककर उसमें जाने के लिए हिम्मत बांधनी पड़ी. अंदर जाते ही ऐसी दुर्गंध आई कि उल्टी होते-होते रुकी. जब तक हम उसमें रहे जितना रोक सकते थे सांस रोके रहे. बाहर निकलते ही सब एक बेंच पर बैठ गए. दोनों बहनों के मन में एक ही बात चल रही थी - आखिर क्या करने पर हमारा देश साफ-सुथरा होगा? और महिलाओं के लिए क्या कभी इस दिशा में कुछ किया जा सकेगा.

मेरे साथ ऐसा पहली बार नहीं हुआ था. कुछ महीने पहले हम अपनी कार से हिमाचल प्रदेश घूमने गए थे. हाईवे पर सैकड़ों मील चलने पर भी जब ढंग का टॉयलेट नहीं मिलता तब हम सोचते कि शायद यह रास्ता थोड़ा मुश्किल है इसलिए सुविधाओं का इंतजाम नहीं है. लेकिन उस दिन तो मैं दिल्ली के चाणक्यपुरी में केंद्र सरकार के रेल मंत्रालय द्वारा चलाए जाने वाले इतने बड़े संग्रहालय में बैठी थी. वहां ऐसी अव्यवस्था निराश करने वाली थी. ऐसी जगह जहां रोज़ हजारों लोग घूमने आते हैं. उनमें भी एक बड़ा हिस्सा विदेशी सैलानियों का होता है. प्रधानमंत्री निवास से बमुश्किल चार-पांच किमी दूर स्थित इस जगह के आस-पास राजनयिकों का जमावड़ा हुआ करता है. इसे पिछले साल आई एक फिल्म - ‘की एंड का’ - में खास फीचर बनाकर पेश किया गया था. ऐसी जगह सरकार एक साफ शौचालय हमें नहीं दे सकती!

रेल संग्रहालय में जो देखा उस पैमाने पर अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छता अभियान को तौला जाए तो पूरा मिशन एक छलावा लगता है. महात्मा गांधी के जन्मदिन पर पूरे देश में अभियान शुरू किया गया. खिलाड़ी, अभिनेता, कलाकार से लेकर बड़े-बड़े नेता और सरकारी कर्मचारी झाड़ू लगाते और फोटो खिंचाते दिखे. प्रधानमंत्री ने खुद भी झाड़ू उठाई. शुरूआत में मुझे भी लगा था यह एक अच्छी पहल है. इसलिए देश को साफ करने के नाम पर मैंने भी 0.5% का स्वच्छ भारत सेस खुशी-खुशी दिया. अपने आसपास की साफ-सफाई के लिए जो कर सकती थी वो भी किया. दो साल पूरे हो चुके हैं. अगले तीन साल में पूरे देश को स्वच्छ बनाने का लक्ष्य रखा गया है. लेकिन सफाई पर बड़ा-बड़ा ज्ञान देने वाले लोग दिल्ली की सबसे महत्वपूर्ण जगहों में से एक में अब तक हमें एक स्वच्छ शौचालय नहीं दे सके हैं.

रेल मंत्री सुरेश प्रभु जिन्हें बड़े अरमानों और दावों के साथ यह मंत्रालय दिया गया था. वह मंत्रालय जिसके पास सबसे ज्यादा बजट होता है. मंत्रीजी ट्विटर पर समस्याएं सुलझाते हैं. वे रेल को सबसे स्वच्छ रखने की बात रहे हैं. हर रेलगाड़ी में हाइटेक शौचालय की योजना बताई जा रही है. स्टेशन को सुंदर और स्वच्छ दिखाने की तस्वीरें हर रोज सोशल मीडिया पर घूमती है. पर मैं उन तस्वीरों और दावों को मानूं तो कैसे!

मैं ये भी कैसे मानूं कि सार्वजनिक जगहों पर साफ शौचालयों के न होने से जो परेशानियां लड़कियों-महिलाओं को होती हैं उनके बारे में बेटी बचाओ और पढ़ाओ जैसी बातें करने वाली हमारी सरकारें नहीं जानती होंगी. ज्यादा देर तक बाथरूम रोकने और पानी कम पीने से लड़कियों को कितनी शारीरिक समस्याएं हो सकती हैं हमारी समझदार सरकारें यह भी जानती ही होंगी. कुछ समय पहले तक लगता था कि इस दिशा में जो किया जा सकता है बड़ी तेजी से हो रहा होगा. लेकिन आज ऐसा नहीं सोच पा रही हूं. निराशा में बस एक ही सवाल बार-बार मन में घूम रहा है - क्या सच में हमारे देश का कुछ नहीं हो सकता?