उत्‍तराखंड के लोकवाद्यों की बात बैगपाइप यानी मशकबीन के बिना पूरी नहीं हो सकती. लेकिन दिलचस्‍प बात यह है कि परंपरागत ढोल-नगाड़े के साथ संगत देने वाली मशकबीन यहां स्‍कॉटलैंड से आई है. बैगपाइप स्‍कॉटलैंड का राष्‍ट्रीय वाद्य है लेकिन अब यह उत्‍तराखंड के लोक संगीत में इस कदर घुल मिल गई है कि इसके बिना यहां के लोकवाद्यों की सूची अधूरी लगती है.

बैगपाइप से मशकबीन बनने की कहानी

बैगपाइप के उत्‍तराखंड में आने की कहानी एक सदी से भी पुरानी है. 19वीं सदी में उत्‍तराखंड के पहाड़ी इलाकों में ब्रिटिश फौज सबसे पहले इसे लेकर आई थी लेकिन इसे लोकप्रियता मिली 20वीं सदी में. उत्‍तराखंड के मशहूर लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी बताते हैं, ‘पहले विश्‍वयुद्ध में गए गढ़वाली और कुमाउंनी सैनिकों ने मशकबीन को सीखा और इस कला को अपने यहां ले आए. दूसरे विश्‍वयुद्ध में भी कई गढ़वाली सैनिकों को मशकबीन मे प्रशिक्षित किया गया. इन्‍हीं सैनिकों ने फौज से घर आने के बाद मशकबीन की कला को शादी-ब्‍याह जैसे समारोहों का हिस्‍सा बनाया.’ नेगी आगे बताते हैं कि बाद में भारतीय सेना में मशकबीन के शामिल होने से इसका आकर्षण बढ़ता गया और यह वाद्य उत्‍तराखंड के पहाड़ी इलाकों के लिए अपना सा हो गया.

संगीत के जानकार और देहरादून स्थित प्रताप म्‍यूजिक हाउस के मालिक अजीत सिंह बताते हैं, ‘अंग्रेजों की सिखलाई का असर अभी इसमें दिखता है. सुदूर पहाड़ी इलाकों में आप पुराने वादकों को मशकबीन पर स्‍कॉटिश धुनें बजाते हुए सुन सकते हैं. हालांकि उन्‍हें इस बात की जानकारी नहीं रहती कि वे कहां की धुन बजा रहे हैं.’ उत्‍तराखंड के लोकसाहित्‍य पर शोध कर रहे डॉ कपिल थपलियाल कहते हैं, ‘भले ही मशकबीन का मूल कहीं और है लेकिन, जिस तरह से इसे बजाने की कला उत्तराखंड में पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ी उसने इसे उत्तराखंड के लोकवाद्य के रूप में स्‍थापित कर दिया.

मशकबीन ने लोकसंस्‍कृति में एक अधूरी जगह भरी

लोकसंगीत के जानकारों की मानें तो उत्‍तराखंड के परंपरागत वाद्य समूह में ढोल, नगाड़ा, डमरू, थाली, हुड़का आदि तो थे, लेकिन फूंक से बजने वाला कोई सुरीला वाद्य नहीं था. मशकबीन ने सुरों की इस कमी को पूरा किया और इस तरह वह लोकसंस्‍कृति का हिस्‍सा बन गई. आज कुमाऊं में छोलिया नृत्‍य और गढ़वाल में पौणा नृत्‍य में नाचने वालों की कदमताल की खूबसूरती मशकबीन की धुन से और बढ़ जाती है. विवाह जैसे मांगलिक कार्यों से लेकर मेले और त्‍यौहारों तक हर मौके के उल्लास को इसके सुर बढ़ा देते हैं. ढोलवादक और लोक कलाकार सोहनलाल बताते हैं, ‘मशकबीन हमारी हर प्रस्‍तुति का जरूरी अंग है. छोटे समूह में एक और बड़े समूह में दो या तीन लोग इसे बजाते हैं.’

भारत में मेरठ और जालंधर में मशकबीन की कई फैक्ट्रियां हैं. एक मशकबीन पर छह सौ से साढ़े तीन हजार रुपए तक की लागत आती है. हालांकि सबसे बेहतर मशबीन पाकिस्‍तान के सियालकोट में बनाई जाती हैं लेकिन उत्‍तराखंड में मेरठ और जालंधर की बनी हुई मशकबीन ही मिलती हैं.

बदलते माहौल का असर

परंपरा में रच बस जाने के बावजूद बदलते वक्‍त में लोकवाद्यों पर पैदा हुए संकट का असर मशकबीन पर भी दिखता है. इसे बजाने वाले हुकुमदास, गुड़डूदास और सेवा दास जैसे मशहूर कलाकार अपनी नई पीढ़ी तक इसे नहीं पहुंचा सके हैं. इन सभी का मानना है कि नई पीढ़ी के युवा रोजगार के अन्‍य जरिए तलाश रहे हैं इसलिए उनकी इस काम में रुचि नहीं रह गई है.

इस संकट की तरफ सरकार का ध्यान भी गया है. उत्‍तराखंड संस्‍कृति विभाग की निदेशक बीना भट कहती हैं, ‘हम इससे अनजान नहीं हैं. लोकवाद्यों के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए गुरू-शिष्‍य परंपरा योजना शुरू की गई है. मशकबीन भी इसका हिस्सा है.’ वे बताती हैं कि इस योजना के तहत कई युवा कलाकार वरिष्‍ठ कलाकारों से मशकबीन का प्रशिक्षण भी ले रहे हैं.