पिछले दिनों अमेरिकी चुनाव में रूस के दखल की बात सामने आने की खबरों के बीच जर्मनी के एक अखबार में अमेरिकी रक्षा विभाग के कुछ पूर्व अधिकारियों का एक साक्षात्कार छपा था. रूस को लेकर इन अधिकारियों का कहना था, ‘अमेरिकी प्रशासन को यह बात समझनी होगी कि व्लादिमीर पुतिन और बहुत सारे रूसी लोगों के मन में 1990 के दशक में हुए सोवियत संघ के पतन को लेकर भारी कड़वाहट है. उनके हिसाब से दुनिया में रूस का जो स्थान होना चाहिए था, वह उसके पास नहीं है और वे इसे फिर हासिल करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं.’ इन अधिकारियों के मुताबिक राष्ट्रपति पुतिन अपने देश का खोया हुआ रसूख वापस दिलाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं. जबकि इराक और अफगानिस्तान में युद्धों से सहमा अमेरिका जोखिम उठाने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है.

इस बातचीत से हटकर भी अगर पुतिन के फैसलों को देखें तो साफ़ पता चलता है कि पुतिन विश्व पटल पर रूस के रुतबे को कायम करने की रणनीति पर लगे हुए हैं. खास बात यह है इस मामले में रूसी जनता पूरी तरह से उनके साथ है जिसका मानना है कि रूस को उसका खोया हुआ गौरव पुतिन ही वापस दिला सकते हैं. इसीलिए पिछले डेढ़ दशक से ज्यादा समय से वह लगातार उन्हें रूस की सत्ता सौंपे जा रही है. काफी विवादों के बाद भी रूस के लोगों ने पुतिन का तब भी जमकर साथ दिया था जब उन्होंने 2012 में संविधान में बदलाव कर एक व्यक्ति के सिर्फ दो बार राष्ट्रपति बनने की शर्त को समाप्त कर दिया था. इसके बाद वे तीसरी बार रूस के राष्ट्रपति बन गए.

पुतिन के काम को करीब से देखने वाले कुछ रूसी पत्रकार कहते हैं कि पुतिन की पूरी राजनीति शुरू से एक रणनीति के तहत आगे बढ़ी है. पहले दो बार राष्ट्रपति और उसके बाद प्रधानमंत्री रहते हुए उनका पूरा जोर केवल रूस की रक्षा और आर्थिक स्थिति को मजबूत करने पर था. और इस दौरान उन्होंने रूस को अमेरिका के स्तर की या उससे अधिक ताकत देने में कामयाबी भी पायी. इन लोगों के मुताबिक अपने पिछले कार्यकालों में रूस की ताकत बढ़ाने के बाद अब पुतिन अपना पूरा ध्यान विश्व पटल पर रूस के वर्चस्व को स्थापित करने पर लगा रहे हैं.

2012 में पुतिन के तीसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद से दुनिया के किसी भी कोने में शायद ही कोई ऐसा मामला हो जिसमें रूस की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भूमिका न रही हो. साथ ही वह हर जगह अमेरिका को चुनौती देता हुआ भी नजर आ रहा है. इन मामलों पर नजर दौड़ाएं तो यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि रूस एक बार फिर विश्व सत्ता में अपनी धाक ज़माने के काफी करीब पहुंच चुका है.

अपने पिछले कार्यकालों में रूस की ताकत बढ़ाने के बाद अब पुतिन अपना पूरा ध्यान विश्व पटल पर रूस के वर्चस्व को स्थापित करने पर लगा रहे हैं.  

तीसरी बार राष्ट्रपति बनने के एक साल बाद ही पुतिन ने सबसे पहले अपने पड़ोसी देश यूक्रेन के राज्य क्रीमिया को रूस में शामिल करने की कोशिशें तेज कर दीं. यूरोपीय संघ, और अमेरिकी सदस्यता वाले नाटो समूह के प्रबल विरोध के बाद भी वे पीछे नहीं हटे. कई दिनों के संघर्ष के बाद रूसी सेना ने आखिरकार क्रीमिया को अपने कब्जे में ले ही लिया. इस घटना से नाराज अमेरिका और यूरोपीय संघ ने रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए. लेकिन इन प्रतिबंधों के बावजूद इस पूरे घटनाक्रम को जानकार रूस की बढ़ती ताकत और अमेरिका के लिए बड़े झटके की तरह देखते हैं.

इस घटना के करीब साल भर बाद ही रूस ने अपनी नीतियों से अलग पहली बार मध्य पूर्व की राजनीति में दखल दिया. उसने 2015 में सीरिया में चल रहे गृहयुद्ध में राष्ट्रपति बशर अल असद का साथ देने का ऐलान कर दिया. अमेरिका के लिए यह किसी बड़े झटके से कम नहीं था क्योंकि वह सीरिया में राष्ट्रपति असद को सत्ता से हटाने की मुहिम पर लगा था. रूस के इस फैसले से उसे क्रीमिया के बाद एक बार फिर विश्व पटल पर अफनी किरकिरी होने का डर भी सता रहा था. रूस के सीरिया में दखल के बाद वैसा ही हुआ भी. वहां अमेरिका, सऊदी अरब और इजरायल के समर्थन वाले विद्रोही गुटों को रूसी हमलों के बाद मुंह की खानी पड़ी. असद सरकार ने रूस की मदद से एक के बाद एक होम्स, हामा, दमिश्क, लताकिया और अलेप्पो जैसे अपने बड़े शहरों पर वापस अपना कब्जा जमा लिया.

