कुछ महीने पहले तक राज्यसभा सांसद रहे नवजोत सिंह सिद्धू अब कांग्रेस के टिकट पर अमृतसर पूर्व से विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं. लंबे समय तक भारतीय क्रिकेट टीम में रहे सिद्धू अमृतसर से दो बार भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर लोकसभा सांसद रहे हैं. हालंकि 2014 में उन्हें भाजपा ने टिकट नहीं दिया लेकिन 2016 में उन्हें पार्टी राष्ट्रपति कोटे से राज्यसभा लेकर आई. लेकिन इसके कुछ महीने बाद ही उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया.

पहले नवजोत सिंह सिद्धू की योजना अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली आम आदमी पार्टी में जाने की थी. लेकिन पार्टी उन्हें उनके मन मुताबिक भूमिका देने को तैयार नहीं हुई. इसके बाद कोशिश पंजाब में एक और मोर्चा बनाने की हुई. जब इसमें भी बात नहीं बनी तो तमाम अटकलबाजियों से गुजरते हुए वे कांग्रेस में शामिल हो गए. अब वे अमृतसर पूर्व सीट से पार्टी के उम्मीदवार हैं वहां से उनकी पत्नी नवजोत कौर ने 2012 में विधानसभा चुनाव जीता था.

कांग्रेस के खिलाफ अपनी राजनीति की शुरुआत करने वाले नवजोत सिंह सिद्धू के कांग्रेस में जाने और सांसदी छोड़कर विधायकी का चुनाव लड़ने को लेकर कई तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं. आम लोग यह जानना चाह रहे हैं कि सिद्धू को भाजपा में ऐसा क्या नहीं मिला जो उन्हें कांग्रेस में मिल जाएगा.

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता सत्याग्रह के साथ बातचीत में बताते हैं कि पार्टी ने नवजोत सिंह सिद्धू को बहुत कुछ दिया. वे टेलिविजन पर क्रिकेट मैचों की कमेंटरी कर रहे थे जिस उन्हें 2004 में लोकसभा का टिकट दिया गया था. उन्हें दोबारा 2009 में भी टिकट मिला. 2012 में उनकी पत्नी नवजोत कौर को भी विधानसभा का टिकट मिल गया. इन भाजपा नेता के मुताबिक जब 2014 में अमृतसर से अरुण जेटली के चुनाव लड़ने की बात चली तब भी सिद्धू को पंजाब या हरियाणा की किसी सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ने या राज्यसभा सांसद बनने का विकल्प दिया गया था. लेकिन वे इसके लिए तैयार नहीं हुए. इसके बाद पार्टी ने उन्हें 2016 राष्ट्रपति कोटे से राज्यसभा भेजा.

पंजाब में ही अपनी राजनीतिक भूमिका देखने वाले सिद्धू के लिए यह एक तरह से अनिवार्य हो गया था कि वे भाजपा से बाहर निकलें  

भाजपा में निर्णय ले सकने वाले कई नेताओं की की राय यह है कि सिद्धू को पार्टी ने उनकी राजनीतिक हैसियत के मुकाबले काफी अधिक दिया लेकिन उससे उनका मन नहीं भरा. इनमें से एक के मुताबिक सिद्धू और उनकी पत्नी शिरोमणि अकाली दल को पंसद नहीं करते हैं लेकिन सिर्फ इस वजह से भाजपा अपने एक बहुत पुराने सहयोगी से गठबंधन नहीं तोड़ सकती. गठबंधन जोड़ने या तोड़ने का निर्णय कई राजनीतिक आयामों को ध्यान में रखकर लिया जाता है न कि किसी खास नेता की पसंद या नापसंद के आधार पर. ये पूछने पर कि अब नवजोत सिंह सिद्धू का पंजाब की राजनीति में क्या भविष्य है ये नेता कहते हैं कि उन्हें भी इंतजार रहेगा कि कांग्रेस में सिद्धू को क्या हासिल होता है.

