आदतन बात ज़रा पीछे से शुरू करता हूं. सूत्र ढंग से पकड़ में आ जाते हैं. किस्सा फिल्मों और इतिहास से जुड़ा है तो उसी अंदाज़ में शुरू करके सुनाया जाए.

दिल्ली के एक दफ्तर में दो लोगों की बातचीत.

‘गूगल मैप खोलो...कंप्यूटर में’ एक आदमी थोड़े तल्ख़ अंदाज़ में, शायद थका होगा...’और हिंदुस्तान के जैसलमेर शहर को ढूंढ़ो फिर बताओ कि क्या दिख रहा है?’

‘जी किला’

‘कोई मंदिर भी है क्या?’

‘अमर सागर जैन मंदिर’

‘उसके आसपास क्या है?’

‘जी, जोगनेश्वर मंदिर’.

‘हां, ठीक है...और उसके पास?’

‘कुछ आबादी दिख रही है, जगह का नाम है - लोदरवा’

‘बस-बस...यही है, रुक जाओ...’

शहर लोदरवा, ग्यारहवीं शताब्दी. एक जैन मुनि के आशीर्वाद से राजा सागर को संतान हुई. मुनि की बात मानते हुए उन्होंने जैन धर्म स्वीकार किया... एक नए गोत्र की शुरुआत हुई और उस गोत्र के लोगों ने चिंतामणि पार्श्वनाथ जैन मंदिर की स्थापना की. कहते हैं उस मंदिर को तोड़ दिया गया था. तोड़ने वाला था अलाउद्दीन खिलज़ी और वो गोत्र जिसकी शुरुआत हुई थी वो था - भंसाली.

‘संजय लीला को फ़ोन लगाओ और पूछो कि उनका अलाउद्दीन ख़िलजी से कुछ पुराना मामला फंसा हुआ है...’

‘वो फ़ोन उठा नहीं रहे हैं पर सर मामला खिलजी से नहीं फिलहाल तो राजपूतों से फंसा हुआ है.’

‘कोई बात नहीं. अच्छा सुनो, उससे (यानी मुझसे) कहो कि चित्तौड़गढ़ चला जाए....’

रात की ट्रेन से रवानगी, अगली सुबह चित्तौड़ में. मैं किले के पश्चिम की तरफ़ मौजूद सात दरवाजों को एक-एक कर पार करता हुआ किले में जा पहुचता हूं. किले का मुख्य दरवाज़ा पूर्व को है. इस बात को ध्यान रखिएगा. ये इस किस्से का अहम् पड़ाव है. इस पर बाद में बात होगी. मछली के आकार का किला ज़मीन से 580 फ़ीट ऊपर है. चित्रांगद मौर्य ने इसे बनाया और नाम रखा -’चित्रकूट’ जो कालांतर में चित्तौड़ कहलाया. आठवीं शताब्दी के बाप्पा रावल से लेकर सोलहवीं शताब्दी के उदय सिंह के बीच तक़रीबन 50 राजा हुए और उनमे से एक थे रावल रतन सिंह. कहा जाता है कि इन्हीं की रानी थीं पद्मिनी. किस्सा इनका ही है.

चित्तौड़गढ़
चित्तौड़गढ़

मैं आपको चित्तौड़ में भाट-चारणों का जनित और दुनिया भर में प्रचलित किस्सा बताता हूं और फिर थोड़ी तफ्तीश करने की कोशिश करता हूं कि क्या जैसा कहा गया है, वाक़ई में हुआ था.

किस्सा

एक ब्राह्मण जो रतन सिंह से नाराज था, जाकर दिल्ली के सुलतान को अपने तोते हीरामन की ज़ुबानी रतन सिंह की रानी की खूबसूरती बयां करवाता है. आठ अगस्त 1302 को खिलजी चित्तौड़ के लिए कूच करता है. रतन सिंह और उसके बीच आठ तक महीने लड़ाई होती है और जब कोई परिणाम नहीं निकलता है तो खिलजी सिर्फ़ रानी को देखकर वापस जाने की बात अपने दूत के हाथों रतन सिंह तक पहुंचाता है. वो रानी को शीशे में देखता है और धोखे से रतन सिंह को पकड़ लेता है. रानी खिलजी के साथ चलने के लिए राज़ी हो जाती है पर एक शर्त पर - वो किले के अंदर से 700 दासियों को पालकियों में लेकर आएगी और अंतिम बार रावल रतन सिंह से मिलकर दिल्ली चल देगी. रानी की ये चाल थी. पालकी में सैनिक बैठ जाते हैं. गोरा बादल, 12 वर्ष का सेनापति साथ में जाता है और रतन सिंह को आज़ाद करा लाता है. बौखलाया खिलज़ी जब भयंकर आक्रमण करता है तो रानी 16000 दासियों के साथ जौहर कर लेती है. और रतन सिंह अपने सैनिकों के साथ साका (केसरिया बाना पहन कर अंतिम लड़ाई लड़ना) कर अपनी जान दे देते हैं. किस्सा ख़त्म, तफ्तीश शुरू...

