अभी हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने एक अहम फैसला सुनाया है. अहम इसलिए भी क्योंकि यह फैसला सीधे तौर से चुनावों से संबंधित है और ऐसे समय में आया है जब देश की सबसे बड़ी विधानसभा वाले राज्य समेत कुल पांच राज्यों में चुनाव होने को हैं. सात जजों की संवैधानिक पीठ ने इस फैसले में कहा है कि चुनावों में ‘धर्म, नस्ल, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर वोट नहीं मांगे जा सकते. यह फैसला जनप्रितिनिधि कानून की धारा 123(3) की व्याख्या करते हुए दिया गया है. इस धारा के अनुसार उक्त आधारों पर वोट मांगना ‘भ्रष्ट आचरण’ की श्रेणी में आता है और ऐसा करने पर किसी प्रत्याशी का चुनाव तक रद्द किया जा सकता है.

सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला अभिराम सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है. 1990 में महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव हो रहे थे और सांताक्रूज़ विधानसभा सीट से अभिराम सिंह भाजपा के प्रत्याशी थे. वे यह चुनाव जीत तो गए लेकिन दूसरे नंबर पर रहे कांग्रेस प्रत्याशी ने उनके खिलाफ एक चुनाव याचिका दाखिल कर दी. इस याचिका में आरोप थे कि अभिराम सिंह ने वोटरों से हिंदू धर्म को आधार बनाते हुए वोट मांगे थे. बॉम्बे उच्च न्यायालय ने इन आरोपों को सही पाया और 1991 में अभिराम सिंह का चुनाव रद्द करने का फैसला सुना दिया. इस फैसले को चुनौती देते हुए अभिराम सिंह सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गए.

हालिया फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले के कुछ सीमित पहलुओं पर ही चर्चा की है. इनमें मुख्य है- ‘जनप्रतिनिधि कानून की धारा 123(3) की व्याख्या’. अभिराम सिंह के वकीलों का कहना था कि इस धारा की शाब्दिक (या सीमित) व्याख्या ही की जानी चाहिए जिसके तहत सिर्फ प्रत्याशी के धर्म का जिक्र करना ही प्रतिबंधित हो. इन लोगों का तर्क था कि अगर इस धारा की विस्तृत व्याख्या हुई और प्रत्याशी के साथ ही उसके एजेंट, अन्य उम्मीदवारों और मतदाताओं के धर्म का जिक्र करना भी प्रतिबंधित हो गया तो यह अभिव्यक्ति की आज़ादी के मौलिक अधिकार का हनन करना होगा.

प्रोफेसर नोआ फेल्डमैन ने अपने एक लेख में लिखा है कि ‘ऊपरी तौर से भले ही यह फैसला धार्मिक रूप से तटस्थ लगता है लेकिन असलियत में यह फैसला हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी के लिए एक तोहफे की तरह आया है.’ 

सात जजों की इस संवैधानिक पीठ में तीन जज ऐसे थे जो अभिराम सिंह के वकीलों के इन तर्कों से सहमत थे. इन जजों का मानना था कि अगर मतदाताओं के धर्म का जिक्र करना भी प्रतिबंधित कर दिया गया तो इसके कई दुष्परिणाम सामने आ सकते हैं. मसलन, तब कोई प्रत्याशी अपने चुनावी भाषणों में उन समुदायों का भी जिक्र नहीं कर पाएगा जिन्हें जाति या धर्म के आधार पर शोषण का शिकार होना पड़ा हो.

इन तर्कों से उलट संवैधानिक पीठ के चार अन्य जजों ने माना कि जनप्रतिनिधि कानून की धारा 123(3) की व्याख्या करते हुए यदि जनता के हितों से ज्यादा चुनावी प्रत्याशी के हितों को ध्यान में रखा गया तो यह जनहित के खिलाफ होगा. इनका मानना था कि चुनाव एक धर्मनिरपेक्ष प्रक्रिया है और ऐसी प्रक्रिया में धर्म की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए. इसलिए सिर्फ प्रत्याशी के ही नहीं बल्कि उसके एजेंट, विरोधी प्रत्याशी या मतदाताओं के धर्म के आधार पर भी यदि वोट मांगे जाते हैं तो वह ‘भ्रष्ट आचरण’ माना जाएगा और ऐसा करने वाले प्रत्याशी का चुनाव भी रद्द किया जा सकता है.

इस तरह सात जजों की संवैधानिक पीठ ने चार-तीन के न्यूनतम बहुमत से यह फैसला दिया है कि चुनावों में किसी भी तरह से जाति-धर्म के आधार पर वोट नहीं मांगे जा सकेंगे. कानून के कई जानकार इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं तो कई ऐसे भी हैं जो मानते हैं कि इस फैसले का असर सभी धर्मों के लोगों पर समान रूप से नहीं पड़ने वाला. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर नोआ फेल्डमैन ने अपने एक लेख में इस फैसले की समीक्षा करते हुए लिखा है कि ‘ऊपरी तौर से भले ही यह फैसला धार्मिक रूप से तटस्थ लगता है लेकिन असलियत में यह फैसला हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी के लिए एक तोहफे की तरह आया है.’