सीरिया में हुए इस पूरे घटनाक्रम को जानकार रूस के बढ़ते और अमेरिका के घटते वर्चस्व की दूसरी निशानी के तौर पर देखते हैं. इनके मुताबिक सीरिया से पहले अमेरिका ने जिस देश में भी दखल दिया वहां तख्तापलट कर दिया. लीबिया, ट्यूनीशिया, युगोस्लाविया, ईराक और अफगानिस्तान इसके उदाहरण हैं. लेकिन, सीरिया में लाख कोशिशों के बाद भी अमेरिका ऐसा करने में सफल नहीं हो सका. इसकी वजह केवल रूस को माना जाता है जिसने असद सरकार की मदद कर अमेरिका के अरमानों पर पानी फेर दिया.

सीरिया के अलावा मध्यपूर्व के अन्य कूटनीतिक मामलों में भी रूस का दखल लगातार बढ़ रहा है. मात्र दो साल में उसने मध्यपूर्व में लगभग वैसी ही स्थिति बना ली है जैसी कभी अमेरिका की हुआ करती थी. पहले यहां रूस का केवल एक नेवल बेस, सीरिया में हुआ करता था. लेकिन बीते दो सालों में उसने ईरान से ऐसे संबंध बनाये कि सीरिया युद्ध के दौरान उसने रूसी वायु सेना को अपने यहां हर तरह की सुविधायें मुहय्या कराईं. साथ ही रूस ईरान के साथ वह सैन्य समझौता करने में भी कामयाब हुआ जिसने उसे फारस की खाड़ी में मजबूती दी. जानकारों की मानें तो द्वतीय विश्व युद्ध के बाद से ही रूस इस समझौते के प्रयास में लगा था. मध्य-पूर्व में पुतिन की कूटनीतिक सफलता को इस तरह से भी देख सकते हैं कि एक ओर तो वह ईरान और सीरिया जैसे देशों के साथ अच्छे संबंध बनाए हुए है वहीं दूसरी ओर इनके कट्टर दुश्मन और अमेरिका के परम मित्र इजरायल के साथ भी उसका बेहतर तालमेल बना हुआ है.

कहा जा रहा है कि अमेरिका के घटते वर्चस्व को देखते हुए उसका एक और मित्र देश - सऊदी अरब - रूस के करीब जाने का मन बना चुका है.

रूसी मीडिया की मानें तो पुतिन इजरायल के प्रधानमंत्री नेतान्याहू को यकीन दिला चुके हैं कि सीरिया और ईरान इजरायल के वजूद के लिए खतरा नहीं है बल्कि ये देश सुन्नी चरमपंथ को हराने में उसके मददगार ही साबित हो सकते हैं. रूस ऊर्जा, कृषि और हथियारों के क्षेत्रों में इजरायल का बड़ा सहयोगी है. साथ ही वह इस बात का भी ख्याल रखता है कि इजरायल के दुश्मनों के पास घातक हथियार न पहुंचे. हालांकि, इजरायल से बेहतर रिश्तों का एक कारण ईरान समझौते के बाद इजरायल और अमेरिका के रिश्तों में आई खटास को भी माना जाता है.

उधर, पिछले दिनों अरब मीडिया से भी खबरें आ रही हैं कि अमेरिका के घटते वर्चस्व को देखते हुए उसका एक और मित्र देश - सऊदी अरब - रूस के करीब जाने का मन बना चुका है. सऊदी अरब इन दिनों रूस के साथ मिलकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों को स्थिर करने के प्रयास में लगा है. वह चाहता है कि इस मामले में पुतिन ईरान पर दबाव डालें.

वहीं, तुर्की के मामले में रूस और तुर्की की दोस्ती दुनिया के लिए मिसाल बनने के साथ-साथ उसे चौंकाने वाली भी है. 24 नवंबर 2015 को जब तुर्की सेना ने सीरिया की सीमा के पास एक रूसी जेट को उड़ा दिया था तो लगा कि अब तुर्की और रूस के रिश्ते लंबे समय के लिए खत्म होने वाले हैं. लेकिन, करीब सात महीने के झगड़े के बाद 27 जून को एर्दोआन ने पुतिन को पत्र लिख कर इस घटना पर अफसोस व्यक्त किया और फिर से दोनों के बीच दोस्ताना रिश्ते बहाल हो गए. इनकी दोस्ती का पता इस बात से भी चलता है कि 15 जुलाई को तुर्की में तख्तापलट की नाकाम कोशिश के बाद एर्दोआन ने सबसे पहले अगर किसी को फोन किया तो वह व्लादिमीर पुतिन ही थे. जानकार कहते हैं कि रूस द्वारा तुर्की की गलतियों पर पर्दा डालने या उसके सारे पाप माफ़ करने के पीछे का सबसे बड़ा कारण यूरोपीय संघ है. पुतिन को पता है कि यूरोपीय संघ की सीमा से सटा तुर्की कभी भी उसके लिए तुरुप का इक्का साबित हो सकता है.