मलिक मोहम्मद जायसी भक्ति काल के कवि थे. सन 1540 में लिखे अपने ग्रंथ ‘पद्मावत’ में वे रानी पद्मिनी को सिंहल देश यानी कि आज के श्री लंका का मानते हैं. इस पर राजस्थान के प्रसिद्ध इतिहासकार और ‘वीर विनोद’ लिखने वाले श्यामल दास भी अपनी मुहर लगा देते हैं. पर राजस्थान के उदयपुर कॉलेज के इतिहास विभाग की अध्यक्षा डॉ सुशीला शक्तावत उन्हें राजस्थान या मध्यप्रदेश के आसपास की मानती हैं. एक साल के शासन काल(1302-1303) में राजा का श्रीलंका तक जाकर स्वंयवर रचाना और फिर आठ महीने तक खिलजी से लड़ना कुछ अज़ीब लगता है. ‘पद्मावत’ में जायसी बताते हैं कि हिरामन खिलजी को पद्मिनी की दास्तां सुनाता है और वो उसे हड़पने के लिए चित्तौड़ पर चढ़ाई कर देता है. ख़िलजी रतन सिंह को बंदी बनाकर दिल्ली ले आता है और चित्तौड़ का पड़ोसी राजा देवपाल पद्मिनी को हड़पने की कोशिश करता है. गोरा और बादल मिलकर रतन सिंह को दिल्ली से छुड़ाकर ले आते हैं और फिर रतन सिंह देवपाल से लड़ाई में मारे जाते हैं. यानी कि 237 साल बाद लिखी जायसी की ये कहानी उस प्रचलित किस्से से अलग है जिसे हम ऊपर पढ़ चुके हैं. तोते द्वारा कहानी सुनाये जाने का ज़िक्र भी कोरी किस्सागोई नज़र आती है. पर तफ्तीश जारी है.

अलाउद्दीन खिलजी की चित्तौड़गढ़ फ़तह का अमीर खुसरो ने अपनी किताब ‘खज़ा’ईन अल्फुतुह’ में बहुत विस्तार से ज़िक्र किया है. ख़ुसरो उस लड़ाई में अलाउद्दीन के साथ शामिल थे. रानी के जौहर का और रावल के साका का कोई वर्णन नहीं है इस किताब में. तो क्या जौहर और साका नहीं हुआ था? हो सकता है कि ख़ुसरो ने इस वाक़ये को नही बताया हो? आख़िर कौन सा राजा यह लिखवाना चाहेगा कि एक औरत की वजह से उसने इतने बड़े क़त्लेआम को अंजाम दिया था? ख़ुसरो ने रतन सिंह को बहुत कमज़ोर राजा बताया है. उनकी किताब का अंग्रेजी में तर्जुमा हुआ था और उसमें से कुछ अंश इस तरह हैं - ‘...दो महीने की लड़ाई हो चुकी थी और सुलतान की सेना उस किले का कुछ भी नहीं बिगाड़ पायी...क्या शानदार किला था वो!’...अगर सुबह बाढ़ आये तो शाम तक पानी किले के नीचे पहुंचे... आख़िरकार 26 अगस्त 1303 को सुलतान की फ़ौजें अंदर पहुचती हैं...डरा हुआ राजा जान की अमान मांगता है और सुल्तान उसे छोड़ देते हैं. पर अपना ग़ुस्सा बाकी के हिंदुओं पर निकाल लेते है और एक दिन में 30000 हिंदुओं का क़त्लेआम हो जाता है’...तो क्या ख़िलजी रतन सिंह को छोड़ देता है? अगर हां, तो किस शर्त पर? ये जिक्र खुसरो ने नहीं किया...तो वो जौहर, साका, कहां हैं?