प्रोफेसर फेल्डमैन अकेले नहीं हैं जो मानते हैं कि यह फैसला भारतीय जनता पार्टी को परोक्ष रूप से फायदा पहुंचता है. उनके साथ ही सर्वोच्च न्यायालय के कई वरिष्ठ अधिवक्ता और प्रख्यात कानूनविद भी इस फैसले को इसी नज़र से देखते हैं. इसका मुख्य कारण यह है कि साल 1995 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक फैसला देते हुए माना था कि हिंदुत्व कोई धर्म नहीं बल्कि जीवन शैली है. इसलिए यदि कोई व्यक्ति हिंदुत्व के नाम पर वोट मांगता है तो वह इस हालिया फैसले से प्रभावित नहीं होगा जबकि अन्य धर्मों के आधार पर वोट मांगने वालों को यह फैसला प्रतिबंधित करता है.

1995 के फैसले के चलते भाजपा हिंदुत्व को चुनावी मुद्दा बनाकर भी कानून के दायरे में ही रहेगी जबकि अल्पसंख्यक समुदायों के नेता अपने साथ हुए धार्मिक या जातीय शोषण का जिक्र करने पर भी कानून का दायरा लांघ जाएंगे.  

इस फैसले की आलोचना करने वाले मान रहे हैं कि राजनीति को धर्म से अलग करने के उद्देश्य से आया यह फैसला अंततः उसी दल - भाजपा - को फायदा पहुंचाता दिख रहा है जिसपर सबसे ज्यादा सांप्रदायिक राजनीति करने के आरोप लगते रहे हैं. इन लोगों का मानना है कि 1995 के फैसले के चलते भाजपा हिंदुत्व को चुनावी मुद्दा बनाकर भी कानून के दायरे में ही रहेगी जबकि अल्पसंख्यक समुदायों के नेता अपने साथ हुए धार्मिक या जातीय शोषण का जिक्र करने पर भी कानून का दायरा लांघ जाएंगे.

दूसरी तरफ इस फैसले का समर्थन करने वाले इस संभावना को सिरे से खारिज कर हैं कि यह फैसला किसी एक समुदाय को ही फायदा पहुंचता हो. सर्वोच्च न्यायालय की अधिवक्ता अवनी बंसल के अनुसार, ‘1995 के जिस मामले (रमेश यशवंत प्रभू बनाम प्रभाकर काशीनाथ कुंटे) में न्यायालय ने हिंदुत्व को परिभाषित किया था, उस मामले में भी न्यायालय ने हिंदू प्रत्याशी के भाषण को ‘भ्रष्ट आचरण’ मानते हुए उसका चुनाव रद्द किया था.’ इससे साफ़ है कि भले ही न्यायालय ने हिंदुत्व को धर्म नहीं माना लेकिन हिंदू धर्म को आधार बनाते हुए वोट की अपील करने को न्यायालय ने तब भी गैर-कानूनी ही माना था.

दिल्ली उच्च न्यायालय के अधिवक्ता गौरव गर्ग बताते हैं, ‘1995 में सर्वोच्च न्यायालय ने हिंदुत्व को धर्म नहीं बल्कि जीवन शैली माना. इसका यह मतलब नहीं कि कोई भी प्रत्याशी हिंदुत्व को धार्मिक आधार बनाते हुए वोट मांगे और फिर भी कानून के दायरे से बाहर रहे. यदि कोई प्रत्याशी हिंदुत्व शब्द का इस्तेमाल धार्मिक आधार पर वोट मांगने के लिए करता है तो वह भी ‘भ्रष्ट आचरण’ ही माना जाएगा.’ गौरव आगे बताते हैं, ‘हालिया फैसले का इसलिए भी स्वागत किया जाना चाहिए कि इसने जनप्रतिनिधि कानून की धारा 123(3) को विस्तृत कर दिया है. इससे चुनावों में जाति-धर्म को आधार बनाकर वोट मांगने की संभावनाएं कम ही हुई हैं.’

यानी कि इस फैसले ने उस प्रावधान को पहले से मजबूत ही किया है जिसके तहत चुनावों में जाति-धर्म आदि का जिक्र करना ‘भ्रष्ट आचरण’ माना गया है. ऐसे में यदि ‘हिंदुत्व’ का इस्तेमाल कोई प्रत्याशी धार्मिक आधार पर वोट हासिल करने के लिए करता भी है, तो उसके चुनाव को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है. और संभव है कि न्यायालय तब ऐसे व्यक्ति को उसी तरह दोषी माने जैसे 1995 में न्यायालय ने हिंदुत्व को जीवन शैली बताते हुए भी इस आधार पर वोट हासिल करने वाले प्रत्याशी को दोषी माना था.