अब तक हुए चुनावी सर्वेक्षणों के अनुसार उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत मिलता दिख रहा है. कुल 70 विधानसभा सीटों वाले इस प्रदेश में बहुमत के लिए 36 सीट चाहियें. इंडिया टुडे-एक्सिस के सर्वेक्षण में भाजपा को यहां 40 से 44 सीटें मिल रही हैं, एबीपी न्यूज़-लोकनीति के सर्वेक्षण में 35 से 43 सीट और द वीक के सर्वेक्षण के अनुसार भाजपा प्रदेश की 37 से 39 सीटें जीत रही है. सर्वेक्षणों के ये आंकड़े यदि सही साबित हुए तो चुनाव बाद की जो तस्वीर उत्तराखंड में बन सकती है वह बेहद दिलचस्प हैं. दिलचस्प यूं कि ऐसी स्थिति में सरकार तो भाजपा की बनेगी लेकिन उसके मंत्रिमंडल में शायद ‘कांग्रेस’ का ही बोलबाला होगा.

उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों उसी तेजी से पलायन हो रहा है जिस तेजी से बीते कुछ सालों में यहां के पहाड़ों से हुआ है. यहां कई बड़े नेता अपनी पार्टी से पलायन कर गए हैं तो कई अपने विधानसभा क्षेत्र से. दिलचस्प यह है कि ठीक चुनावों से पहले पार्टी बदलने वाले ऐसे अधिकतर नेताओं को उऩकी नई पार्टियों ने टिकट देकर चुनावी मैदान में भी उतार दिया है. अकेले भाजपा में ही ऐसे कम-से-कम 13 प्रत्याशी हैं जो हाल ही में कांग्रेस छोड़कर आए हैं. स्वाभाविक है कि भाजपा ने अपने कार्यकर्ताओं और पुराने दावेदारों की नाराज़गी मोल लेकर भी इन लोगों को इसलिए टिकट सौंपे है क्योंकि इनकी जीत लगभग तय मानी जा रही है. भाजपा में अभी-अभी आए ये सभी प्रत्याशी अगर चुनाव जीत गए तो ये भाजपा की सरकार तो बनवा देंगे लेकिन मंत्री पदों के सबसे बड़े दावेदार भी खुद ही बन जाएंगे.

हरक सिंह रावत, यशपाल आर्य, शैलेंद्र मोहन सिंघल, कुंवर प्रणव ‘चैंपियन’, शैला रानी रावत, सुबोध उनियाल, उमेश शर्मा ‘काउ’, प्रदीप बत्रा और रेखा आर्य. ये सभी कांग्रेस के विधायक थे लेकिन इस बार अपनी ही सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. इनके अलावा कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा भी अब भाजपा में हैं और उनकी सीट से उनके बेटे सौरभ बहुगुणा को भाजपा ने टिकट सौंपा है. इसी तरह कांग्रेस सरकार में मंत्री रही अमृता रावत भी अब भाजपा में शामिल हो चुकी हैं लेकिन चुनाव में उनकी जगह उनके पति सतपाल महाराज भाजपा के प्रत्याशी बने हैं.

कांग्रेस से भाजपा में आते ही टिकट पाने वाले दो नाम और भी हैं - केदार सिंह रावत और संजीव आर्य. केदार सिंह रावत तो पहले भी विधायक रह चुके हैं लेकिन युवा नेता संजीव आर्य को भाजपा ने इसलिए टिकट दिया है क्योंकि वे कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य के बेटे हैं. हाल ही में वे अपने पिता के साथ भाजपा में शामिल हुए तो इसी शर्त पर शामिल हुए हैं कि भाजपा पिता-पुत्र दोनों को टिकट देगी. यह शर्त पूरी भी हुई है.