सन 1607 में इतिहासकार फ़रिश्ता ने अपनी रचना ‘गुलशन-ऐ-इब्राहिमी में ख़िलजी की चित्तौड़ फ़तह का ज़िक्र किया है. उसमे वो रानी पद्मिनी का किस्सा अलग ही बताते हैं. वो उसे राजा की बेटी मानते हैं जिसको खिलजी ने बंदी बना लिया था और जो बाद में गोरा बादल की मदद से उसे छुड़ाती है. जितने मुंह उतनी बात पर कोई भी प्रामाणिक नहीं लगती.

पद्मिनी महल
पद्मिनी महल

मैं किला घूमता हूं और जौहर साबित करने की कोशिश करता हूं. मुझे बताया जाता है कि पद्मिनी के दो महल है किले में. पहला बिलकुल ख़त्म हो चुका है, सिर्फ़ दीवारें बची हैं. मैं आगे बढ़ता हूं और उत्तरी जौहर द्वार पहुचता हूं....द्वार के अंदर प्रवेश के बाद दो ख़ास जगह हैं - समिधेश्वर मंदिर, जो शिव का मंदिर है. इसका निर्माण 1150 में गुजरात के चालुक्य राजा कुमारपाल ने करवाया था और जिसका जीर्णोद्धार फिर राजा मोकल ने 1428 में करवाया. इस मंदिर के अंदर शिव प्रतिमा है और बाहर अनेकों खूबसूरत मूर्तियां हैं. इसकी एक-एक मूर्ति खंडित है. किले में तकरीबन हर मंदिर की मूर्तियां खंडित हैं. उत्तरी द्वार के पास दूसरा ख़ास स्थल है जौहर कुंड. ये एक बगीचा ज़्यादा नज़र आता है. पूछने पर मालूम हुआ कि यहां पहले एक गड्ढा था जिसमें लकड़ियों को आग लगाकर जौहर कुंड बनाया जाता है. इस जगह को देखकर कहना मुश्किल है कि 16000 दासियों और रानियों ने यहां जौहर किया होगा. तो इस संख्या पर प्रश्नचिन्ह है.

आगे बढ़ने पर अब वो जगह आती है जो इस कहानी की सबसे अहम् कड़ी है. पद्मिनी का दूसरा महल. ये किले के सबसे ख़ूबसूरत महलों में से एक हैं. इसके पास ही वो कमरा है जहां ख़िलजी ने आईने में रानी को देखा था. कुछ लोगों का मानना है कि इस कमरे में रतन सिंह और खिलज़ी शतरंज खेला करते थे. इसमें जो शीशे लगे हैं उनका भी एक किस्सा है. नेहरू जी ने डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया में इस क़िले का ज़िक्र किया है. वे यहां आये भी थे और उनकी फरमाइश पर ये शीशे यहां लगाए गए थे. फिर वो कहानी कुछ यूं है - रानी पीछे जलमहल की सीढ़ियों पर आती है, खिलजी आईने में उसकी तस्वीर देखता है. उसको पीछे मुड़कर रानी को सीधा देखने की मनाही है. रतन सिंह के दो सिपाही तलवार लिए उसके पीछे खड़े हैं. कहते हैं कि रानी की एक झलक देखकर उसका ईमान डोल गया था. जब वह क़िले से रुख़सत हो रहा था तो रावल रतन सिंह को बातों में उलझाकर क़िले के सातों दरवाज़े पार करवा देता है. इसके बाद रतन सिंह को बंदी बना लिया जाता है. आगे की कहानी का ज़िक्र तो ऊपर हो ही चुका है.

खुसरो ने लिखा है कि ख़िलजी की सेना ने कैंप(शिविर) किले के पश्चिमी भाग की तरफ दो नदियों - गंभीरी और बेडच के बीच में लगाया था. किले में सात दरवाज़े भी पश्चिम की तरफ ही हैं. पूर्व में सिर्फ़ एक दरवाज़ा है और इसी के सामने लड़ाई का मैदान था. यही बस इस क़िले की कमज़ोर कड़ी थी. मैदान ए जंग यानी किले के पूर्व में सिर्फ़ एक दरवाज़ा और पीछे की तरफ़ जहां कुदरती नदियों की आड़ थी वहां से सात दरवाज़ों के जरिये प्रवेश! ये शायद साबित करता है कि मेवाड़ के राणे सिर्फ पश्चिम यानी गुजरात, और उत्तर यानी अजमेर के राजाओं को अपना प्रतिद्वंदी मानते होंगे. इसी कमज़ोर रणनीति का फ़ायदा अकबर ने भी अपने चित्तौड़ अभियान में उठाया होगा और वो भी जीत कर गया.

