वह करीब एक घंटे की यात्रा रही होगी. ईरान की एक जर्जर सी कोनाक हवाई पट्‌टी से चाबहार बंदरगाह के बीच की. जिस फेरी से मैं जा रहा था उसके ड्राइवर राशिद (असली नाम नहीं) ने लगभग पूरे रास्ते मुझसे बात करने की अपनी उत्सुकता छिपाए रखी. लेकिन जैसे ही नाव बंदरगाह के नजदीक बने आलीशान फिरदौस होटल के नजदीक पहुंची, वह खुद को रोक नहीं पाया. बोला, ‘क्या आप हिंदुस्तान से हैं? यहां (ईरान में) सभी लोग उर्दू में बात करते हैं.’ अपनी सपाट लहजे वाली हिंदी को वह उर्दू कह रहा था.

इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि क्यों भारत ने ईरान के बलूच-सिस्तान प्रांत में ओमान सागर के किनारे बसे चाबहार बंदरगाह को विकसित करने के लिए 20 अरब डॉलर (करीब 1,363 अरब रुपए) की परियोजना के लिए हामी भरी है. इस परियोजना के तहत भारत को सिर्फ बंदगाह ही नहीं, इससे सटे इलाके में अन्य औद्योगिक इकाइयां भी स्थापित करनी हैं. चाबहार बंदरगाह विकसित करने से भारत को पाकिस्तान को दरकिनार करने में मदद मिलेगी जो अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक भारत की पहुंच सहज बनाने में सबसे बड़ी बाधा है.

इतिहास में जाएं तो मध्य युगीन यात्री अल-बरूनी ने चाबहार को भारत का प्रवेश द्वार (मध्य एशिया से) भी कहा था. चाबहार का मतलब होता है चार झरने. यहां से पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह भी महज 72 किलोमीटर दूर रह जाता है, जिसके विकास के लिए चीन 46 अरब डॉलर (करीब 3,131 अरब रुपए) का निवेश कर रहा है.

ईरानियों और पाकिस्तान के बलूचिस्तान में रह रहे लोगों के बीच काफी घनिष्ठता है. ईरानियों को शादी-ब्याह या इलाज के लिए पाकिस्तान का 15 दिन का वीजा आराम से मिल जाता है. यहां तक कि इलाज के लिए वीजा मिलने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती. पाकिस्तान में ईरान के लोगों की सहज आवाजाही से आशंकित होकर भी पाकिस्तान अक्सर भारत पर यह आरोप लगाता रहता है कि वह बलूचिस्तान प्रांत में अस्थिरता फैला रहा है.

मार्च 2016 में पाकिस्तान ने कुलभूषण जाधव नाम के शख्स को बलूचिस्तान से गिरफ्तार किया था. कथित तौर पर उसने कबूल भी किया कि वह भारत की खुफिया एजेंसी रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) का एजेंट है. कुलभूषण ईरान के रास्ते से ही पाकिस्तान में दाखिल हुआ था. इसीलिए जब ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी इस्लामाबाद की यात्रा पर गए तो पाकिस्तान ने उनके सामने सख्त एतराज जताया. यही नहीं, उन्हें पाकिस्तानी मीडिया की तरफ से भी इस बाबत तीखे सवालों का सामना करना पड़ा था.

चाबहार में भारत की पहुंच से चीन भी चिंतित है

चाबहार की अहमियत इतनी अधिक है कि इस पर बढ़ते भारतीय प्रभाव से चीन भी चिंतित है. शायद यही वजह रही कि जब ये खबरें आईं कि चाबहार बंदरगाह के विकास कार्यों की गति से ईरानी अधिकारी बहुत खुश नहीं हैं, तो चीन और पाकिस्तान के खेमे ने राहत महसूस की. लेकिन भारत ने जल्द ही स्पष्ट कर दिया कि मई 2016 में हुए समझौते के वक्त जो समय सीमा तय की गई थी, उसी के भीतर काम पूरा होगा. यह समझौता त्रिपक्षीय था. इसमें भारत-ईरान के साथ अफगानिस्तान भी शामिल था.

