करणी सेना का कहना है कि आप अपनी फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी और पद्मावती के प्रेम दृश्य दिखाने जा रहे हैं, जबकि यह ऐतिहासिक तथ्यों के खिलाफ है. आप इतिहास के नाम पर मनगढंत चीजें क्यूं दिखाते हैं?

यह ऐसा सीन है जिसमें अलाउद्दीन खिलजी सपने में पद्मावती के साथ खुद को देखता है. जहां तक मेरी जानकारी है कि लोगों के देखे गए सपनों का कोई इतिहास अब तक तो नहीं लिखा गया. लेकिन ऐसी कोई किताब करणी सेना वालों के पास हो तो वे उसे सार्वजनिक करें.

रानी पद्मावती के इतिहास को बदलने से नाराज मध्य प्रदेश के एक भाजपा नेता ने कहा है कि आपको थप्पड़ मारने वाले को वे प्रति थप्पड़ 10 हजार रुपये देंगे. इस ऐलान पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

मैं सोच रहा हूं कि अपने क्रू में से ही किसी को यह काम दे दूं. कुछ पैसे की वसूली भी हो जाएगी और फिल्म का तगड़ा प्रोमोशन भी.

यानी फिल्म प्रोमोशन के लिए आपको खुद के अपमानित होने से भी गुरेज नहीं है?

बाल खिंच गए, कपड़े फट गए... अपमानित होने को अब और बचा क्या है! अगर कुछ थप्पड़ मरवा के मेरी फिल्म बनने से पहले ही हिट हो जाए, तो क्या बुरा है!

आपने पद्मावती के सेट पर हुई मारपीट की एफआईआर दर्ज क्यों नहीं करवाई?

मेरी फिल्म का पहला प्रोमोशन हुआ है और वह भी बिना किसी खर्च के. आप इतने शुभ मौके पर एफआईआर की बात कर रही हैं!

सुनने में आया है कि करणी सेना के लोग फिल्म का नाम पद्मावती के बजाय कुछ और रखने की भी मांग कर रहे हैं. क्या आप इसके लिए तैयार हैं?

मैंने शूटिंग की लोकेशन बदल ली, इतना बहुत है. आज अगर फिल्म का नाम बदल दूंगा तो कल को कुछ दूसरे लोग मुझे अपना नाम बदलने को भी कह देंगे. वे तर्क दे सकते हैं कि मेरे नाम में लड़का-लड़की दोनों के नाम हैं जो हमारी संस्कृति के खिलाफ है. फिर क्या-क्या बदलता फिरूंगा मैं!

क्या आपकी फिल्म की पद्मावती भी जौहर की आग में कूदेगी?

जौहर की आग में तो पद्मावती को कुदाना ही पड़ेगा, वरना करणी सेना मुझे जौहर करने के लिए मजबूर कर देगी.

आजकल तो सोते-जागते आपके सपनों में पद्मावती ही रहती होंगी!

नहीं, मेरे सपनों में अलाउद्दीन खिलजी रहता है!

क्या! लेकिन फिल्म तो आप पद्मावती पर बना रहे हैं.

पद्मावती अलाउद्दीन खिलजी के सपनों में रहती है!

इससे पहले भी आपकी फिल्मों, राम-लीला और बाजीराव-मस्तानी में आप पर तथ्यों से छेड़खानी के आरोप लग चुके हैं. इस बारे में आपको क्या कहना है ?

मुझे छेड़खानी पसंद है!

क्याऽऽ!

अब्ब्ब्ब, मेरा मतलब बड़ी-बड़ी फिल्मों में छोटी-छोटी चीजें होती रहती हैं.

आप देश में सबसे बड़ा इतिहासकार किसे मानते हैं ?

खुद को!

वह क्यों ?

देखिए मुझे फिल्म डायरेक्टर तो आप लोग बोलते हैं, पर बेसिकली हूं मैं हूं इतिहासकार. मुझ में और दूसरों में इतना ही फर्क है कि वे इतिहास को लिखते हैं जबकि मैं इतिहास दिखाता हूं. जाहिर सी बात है कि इतिहास दिखाना लिखने से बड़ा काम है.