पंजाब में चुनाव अभियानों को करीब से देख रहे लोग मानते हैं कि सिद्धू का कम ही सही लेकिन पंजाब में असर तो है. लेकिन पंजाब के मतदाताओं में इस बात को लेकर भ्रम भी है कि सिद्धू आखिर राजनीतिक तौर पर चाहते क्या हैं! कुछ लोगों का मानना है कि सिद्धू ने अपनी आगे की राजनीति को हर हाल में पंजाब केंद्रित करने का मन बना लिया है. इन लोगों के मुताबिक उन्हें यह लग गया था कि अकाली दल के साथ गठबंधन में रहते हुए पंजाब में उनकी कोई खास भूमिका नहीं हो सकती.

अब ऐसे में पंजाब में ही अपनी राजनीतिक भूमिका देखने वाले सिद्धू के लिए यह एक तरह से अनिवार्य हो गया था कि वे भाजपा से बाहर निकलें. पंजाब में अपनी बड़ी राजनीतिक भूमिका की इच्छा के साथ पहले उन्होंने आप में अपने लिए संभावनाएं टटोलीं लेकिन जब बात नहीं बनी तो कांग्रेस में आ गए. उन्हें लगता है कि आज न सही लेकिन आने वाले समय में पंजाब कांग्रेस में उनकी बड़ी भूमिका हो सकती है.

पंजाब की राजनीति को जानने वालों में से कुछ मानते हैं सिद्धू को यह समझाया गया है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह का यह आखिरी चुनाव है. इसका मतलब यह हुआ कि देर-सबेर पंजाब में कांग्रेस उनसे हटकर सोचने को मजबूर होगी ही. ऐसे में सिद्धू के लिए खुद-ब-खुद संभावनाओं के द्वार खुल जाते हैं. सिद्धू को यह लगता है कि अमरिंदर सिंह के बाद पंजाब में कांग्रेस के पास जो बड़े नेता हैं, उन पर वे भारी पड़ सकते हैं.

कांग्रेस की हार की स्थिति में यह लगभग तय है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह विपक्ष के नेता नहीं बनेंगे और यह जिम्मेदारी सिद्धू को मिल सकती है

दूसरी ओर अगर पंजाब में कांग्रेस जीतती है और कैप्टन अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री बनते हैं तो सिद्धू को उनकी सरकार में भी एक अहम भूमिका मिल सकती है. अगर ऐसा होता है तो सिद्धू की पंजाब के लिए काम करने की इच्छा पूरी हो सकती है. भाजपा-अकाली दल की सरकार में सिद्धू की यह इच्छा बादल परिवार से उनके विवादों के चलते पूरी होना नामुमकिन थी. न तो सिद्धू की ऐसी भूमिका के लिए प्रकाश सिंह और सुखबीर बादल तैयार होते और न ही खुद नवजोत सिंह सिद्धू.

हालांकि, कहने वाले तो यह भी कह रहे हैं कि राज्यसभा सांसद रहते हुए भी सिद्धू पंजाब के लिए काफी कुछ कर सकते थे. लेकिन इस बात में एक पेंच है. सिद्धू राज्यसभा में मनोनीत सांसद थे जिसके चलते केंद्र में उनके मंत्री बनने की संभावना न के बराबर थी. अब तक किसी भी मनोनीत सांसद को मंत्री नहीं बनाया गया है.

लेकिन अगर पंजाब में कांग्रेस की सरकार नहीं बनी तो नवजोत सिंह सिद्धू क्या करेंगे? इसके जवाब में राजनीतिक जानकार बता रहे हैं कि कैप्टन को पूरा भरोसा है कि पंजाब में वे ही मुख्यमंत्री बनेंगे. लेकिन अगर किसी वजह से ऐसा नहीं भी हुआ तो भी कांग्रेस पंजाब विधानसभा में एक बड़ी पार्टी तो रहेगी ही. ऐसी स्थिति में यह लगभग तय है कि कैप्टन पंजाब विधानसभा में विपक्ष के नेता नहीं बनेंगे और यह जिम्मेदारी सिद्धू को मिल सकती है. फिर वहां से सिद्धू अपनी सियासत को आगे लेकर जा सकते हैं.

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि भले ही ऊपरी तौर पर यह लग रहा हो कि सांसदी छोड़कर विधायकी का चुनाव लड़ने वाले सिद्धू गलती कर रहे हों लेकिन थोड़ी गहराई से अगर सियासी दांवपेंच को समझें तो लगता है कि सिद्धू दीर्घकालिक राजनीतिक लक्ष्यों के साथ आगे बढ़ रहे हैं.