चाबहार बंदरगाह के जरिए अफगानिस्तान को भारत से व्यापार करने के लिए एक और रास्ता मिला है. अभी पाकिस्तान के रास्ते भारत-अफगानिस्तान के बीच व्यापार होता है. लेकिन पाकिस्तान इसमें रोड़े अटकाता रहता है, इससे अफगानिस्तान असहज महसूस करता है. वह कई बार इस पर नाराजगी भी जता चुका है. पिछले सितंबर में ही अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी पाकिस्तान की यात्रा के दौरान वहां की सरकार को दो टूक सुनाकर आए थे. उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि अगर पाकिस्तान को मध्य एशिया तक पहुंच बनानी है तो भारतीय ट्रकों को अफगानिस्तान पहुंचने का सहज रास्ता देना होगा.

यही वजह है कि भारत पर अफगानिस्तान की तरफ से भी दबाव है कि वह चाबहार परियोजना को जल्द से जल्द पूरा करे. वैसे, बंदरगाह परियोजना से जुड़े एक अधिकारी का कहना है कि समुद्र तल को गहरा करने का काम जल्द पूरा हो जाएगा और भारतीय मालवाहक जहाज एकाध महीने के भीतर ही यहां खड़े हो सकते हैं. फिर भी ईरानी अधिकारी चाहते हैं कि भारत सरकार इस परियोजना को और तेज गति से पूरा करे. राजदूत अब्दल हमीद फकरी इस बाबत अपना अचरज छिपाने की कोशिश भी नहीं करते.

फकरी राजधानी तेहरान स्थित सरकार के थिंक टैंक (वैचारिक संगठन या संस्था) से भी जुड़े हैं. वे कहते हैं, ‘भारतीय जहाज महज मित्रवत यात्रा पर ही चाबहार क्यों नहीं आ सकते. ताकि यहां उनकी उपस्थिति पर पुख्ता मुहर लग जाए.’ उनकी बात गौर करने लायक है. तेहरान में आम आदमी से भी चाबहार की बात करें तो जवाब यही मिलेगा कि वह जगह जहां भारत बंदरगाह विकसित कर रहा है. इसीलिए भारत से थोड़ी और गंभीरता की अपेक्षा भी है.

मध्य एशिया का द्वार

जहां तक भारतीयों का ताल्लुक है तो उन्हें अच्छी तरह पता है कि चाबहार उनके लिए कितनी अहमियत रखता है. इससे उनके लिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया के द्वार खुल सकते हैं. यही कारण रहा कि पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो अहम यात्राओं के दौरान चाबहार का मसला मुख्य चर्चा का विषय रहा. पहले जापान यात्रा के दौरान जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे मोदी ने इस पर बात की. आबे ने मोदी को भरोसा दिलाया कि उनकी सरकार चाबहार परियोजना में भारत की पूरी मदद करेगी.

इसके बाद दोनों नेताओं ने अपने अधिकारियों ने इस दिशा में विस्तृत योजना बनाने को कहा. भारत चाबहार से जाहेदान के बीच रेलवे ट्रैक बिछाना चाहता है. इसके लिए उसे जापानी निवेश की जरूरत है. जापान भी भारत की मदद के लिए तैयार है. क्योंकि उसके लिए भी चाबहार की रणनीतिक आवश्यकता उतनी ही है, जितनी भारत के लिए. यह चीनी प्रभुत्व वाले ग्वादर जैसे बंदरगाहों से इतर मध्य एशिया के उन देशों तक पहुंचने का वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध कराता है, जो दूसरे देशों की जमीनी सरहदों से घिरे हुए हैं.

