दिल्ली के पुलिस कमिश्नर की रेस में तीन अफसर शामिल थे. पहले अफसर हैं धर्मेंद्र कुमार. 1984 बैच के आईपीएस अफसर धर्मेंद्र कुमार दिल्ली पुलिस में स्पेशल कमिश्नर रह चुके हैं. इस वक्त वे सीआईएसएफ में अतिरिक्त पुलिस महानिरीक्षक के पद पर तैनात हैं. दूसरे अफसर हैं 1984 बैच के आईपीएस दीपक मिश्रा. दीपक मिश्रा भी दिल्ली पुलिस में स्पेशल कमिश्नर थे और वर्तमान में सीआरपीएफ के अतिरिक्त पुलिस महानिरीक्षक हैं. लेकिन सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि इन दो वरिष्ठ अफसरों को नज़रअंदाज़ कर मोदी सरकार इनसे एक साल जूनियर अमूल्य पटनायक को दिल्ली पुलिस की कमान सौंपने वाली है.

अमूल्य पटनायक 1985 बैच के आईपीएस ऑफिसर हैं और फिलहाल दिल्ली पुलिस में स्पेशल कमिश्नर(प्रशासन) के पद पर कार्यरत हैं. उन्हें आलोक वर्मा की जगह दिल्ली पुलिस का मुखिया चुना जाना तय माना जा रहा है. गौर करने वाली बात यह भी है कि आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक चुनते वक्त केंद्र सरकार ने उनकी वरिष्ठता की दलील दी थी. लेकिन उनके जाने के बाद अमूल्य पटनायक को चुनते वक्त वरिष्ठता के उसी पैमाने को दरकिनार किया जा रहा है. इससे पहले सेना प्रमुख को चुनते वक्त भी सरकार ने वरिष्ठता का ध्यान नहीं रखा था.

दिल्ली में नए उपराज्यपाल अनिल बैजल की नियुक्ति के बाद यह दूसरा महत्वपूर्ण बदलाव है. सुनी-सुनाई है कि पुलिस कमिश्नर बनने की दौड़ में पहले दीपक मिश्रा सबसे आगे थे. दिल्ली पुलिस के एक अफसर की बात मानें तो उनके पास दिल्ली पुलिस में अलग-अलग ओहदों पर काम करने का सबसे ज्यादा अनुभव है. उन्हें दिल्ली पुलिस की बारीकियों की जानकारी है. लेकिन गृह मंत्रालय ने दीपक मिश्रा और धर्मेंद्र कुमार को कमिश्नर न बनाने का मन शायद पहले ही बना लिया था. इसीलिए दोनों अफसरों का तबादला सीआईएसएफ और सीआरपीएफ में कर दिया गया था.

अमूल्य पटनायक नए उपराज्यपाल और गृह मंत्रालय की पसंद बताए जाते हैं. दिल्ली की पुलिस व्यवस्था बाकी राज्यों से अलग है. यहां पुलिस सरकार के नहीं उपराज्यपाल के ही अधीन काम करती है. दिल्ली में पुलिस कमिश्नर का पद इसलिए भी अहम है क्योंकि उसके और उपराज्यपाल के जरिये केंद्र सरकार यहां कई चीजों पर अपना नियंत्रण बनाये रख सकती है. पूर्व पुलिस कमिश्नर बीएस बस्सी के वक्त अरविंद केजरीवाल और बस्सी का झगड़ा सभी ने देखा है.

यह भी इत्तेफाक से कुछ ज्यादा ही है कि पिछले दो बार से जो अफसर दिल्ली पुलिस का कमिश्नर बना उसकी किस्मत खुली. रिटायर होने के बाद बीएस बस्सी को यूपीएससी का सदस्य बनाया गया. सरकार तो उन्हें सूचना आयुक्त बनाना चाहती थी लेकिन लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के विरोध के बाद वे सूचना आयुक्त बनते-बनते रह गए थे. आलोक वर्मा के साथ भी ऐसा ही हुआ, रिटायरमेंट से ठीक पहले उन्हें सीबीआई निदेशक बना दिया गया. अब वे दो साल तक इस पद पर रहेंगे.

सियासत के जानकार कहते हैं कि दिल्ली पुलिस कमिश्नर का पदसुनने में भले छोटा लगता हो लेकिन इस पर बैठने वाले व्यक्ति की हैसियत दिल्ली के मुख्यमंत्री से अधिक होती है. इसलिए यहां का पुलिस कमिश्नर कौन बनेगा इसका फैसला प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के स्तर पर किया जाता है.