भारतीय सेना का जवान चंदू बाबूलाल चव्हाण क्या जानबूझकर पाकिस्तान की सीमा में दाखिल हुआ था? सेना के सूत्रों के हवाले से हिंदुस्तान टाइम्स ने जो खबर दी है, उससे कुछ ऐसा ही लगता है. चंदू को करीब चार महीने तक अपनी कैद में रखने के बाद पाकिस्तान ने 21 जनवरी को ही उसे भारत को सौंपा है.

सेना की 37वीं राष्ट्रीय राइफल्स (आरआर) का जवान चंदू पिछले साल 29 सितंबर को जम्मू-कश्मीर के पुंछ में नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर स्थित अपनी अग्रिम सीमा चौकी से गायब हो गया था. उसी दिन सेना ने ऐलान किया था कि उसके विशेष दस्ते ने उरी के सैन्य शिविर पर हुए आतंकी हमले (इसमें 19 सैनिक शहीद हुए थे) के जवाब में एलओसी के उस पार आतंकी शिविरों पर सैन्य कार्रवाई (सर्जिकल स्ट्राइक) की है. इसके अगले ही दिन पता चला था कि 22 वर्षीय चंदू पाकिस्तानी सेना की गिरफ्त में है.

भारत सरकार ने चंदू को पाकिस्तान की गिरफ्त से रिहा कराने के लिए कोशिश शुरू की तो इस बात पर जोर दिया कि वह ‘अनजाने’ में सीमा पार कर गया था. सरकार आज भी अपने इसी रुख पर कायम है. लेकिन इस मामले में सेना की शुरुआती जांच के हवाले से एक अधिकारी का कहना है, ‘ड्यूटी पर तैनाती के मसले पर चंदू की अपने वरिष्ठ अधिकारी से उस रोज बहस हुई थी. इससे नाराज होकर वह चौकी छोड़कर चला गया था. सीमा के उस पार जाते वक्त भी उसे यह अच्छी तरह पता था कि वह क्या कर रहा है.’ चंदू को वापस सौंपते हुए पाकिस्तानी सेना ने भी यह दावा किया था कि उसने अपने अधिकारियों के व्यवहार से नाराज होकर नियंत्रण रेखा पार की थी.

सेना की उत्तरी कमान के कमांडर रह चुके लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हुड्‌डा भी इस बात की तस्दीक करते हैं. पिछले साल नवंबर में सेवानिवृत्त होने तक हुड्‌डा उत्तरी कमान का नेतृत्व कर रहे थे. उन्होंने अखबार से बातचीत में माना, ‘चंदू की अपने जेसीओ (जूनियर कमीशंड अफसर) के साथ बहस हुई थी. इसके बाद वह गायब हो गया. बाद में हमें पता चला कि वह पाकिस्तान की सीमा में पहुंच चुका है.’

सूत्रों के मुताबिक, फिलहाल चंदू का इलाज चल रहा है. हालांकि उसके जिस्म पर बाहरी चोटों के निशान नहीं हैं. लेकिन उसकी मनोदशा अच्छी नहीं है. कई घंटे तो उसे यही अहसास दिलाने में लग गए कि वह भारत आ चुका है. उसे अभी चलने-फिरने के लिए भी किसी की मदद की जरूरत होती है. वह बयान दर्ज कराने की स्थिति में भी नहीं है. परिवार को भी अब तक उससे मिलने की इजाजत नहीं दी गई है.