अच्छा यह बताइये, पद्मावती फिल्म का बजट कितना है?

पूरी फिल्म का बजट तो नहीं बन सका है. अभी सिर्फ पदमावती की ड्रेस, आभूषणों और उनके महल के परदों, झूमरों और मोमबत्तियों आदि का बजट जोड़ा गया है.

वही बता दीजिए.

ज्यादा नहीं, सिर्फ मंगलयान के खर्च जितना है.

आप ज्यादातर ऐतिहासिक पात्रों पर फिल्में बनाना पसंद क्यों करते हैं?

जैसा कि मैंने आपसे कहा, मूलतः मैं इतिहासकार हूं. मुझे इतिहास से प्यार है इसलिए ऐतिहासिक पात्रों पर फिल्म बनाना मुझे पसंद है. दूसरी बात इतिहास पर आधारित फिल्मों से विवाद पैदा होने की है... मेरा मतलब इन फिल्मों के प्री-प्रोमोशन की गुंजाइश ज्यादा रहती है. इस कारण महंगे सेट्स में जो बजट ओवर हो जाता है, वह प्रोमोशन में एडजस्ट हो जाता है. सच कहूं तो अब मुझे फ्री के प्रोमोशन की आदत सी हो गई है.

आपकी फिल्मों के सेट इतने भव्य क्यों होते हैं, आखिर सामान्य सेट में भी तो अच्छी कहानी दिखाई जा सकती है?

इतिहास अपने आप में विराट होता है. किसी विराट चीज को भला सामान्य सेट्स में कैसे दिखाया जा सकता है!

लेकिन आपने तो सांवरिया जैसी फिल्म में भी भव्य सेट लगाए थे?

सांवरिया भी तो इतिहास का हिस्सा है!

क्या आपको भी लगता है कि हाल के समय में अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले बढ़े हैं?

हां, बिल्कुल बढ़े हैं.

इन हमलों को आप किस तरह से देखते हैं?

बस फिल्म बैन न हो, बाकी हमले तो अच्छे हैं.

अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले को अच्छा बताने वाले आप पहले शख्स हैं.

देखिये, अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला कुछ-कुछ कच्चा आंवला खाने जैसा है. इसे खाते ही तुरंत दांत खट्टे हो जाते हैं, लेकिन कुछ देर बाद पानी पियो तो मीठा लगता है. अभिव्यक्ति पर हमला तो निश्चित रूप से बुरा है, पर इसके साथ मिली फ्री की पब्लिसिटी अच्छी है. लेकिन यह बात सब लोग खुलकर नहीं कहते... पर मैं कुछ छिपाता नहीं.

पदमावती के बाद आप अगली फिल्म किस पर बनाएंगे?

मेरे असिसटेंट रिसर्च कर रहे हैं कि इतिहास में और कौन-कौन से हिंदू-मुस्लिम पात्र बचे हैं, जिन्हें प्रेमी-प्रेमिका के किरदार में दिखाया जा सकता है.

आपकी नजर सिर्फ हिंदू-मुस्लिम जोड़ों के प्रेम पर ही क्यों टिकी हुई है?

आप पत्रकारिता के पेशे से हैं जहां टीआरपी का बड़ा महत्व है. ऐसे में बेहतर समझ सकती हैं कि मैं हिंदू-मुस्लिम जोड़ों पर ही क्यों फोकस करता हूं.

क्या मतलब ?

ऐतिहासिक हिंदू-मुस्लिम जोड़ों का प्रेम दिखाकर मैं बताना चाहता हूं कि लव-जिहाद सिर्फ आज के दौर का चलन नहीं है, यह सदियों पुराना है बल्कि ऐसा भी कहा जा सकता है कि यह भी हमारी संस्कृति का अहम हिस्सा रहा है.

फिल्म बनाने से पहले आप ऐतिहासिक पात्रों पर रिसर्च भी करते हैं ?

रिसर्च सिर्फ ऐसे ऐतिहासिक पात्रों को ढूंढने में होती है. पात्र मिल जाने के बाद मैं मनमानी करता हूं...अब्ब्ब्ब, मेरा मतलब पुराने इतिहास पर नये सिरे से कहानी लिखता हूं.