तुर्कमेनिस्तान और किर्गिजिस्तान के राष्ट्रपति जब दिल्ली आए थे, तो उन्होंने भी चाबहार बंदरगाह तक अपनी पहुंच बनाने का वादा किया था. कुल मिलाकर फारस के समुद्र पर स्थित यह ईरानी बंदरगाह पुराने व्यापारिक रास्तों को नए समझौतों के जरिए नया स्वरूप देने की क्षमता रखता है. चाबहार मुक्त क्षेत्र के प्रबंध निदेशक अब्दोल रहीम कुर्दी कहते हैं, ‘यह बंदरगाह एशिया, अफ्रीका और यूरोप को जोड़ने के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ जगह है. भारत 2003 से इस बंदरगाह के विकास के लिए अपनी रुचि दिखा रहा है. लेकिन ईरान पर पश्चिमी प्रतिबंधों और कुछ हद तक ईरानी नेतृत्व की दुविधा की वजह से बात आगे बढ़ने की गति धीमी रही. हालांकि पिछले तीन साल में काफी प्रगति हुई है.’

पिछले 20 साल में चाबहार में 1,800 कंपनियां पंजीकृत हुई थीं. लेकिन बीते तीन साल में यह संख्या 60 फीसदी तक बढ़ गई है. इसी तरह निवेश भी बढ़ा है. कुर्दी बताते हैं, ‘बदलाव रोज हो रहे हैं.’ भारत में इस्पात, पेट्रोकेमिकल्स, उर्वरक आदि क्षेत्रों में सक्रिय कंपनियां यहां अपनी रुचि दिखा रही हैं. लगातार इसके बारे में जानकारियां ले रही हैं. हालांकि अभी भारत के कारोबारी यह अंदाजा लगाने की कोशिश ज्यादा कर रहे हैं कि चाबहार में निवेश करने के लिए यह सही समय है या नहीं क्योंकि यूरोपीय बैंक अभी ईरान की किसी भी परियोजना में पैसे लगाने से हिचक रहे हैं. ईरान के प्रति अपनी विरोधी सोच को जाहिर कर चुके डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद उनकी आशंकाएं और बढ़ गई हैं.

ट्रंप ने चुनाव में वादा किया है कि ईरान ने दुनिया के पांच शक्तिशाली राष्ट्रों के साथ जो परमाणु समझौता (इसे पी 5+1 कहा जाता है) किया है, उसे वे रद्द कर देंगे. हालांकि अमेरिका में इस समझौते के पक्ष में काफी समर्थन है, लेकिन अब ट्रंप के राष्ट्रपति बन जाने के बाद इसके भविष्य पर आशंका के बादल तो मंडराने ही लगे हैं. शायद यही वजह है कि भारत ने भी चाबहार में विकास कार्यों की गति धीमी कर रखी है. हालांकि विदेश मंत्रालय के कुछ अधिकारियों को लगता है कि चाबहार में अपनी परियोजना को लागू करने में इस तरह का आलस भारत के लिए रणनीतिक भूल साबित हो सकता है.

ईरान भी यह संकेत दे रहा है कि भारत ने अगर देर की तो वह किन्हीं अन्य देशों से भी, जिनमें चीन भी शामिल है, निवेश आमंत्रित कर सकता है. चीन खुद भी इस परियोजना में रुचि ले सकता है. वह पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह का विकास कर ही रहा है, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा भी विकसित कर रहा है. उसने चाबहार से ग्वादर तक एक रेल लाइन बिछाने का प्रस्ताव भी किया था. लेकिन ईरान रणनीतिक कारणों से यह चाहता था कि चाबहार बंदरगाह का विकास भारत ही करे. इसीलिए पहले उसने यह परियोजना भारत को देते समय चीन का दबाव पूरी तरह दरकिनार कर दिया था. हालांकि अब भारत की धीमी गति उसके लिए परेशानी और चिंता का सबब बनती दिख रही है.

