इस सवाल का जवाब खोजने से पहले हम 30 अप्रैल, 1982 को न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित एक खबर के बारे में जान लेते हैं. इसमें एक महिला की आंखें बाहर निकल आने का जिक्र था. खबर के मुताबिक ड्राइविंग के दौरान आंखें खोलकर छींकने की वजह से ऐसा हुआ था. यह एक मिथक के सच होने जैसी बात थी. क्योंकि आज भी बच्चों को आंखें निकल आने का डर दिखाकर छींकते वक्त अपनी आंखें बंद रखने के लिए कहा जाता है. ऐसे मिथकों पर कई किताबें लिख चुकीं डॉ रशेल व्रीमैन ने हाल ही में जब इस खबर की पड़ताल की तो उन्हें सिर्फ इतना पता लग सका कि उस महिला की नेत्र कोशिकाओं में कुछ खराबी थी.

यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के प्रोफेसर डॉ रॉबर्ट नेक्लेरिओ बताते हैं कि अव्वल तो छींकने के दौरान फेफड़ों द्वारा लगाया गया दबाव इतना अधिक नहीं होता कि आंखें अपने खांचे से बाहर निकल आएं. दूसरे अगर कभी किसी और वजह से आंखें बाहर आने की आशंका हो तो ऐसा न होने देने के लिए सिर्फ पलकें बंद करना ही काफी नहीं होगा. इसका मतलब छींकने के दौरान हमारी पलकें सिर्फ इसलिए बंद नहीं हो सकतीं कि कहीं हमारी आंखें ही बाहर न आ जाएं.

आम लोगों के अनुभव की बात करें तो हमारे आसपास शायद ही ऐसा कोई होगा जिसकी आंखें छींकते वक्त खुली रहती हों. लेकिन ज्यादातर वैज्ञानिकों का मानना है कि आंखें खोलकर छींकना संभव है, हालांकि ऐसा बहुत कम लोग ही कर पाते हैं. इसके साथ ही यह भी एक मजेदार तथ्य है कि शरीर में कोई ऐसी व्यवस्था है ही नहीं जिसके तहत छींकने के दौरान आंखें अनिवार्य रूप से बंद करनी पड़ें. तो फिर ऐसा क्यों है कि छींकते वक्त हमारी पलकें बंद हो जाती हैं?

इसका कारण समझने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि हमें छींक क्यों आती है. होता यूं है कि सांस लेने के रास्ते में जब कोई बाहरी कण जैसे धूल या महीन रेशा वगैरह अटक जाता है तो उसे साफ करने के लिए शरीर जो प्रक्रिया अपनाता है वह छींकना कहलाती है. जब इस तरह का कोई अवरोध श्वासनली में अटकता है तो दिमाग की ट्राइजेमिनल नर्व (तंत्रिका) को अव्यवस्था का एक संदेश जाता है. इसके बाद दिमाग शरीर को यह अवरोध हटाने का आदेश देता है जिसकी प्रतिक्रिया में फेंफड़े ज्यादा मात्रा में ऑक्सीजन इकट्ठी कर उसे जोर से बाहर निकालते हैं. दबाव के साथ हवा बाहर निकलने के चलते अवरोध पैदा कर रहे घटक भी बाहर चले जाते हैं.

जहां तक छींकने के दौरान पलकें झपकने का सवाल है इसके लिए वैज्ञानिक ट्राइजेमिनल नर्व को ही जिम्मेदार बताते हैं. ट्राइजेमिनल नर्व, तंत्रिका तंत्र का वह हिस्सा होती है जो चेहरे, आंख, नाक, मुंह और जबड़े को नियंत्रित करती है. दरअसल छींकने के दौरान अवरोध हटाने का दिमागी संदेश यह तंत्रिका आंखों तक भी पहुंचा देती है. और इसकी प्रतिक्रिया में ही हमारी पलकें झपक जाती हैं.

यानी कि छींकने के समय पलकों के झपकने का कोई खास मतलब है नहीं. इसलिए जरूरत पड़ने पर इससे जुड़े मिथकों को छोड़ें और जब भी छीकें बस रूमाल थामकर छींकें.