नोटबंदी के बाद सरकार के खिलाफ उपजे असंतोष के माहौल में भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने यह बयान दिया कि देश में यूनिवर्सल बेसिक इनकम योजना लागू करने पर विचार किया जाना चाहिए. मुख्य आर्थिक सलाहकार को देश के शीर्ष वित्तीय अधिकारियों में गिना जाता है. इसलिए उनके बयान के बाद इस विषय पर खूब चर्चा हुई. सरकार में बैठे कुछ अन्य लोगों ने भी इस योजना पर विचार करने की बात कही.

कई लोग तो ऐसे भी थे जो यह उम्मीद कर रहे थे कि वित्त वर्ष 2017-18 के बजट में इस बारे में वित्त मंत्री अरुण जेटली कुछ घोषणा कर सकते हैं. हालांकि बजट के एक दिन पहले आई वित्त वर्ष 2016-17 की आर्थिक समीक्षा से इस बात के संकेत मिल गये कि बजट में इस बारे में कोई घोषणा नहीं होगी.

लेकिन इसी आर्थिक समीक्षा में पूरा एक अध्याय यूनिवर्सल बेसिक इनकम को समर्पित है. इसके प्रकाशन की जिम्मेदारी देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार यानी कि अरविंद सुब्रमण्यम की ही है. उनके दस्तखत से जारी आर्थिक समीक्षा में इस योजना को लागू करने को लेकर तरह-तरह के विकल्प सुझाए गए हैं. लेकिन उनमें जाने से पहले यूनिवर्सल बेसिक इनकम के बारे में कुछ बुनियादी बातें जान लेना जरूरी है.

आर्थिक जानकार अनुमान लगा रहे हैं कि ऐसी किसी योजना को चलाने में जीडीपी का तकरीबन दस फीसदी तक खर्च हो सकता है.  

दरअसल, यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें देश के हर नागरिक को एक निश्चित रकम देने की गारंटी सरकार की होती है. इसका मतलब यह हुआ कि अगर यह योजना लागू होती है तो सरकार को देश के हर वयस्क नागरिक को एक निश्चित रकम एक निश्चित अंतराल पर देनी होगी. इस योजना के तहत मिलने वाले पैसे के साथ कोई शर्त भी जुड़ी नहीं होती. इसे कई नामों से जाना जाता है, जैसे नागरिक आमदनी, बेसिक इनकम गारंटी, अनकंडीशनल बेसिक इनकम आदि.

आर्थिक समीक्षा में यह स्पष्ट कहा गया है कि यह योजना ऐसी नहीं है जिसे तुरंत लागू कर दिया जाए. लेकिन वक्त आ गया है जब इस पर गंभीरता से विचार किया जाए. समीक्षा में इस योजना को लागू करने के जो विकल्प दिए गए हैं उनमें एक तो यह है कि इस योजना को एक साथ लागू करने की बजाय चरणबद्ध ढंग से लागू किया जाए. दूसरा विकल्प यह है कि इस योजना को सिर्फ महिलाओं के लिए ही लागू किया जाए. आर्थिक समीक्षा में इसके कई फायदे गिनाए गए हैं. कहा गया है कि अगर महिलाओं को न्यूनतम आय की गारंटी दी जाएगी तो इससे न सिर्फ उनकी सेहत ठीक रहेगी, बल्कि शिशु मृत्यु दर में सुधार होगा और बच्चों की बेहतर देखभाल हो सकेगी.

सरकार के लिए इस योजना का उपयोग यह है कि अगर यह लागू हो जाती है तो कागजों पर गरीबी एक ही झटके में खत्म हो जाएगी. क्योंकि गरीबी रेखा निर्धारित करने के लिए आय की जो सीमा तय की गई है, उससे थोड़ा अधिक पैसा सरकार को इस योजना के तहत देना पड़ेगा. इससे कई अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में भारत की स्थिति सुधर जाएगी और सरकार को निवेश आकर्षित करने में मदद मिल सकती है.

लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या यह योजना लागू हो पाएगी? इस योजना की राह में एक नहीं बल्कि कई रोड़े हैं. सबसे पहली समस्या आर्थिक संसाधनों की है जिसकी बात नीति आयोग कर रहा है. आर्थिक जानकार अनुमान लगा रहे हैं कि ऐसी किसी योजना को चलाने में जीडीपी का तकरीबन दस फीसदी तक खर्च हो सकता है. वित्त मंत्री जेटली ने भी बजट पेश करने के बाद यही कहा कि इस योजना के लिए जरूरी संसाधन नहीं हैं.

माना जा रहा है कि इससे मजदूरी में बढ़ोतरी हो सकती है और कई वस्तुओं का उत्पादन और कई सेवाएं महंगी हो सकती है.  

लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि यह एक ऐसी योजना है जिसे लागू किया जाना चाहिए. इस योजना को लागू करने की राह में आने वाली सबसे बड़ी अड़चन के बारे में उनका कहना था कि इस योजना के लिए जितनी राजनीतिक परिपक्वता चाहिए उतनी हमारे देश में नहीं है. जेटली के मुताबिक ‘जरूरी राजनीतिक परिपक्वता होने पर इस योजना को हम लागू करना चाहेंगे.’

आर्थिक बारीकियों को समझने वाले लोग इस योजना की दूसरी समस्याओं की ओर भी इशारा कर रहे हैं. कहा जा रहा है कि इस योजना के तहत अगर सभी को एक निश्चित रकम मिलने लगी तो इससे महंगाई दर में बढ़ोतरी होगी और थोड़े ही दिनों में इस योजना से मिलने वाली रकम कम महसूस होने लगेगी. इसके अलावा एक समस्या यह भी बताई जा रही है कि देश के हर हिस्से में गुजर-बसर करने में बराबर पैसे नहीं खर्च होते. इसे ऐसे समझें कि अगर कोई व्यक्ति मुंबई में रह रहा हो तो उसका खर्च मुरादाबाद के किसी दूर-दराज के गांव में रहने वाले व्यक्ति से अधिक होगा. ऐसे में सरकार के लिए भौगोलिक स्थितियों को देखते हुए अलग-अलग आय निर्धारित करना मुश्किल होगा और एक समान रकम देने पर यह समस्या पैदा होगी.

कुछ जानकार यह भी कह रहे हैं कि इस योजना के लागू होने के बाद श्रमिक बाजार के तौर-तरीके बदल सकते हैं. आशंका यह जाहिर की जा रही है कि लोगों को अगर एक निश्चित रकम मिलने लगे तो वे ऐसे काम नहीं करना चाहेंगे जो उतने आकर्षक नहीं हैं. माना जा रहा है कि इससे मजदूरी में बढ़ोतरी हो सकती है और कई वस्तुओं का उत्पादन और कई सेवाएं महंगी हो सकती है. इसके अलावा एक और बात कही जा रही है कि यह योजना लोगों में काम न करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देने वाली भी साबित हो सकती है.

पिछले लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और नरेद्र मोदी बड़े जोर-शोर से कहा करते थे कि उनकी सरकार विदेशों से इतना काला धन वापस लाएगी जिससे देश के हर व्यक्ति के बैंक खाते में 15 लाख रुपये जमा किये जा सकते हैं. कुछ लोगों का मानना है कि इतनी समस्याओं से घिरी यूनिवर्सल बेसिक इनकम योजना का हश्र भी वैसा ही देखने को मिल सकता है.