उधर, हाल ही में रूस ने अफगानिस्तान में अपनी सक्रियता बढ़ाकर दुनिया भर के विश्लेषकों को हैरान कर दिया. क्योंकि इससे पहले सालों तक अफगानिस्तान में जारी संकट से उसने दूरी बना रखी थी. हाल में अचानक रूस ने अफगानिस्तान में सक्रिय आतंकी संगठन तालिबान को संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के आतंकी संगठनों की सूची से हटवाने की मुहिम छेड़ दी है. इस मुद्दे पर मॉस्को में रूस, चीन और पाकिस्तान की एक बैठक भी हुई है. बताया जाता है कि इसमें इस मुहीम पर सहमति भी बन गई है. माना जा रहा है कि तालिबान को यूएन की सूची से हटवाकर रूस उसे आतंकी संगठन आईएस के खिलाफ इस्तेमाल करना चाहता है.

एक अमेरिकी राष्ट्रपति के रूस के प्रति ऐसे नरम व्यवहार को देखते हुए माना जा रहा है कि पुतिन ने अपने लक्ष्य के बीच में आने वाले सबसे बड़े रोड़े को लगभग हटा दिया है.  

इन सभी मामलों के बाद रूस द्वारा अमेरिकी चुनाव में दखल देना हाल की सबसे बड़ी घटना रही है. यह घटना उन अधिकारियों की बातचीत को कहीं न कहीं सच साबित करती है जिनका कहना था कि रूस अपने वर्चस्व को स्थापित करने के लिए कुछ भी करने को तैयार है. अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के सबूतों के बाद इस पर कोई शक नहीं रह गया है कि अमेरिकी चुनाव में हिलरी क्लिंटन को हरवाने के लिए हैकिंग पुतिन के कहने पर ही की गयी थी. जानकार कहते हैं कि पुतिन ने यह दांव बहुत सोच-समझ कर खेला था. वे अच्छे से जानते हैं कि विश्व पटल पर रूस के वर्चस्व के लिए अमेरिका ही सबसे बड़ी परेशानी है और अगर चुनाव में पुतिन की प्रबल विरोधी हिलेरी क्लिंटन जीत जाती हैं तो उसे आगे भी इस परेशानी का सामना पहले की तरह ही करना पड़ता. वहीँ दूसरी ओर डोनाल्ड ट्रंप का रुख रूस के प्रति काफी नरम रहा है. क्रीमिया, सीरिया सहित लगभग हर मामले में ट्रंप और पुतिन की सोच लगभग एक जैसी ही है.

राष्ट्रपति चुने जाने के बाद ट्रंप ने पुतिन के करीबी माने जाने वाले माइकल फ्लिन को एनएसए और रेक्स टिलरसन को विदेश मंत्री चुनकर रूस के प्रति अपने नरम रुख का प्रमाण भी दे दिया है. 2014 में माइकल फ्लिन को ब्लादिमीर पुतिन से संबंधों के चलते ही बराक ओबामा ने डिफेंस इंटेलीजेंस एजेंसी के चीफ के पद से हटाया था. इसके अलावा पिछले दिनों ही ट्रंप ने रूस पर लगे प्रतिबंध हटाने के संकेत देकर अमेरिकी राजनीति में खलबली मचा दी है. एक अमेरिकी राष्ट्रपति के रूस के प्रति ऐसे नरम व्यवहार को देखते हुए माना जा रहा है कि पुतिन ने अपने लक्ष्य के बीच में आने वाले सबसे बड़े रोड़े को लगभग हटा दिया है.

अंतराष्ट्रीय मामलों के कुछ जानकार कहते हैं कि ट्रंप की रूस के प्रति नरमी के अलावा अगर उनके फैसलों पर भी गौर करें तो इनसे कहीं न कहीं रूस को अंतरराष्ट्रीय सत्ता पाने के लिए एक रास्ता मिलता दिख रहा है. ट्रंप के अब तक किये गये फैसलों और वादों से साफ़ पता चलता है कि उनका पूरा जोर केवल अमेरिकी हितों को साधने पर ही है. यह इससे पहले की अमेरिकी नेतृत्व की उस सोच के एकदम विपरीत है जो विश्व सत्ता को हासिल करने या अपने सहयोगी देशों को ध्यान में रखकर ही कोई फैसला लिया करता था. ये लोग कहते हैं कि ओबामा केयर को बंद करने के अलावा ट्रंप के अब तक के सभी फैसले सीधे तौर पर केवल अमेरिका के लिए फायदेमंद दिख रहे हैं. लेकिन इनसे कई देश नकारत्मक रूप से प्रभावित हो रहे हैं. इन जानकारों का मानना है कि ट्रंप का ‘अमेरिका ग्रेट अगेन’ का यह नजरिया खुद-ब-खुद रूस को वैश्विक स्तर पर पकड़ बनाने में मदद करेगा.