आम आदमी पार्टी में इन दिनों एक बात पर खूब चर्चा हो रही है, अगर पंजाब में पार्टी जीती तो मुख्यमंत्री कौन बनेगा? पार्टी के एक बड़े नेता बताते हैं कि कोर टीम के सभी सदस्य ये मानकर चल रहे थे कि अगर वहां आप को बहुमत मिलता है तो अरविंद केजरीवाल ही मुख्यमंत्री बनेंगे. लेकिन केजरीवाल ने एक जनसभा में खुल्लमखुल्ला ऐलान कर दिया कि पंजाब का मुख्यमंत्री तो कोई पंजाबी ही बनेगा.

पंजाब की सियासत के जानकार कहते हैं कि अरविंद केजरीवाल की इस घोषणा का एक सियासी मतलब है. देश में पंजाब इकलौता ऐसा राज्य हैं जहां सिख आबादी बहुसंख्यक है. ऐसे में केजरीवाल को अगर मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर दिया तो पूरा चुनाव सिख बनाम गैर सिख हो जाएगा. आम आदमी पार्टी को डर है कि अगर वोट का रिश्ता धर्म से जुड़ गया तो अरविंद केजरीवाल पिछड़ सकते हैं. इसलिए आखिरी वक्त तक केजरीवाल मुख्यमंत्री के सवाल का जवाब नहीं देना चाहते थे. लेकिन मोहाली में जब दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया ने केजरीवाल के नाम पर वोट मांगा तो अकाली दल की तरफ से इसे मुद्दा बना दिया गया. इसके बाद उन्हें खुलकर बोलना पड़ा क्योंकि अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ जब एक गैर सिख को सूबे की कमान सौंपी गई हो.

मुख्यमंत्री की उम्मीदवारी के मसले पर ही नवजोत सिंह सिद्धू की बातचीत आम आदमी पार्टी से टूट गई थी. केजरीवाल के एक करीबी पत्रकार बताते हैं कि अरविंद केजरीवाल की तरफ से कुमार विश्वास कई बार नवजोत सिंह सिद्धू से मिले थे. सिद्धू को लगता था कि केजरीवाल को पंजाब में एक चेहरा चाहिए और उन्हें वहां एक पार्टी चाहिए थी. जब राज्यसभा से इस्तीफा देने के बाद सिद्धू केजरीवाल से मिले तो उन्हें उम्मीद थी कि वे उन्हें पंजाब में अपनी पार्टी का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाएंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. कांग्रेस में शामिल होने के बाद सिद्धू ने बार-बार अरविंद केजरीवाल से हुई मुलाकात का जिक्र किया. चुनावी जनसभा में सिद्धू ने कहा कि अरविंद केजरीवाल ने उन्हें उपमुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव दिया था. जब सिद्धू ने उनसे पूछा दूल्हा यानी मुख्यमंत्री कौन होगा तो उन्होंने चुप्पी साध ली थी. बकौल सिद्धू केजरीवाल के एक करीबी ने उन्हें समझाया था कि अगर पार्टी पंजाब में जीती तो केजरीवाल एक साल के लिए पंजाब के मुख्यमंत्री बनेंगे, उसके बाद गुजरात चले जाएंगे.

लेकिन अरविंद केजरीवाल दिल्ली छोड़कर पंजाब का मुख्यमंत्री क्यों बनना चाहते हैं? इसकी एक बड़ी वजह दिल्ली ही है. दिल्ली में सरकार तो है लेकिन शासन केंद्र सरकार की तरफ से भेजे गए उपराज्यपाल का चलता है. अरविंद केजरीवाल अब अपने आपको 2019 के लिए तैयार करना चाहते हैं. उनकी इच्छा है कि उनके पास भी अब पूर्ण राज्य की पूर्ण सरकार हो. जिस तरह ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ललकार रही हैं उसी तरह से वे भी पंजाब का मुख्यमंत्री बनकर हल्ला बोलना चाहते हैं. दिल्ली में उनके पास न पुलिस है न पावर. बस नाम के मुख्यमंत्री हैं और काम के लिए बार-बार उपराज्यपाल के दरबार में जाना पड़ता है.

आम आदमी पार्टी पर नज़र रखने वाले बताते हैं कि अगर पंजाब में वह चुनाव जीती तो एक नये केजरीवाल देखने को मिलेंगे. दिल्ली और केंद्र सरकार के बीच का झगड़ा छोटा पड़ जाएगा और पंजाब की दिल्ली से लड़ाई शुरू हो जाएगी. इतनी सुर्खियां बनेगी कि 2019 आते-आते अरविंद केजरीवाल मोदी के असली चैलेंजर के तौर पर नजर आने लगेंगे.

एक और वजह है जिससे इस बात को वजन मिलता है. पंजाब में आम आदमी का स्थानीय नेतृत्व कमजोर है या आम आदमी पार्टी के एक पुराने नेता के शब्दों में कहें तो जानबूझकर किसी सिख नेता को पार्टी ने उभरने नहीं दिया. आम आदमी पार्टी के एक कार्यकर्तानुमा नेता कहते हैं कि सांसद और चुनाव अभियान समिति के मुखिया भगवंत मान पंजाब में भीड़ तो जुटा लेते हैं लेकिन पार्टी की कोर कमेटी अच्छी तरह समझती है कि उनमें मुख्यमंत्री बनने की काबलियत नहीं है. पंजाब में आम आदमी पार्टी ने गुरप्रीत सिंह गुग्गी को अपना संयोजक बनाया है. नेता बनने से पहले वे भी कॉमेडियन ही थे.

2014 लोकसभा चुनाव के दौरान पंजाब में आम आदमी पार्टी का उदय हुआ. ऐसा जबरदस्त उभार आया कि बड़े-बड़े दिग्गज धाराशायी हो गए. अगर अमृतसर में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार को दो लाख से ज्यादा वोट नहीं मिलते तो उसके एक नेता के मुताबिक अरुण जेटली को चुनाव जीतने से कोई नहीं रोक सकता था. उस लहर में केजरीवाल को कुछ ऐसे सिख नेता मिले थे जो ज़मीन से जुड़े थे और जिनकी छवि अच्छी थी. लेकिन वे उन नेताओं को संजोकर रख नहीं पाए. ऐसे में पंजाब चुनाव जीतने की हालत में अरविंद का वहां मुख्यमंत्री बनना तय है, ऐसा सोचने वालों की कमी नहीं है.