ऐसे में भारत को इस परियोजना को पूरा करने में थोड़ी जल्दी दिखानी चाहिए. क्योंकि इससे भारत को मध्य एशिया तक पहुंचने में तो आसानी होगी ही, ट्रांस-शिपमेंट रोड कॉरीडोर का भी उसे लाभ मिल सकेगा. यह कॉरीडोर ईरान यूरोप तक पहुंचने के लिए विकसित कर रहा है. अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण कॉरीडोर इसी का एक हिस्सा है.

चाबहार बनाम ग्वादर

चाबहार कई मायनों में ग्वादर से बेहतर है. चाबहार गहरे पानी में स्थित बंदरगाह है. यह जमीन के साथ मुख्य भू-भाग से भी जुड़ा हुआ है, जहां सामान उतारने-चढ़ाने का कोई शुल्क नहीं लगता. इस बंदरगाह के दो घाट हैं. एक- शाहिद कालांतरी, जहां से 25,000 टन क्षमता वाले बंकर (जहाजों के लंगर डालने के लिए जगह) हैं. दूसरा घाट है- शाहिद बाहेश्ती, जहां 40,000 टन की क्षमता वाले बंकर मौजूद हैं. इसके अलावा यहां कुशल कामगारों की भी कमी नहीं है. चाबहार मैरीटाइम यूनिवर्सिटी से निकलने वाली प्रतिभाएं विश्वस्तरीय बंदरगाह को संचालित कर सकती हैं. यहां मौसम सामान्य रहता है और हिंद महासागर से गुजरने वाले समुद्री रास्तों तक भी यहां से पहुंच बहुत आसान है.

चाबहार मुक्त क्षेत्र के अधिकारी किसी भी कंपनी को यह बताने ने नहीं चूकते कि इस इलाके में उनका निवेश पूरी तरह सुरक्षित रहेगा. क्योंकि परेशानी वाली जगह फारस की खाड़ी है और यह जगह वहां से काफी दूर है. ईरान-इराक युद्ध के समय ईरानी सरकार ने इस बंदरगाह को अपने समुद्री संसाधनों को सुरक्षित रखने के लिए काफी इस्तेमाल किया था. इस सबके बावजूद भारत में एक तबका है, जो मानता है कि तालिबान या किसी अन्य चरमपंथी समूह ने अगर काबुल पर कब्जा कर लिया तो चाबहार में भारत का पूरा निवेश डूब जाएगा. अफगानिस्तान में यही हो रहा है, जहां भारत लगभग दो अरब डॉलर (करीब 136.5 अरब रुपए) का निवेश कर भी चुका है. लेकिन उसे यह पता नहीं कि इस निवेश का कोई लाभ भी होगा या नहीं? शायद यही आशंकाएं हैं, जिन्होंने मोदी सरकार के सामने पाकिस्तान को अलग-थलग करने के लिहाज से क्षेत्रीय विदेश नीति को आकार देने में रोड़ा अटका रखा है.

हालांकि इसके बावजूद चाबहार की अहमियत तो पहचाननी ही होगी. अफगानिस्तान तक सामान पहुंचाने के लिए यह सबसे बढ़िया रास्ता है. यहां वे तमाम सुविधाएं हैं, जिनके मार्फत सिस्तान, बलूचिस्तान, खोरासान प्रांतों तक भी आसानी से व्यावसायिक पहुंच बनाई जा सकती है. भारत का मूंदड़ा बंदरगाह यहां से सिर्फ 900 किलोमीटर की दूरी पर है, जिसका अपना बड़ा बाजार है और जहां राजनीतिक स्थायित्व भी है. ऐसे में चाबहार मुक्त क्षेत्र में मौजूद असीमित संभावनाओं का पूरा लाभ लिया जा सकता है. संयुक्त विदेशी और घरेलू निवेश को आकर्षित कर यहां एक समृद्ध औद्योगिक क्षेत्र विकसित किया जा सकता है, जो कि भारत को जल्द से जल्द करना भी चाहिए.

(यह आलेख मूल रूप से हार्डन्यूज में प्रकाशित हुआ है.)