भाजपा यदि उत्तराखंड में पूर्ण बहुमत वाली सरकार भी बनाती है तो भी कैबिनेट में कई चेहरे वही होंगे जो पिछली कांग्रेस सरकार की कैबिनेट में देखे जाते थे  

इन तमाम नामों में अधिकांश ऐसे हैं जो चुनाव जीतने के बाद मंत्री बनने के भी प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं. यहां तक कि सतपाल महाराज और विजय बहुगुणा तो मुख्यमंत्री पद की भी दावेदारी ठोक रहे हैं. यह बात चौंकाने वाली जरूर लगती है कि अभी-अभी भाजपा में शामिल हुए ये नेता सीधे मुख्यमंत्री पद के दावेदार कैसे हो सकते हैं. लेकिन इस दावे के पीछे एक मजबूत गणित भी है. भाजपा यदि बहुमत के आंकड़े से तीन-चार सीट ज्यादा से जीतती है तो उसके विधायकों में लगभग एक-तिहाई वही पुराने कांग्रेसी होंगे जिन्हें इन दिनों ‘बागी’ उपनाम से भी जाना जाता है. यदि ऐसा हुआ तो भाजपा इनकी शर्तों पर काम करने को मजबूर होगी क्योंकि तब इन बागियों के पास चुनाव के बाद दोबारा पार्टी बदलने या अपनी नई पार्टी बना लेने का विकल्प खुला होगा. अगर ऐसे विधायकों की संख्या एक-तिहाई से एकाध कम होगी तो ये लोग पुराने भाजपाइयों को तोड़ने के प्रयास भी कर सकते हैं.

माना जा रहा है कि विजय बहुगुणा तो काफी समय से इसी गणित के आधार पर काम भी कर रहे हैं. उत्तराखंड भाजपा के एक कार्यकर्ता बताते हैं, ‘टिकट बंटवारों से लेकर चुनाव प्रबंधन तक में विजय बहुगुणा पुराने स्थानीय भाजपाइयों पर भारी पड़ रहे हैं. उन्होंने हाल-फिलहाल में कांग्रेस के कई ग्राम प्रधानों, क्षेत्र पंचायत सदस्यों और ऐसे छोटे-छोटे नेताओं को तोड़कर भाजपा में शामिल करवाया है जो हर सीट पर दो-तीन हजार वोट प्रभावित करने की काबिलियत रखते हैं. अब यदि इन सीटों पर भाजपा एक-दो हजार वोट के मामूली अंतर से ही चुनाव जीतती है तो बहुगुणा पार्टी में और मजबूत हो जाएंगे.’

इन समीकरणों को देखें तो प्रबल संभावनाएं हैं कि भाजपा यदि उत्तराखंड में पूर्ण बहुमत वाली सरकार भी बनाती है तो भी कैबिनेट में कई चेहरे वही होंगे जो पिछली कांग्रेस सरकार की कैबिनेट में देखे जाते थे. यदि भाजपा बहुमत के आंकड़े से कुछ ही सीट पीछे रहकर निर्दलीय प्रत्याशियों के दम पर सरकार बनाती है, तब तो उसकी कैबिनेट में कांग्रेस मंत्रिमंडल वाले चेहरे और भी ज्यादा हो सकते हैं. क्योंकि तब शायद भाजपा की सरकार प्रीतम पंवार और दिनेश धनै जैसे मजबूत निर्दलीय प्रत्याशियों के दम पर ही बन सके जो पिछली सरकार में भी मंत्री बनने की शर्त पर ही शामिल हुए थे और इस बार भी वही करेंगे.

इन समीकरणों से ठीक उलट यदि उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार बनती है, जिसकी फिलहाल तो उम्मीद कम ही है, तो उसकी कैबिनेट में शायद कई नए चेहरे देखने को मिल सकते हैं. क्योंकि कांग्रेस के तमाम वे नेता, जो सरकार बनने पर मंत्री पद के दावेदार होते, अब भाजपा में हैं. इसीलिए कहा जा सकता है कि उत्तराखंड में पुरानी सरकार के लौटने पर शायद नया मंत्रिमंडल देखने को मिले जबकि नई सरकार बनने पर शायद मंत्रिमंडल पुराना ही हो.