राणा का खिलजी पर यूं विश्वास कर लेना, यूं लापरवाही में सात दरवाज़े पार कर लेना, खिलजी की सेना का 700 पालकियों की तलाशी न लेना और 12 साल के गोरा बादल का रतन सिंह को छुड़ा लाना पद्मिनी के किस्से पर सवालिया निशान लगाता है. खैर जो भी है. पद्मिनी की कहानी यहां के जनमानस में रची-बसी है. और इसे भाट-चारणों ने गा-गाकर खूब प्रचिलित किया है. शायद इसलिए उसे एक मान्यता मिल गयी है. यहां रहने वाले हिंदू हों या मुसलमान सब इसे मानते हैं और कमाल की बात ये कि मुसलमान भी रानी को देवी का दर्ज़ा देते हैं यहां.

जौहर स्थल
जौहर स्थल

मैंने जब यहां के लोगों से भंसाली के मामले में बात की तो कुछ मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली. एक राजपूत ने कहा कि अगर सिनेमा में ये दिखाया जाता है कि पद्मिनी ख़िलजी के सपने में आती है तो इस पर सर पर पहाड़ क्यों उठाना? वो आगे कहता है कि अगर मेरी बहन या बीवी किसी के सपने में आये तो क्या मैं उसे मारने जाऊंगा? कुछ लोग नाराज़ भी मिले. किले में लोगों की आमद बढ गयी है. शाम होने को है. मैं रवाना होने से पहले लाइट एंड साउंड शो देखता हूं और रोमांचित हो उठता हूं, ये सोचकर कि इस किले में अगर शौर्य की मिसाल राणा सांगा हैं, साहस की मिसाल पद्मिनी है, बलिदान की मिसाल पन्ना धाय हैं तो भक्ति की मीरा और रविदास भी हैं. किले में जैन धर्म भी दिखता है तो यहां नौ गज़ पीर बाबा की मज़ार भी मौजूद है.

नीचे उतरते वक़्त जेहन में न जाने क्यों बामियां के बुद्ध मंदिर आ गए जिन्हें अफ़ग़ानी तालिबानियों ने तहस नहस कर दिया था. यूनेस्को द्वारा संरक्षित इन मंदिरों का जीर्णोधर अब अफ़ग़ान सरकार ने कराने का निश्चय किया है और इस दिशा में काम भी शुरू हो चुका है. हमारे देश और प्रांत की सरकारें और भारतीय पुरातत्व विभाग इन मंदिरों की सुध कब लेगा? कब करणी सेना जैसे स्वयंभू धर्मरक्षक राजपूत अस्मिता के लिए इस पर काम करेंगे? क्या ये सोची-समझी साजिश है कि इतिहास के इन काले पन्नों को न हटाया जाए? रात की ट्रेन निकल चुकी थी और अब जयपुर आने का सिर्फ एक ही साधन था - रोडवेज की बस...रात के 2 बजे हैं.

दिल्ली से फ़ोन आता है...

‘कहां हो?’

‘जी, बस में. वापस आ रहा हूं’

‘काम पूरा हो गया?’

‘जी, कल सुबह तक पेश कर दूंगा’

‘रुको’... और किसी से बात करने लग जाते हैं.

गूगल मैप खोलो. कितनी बार कहा है मोबाइल पर नहीं कंप्यूटर पर खोला करो...’

जी खुल गया...

‘क्या दिख रहा है’

दूसरा आदमी कुछ बताता है...

इसके बाद मुझसे - ‘परसों तैयार रहना है. आपको जाना है एक नए शहर’

चलते-चलते

शुरुआत में किले के पूर्व के दरवाज़े की बात कही थी...याद आया...उसका किस्सा बड़ा दिलचस्प है. अष्टधातुके बने इस दरवाजे को खिलजी उखाड़कर दिल्ली ले गया था और अभेध्य किले के उस प्रतीक को दिल्ली के किले में लगवा दिया था. बाद में भरतपुर के जाट राजा जवाहर सिंह औरंगज़ेब की सेना से लड़कर उस दरवाज़े को भरतपुर ले आये और लोहागढ़ के किले में लगवा दिया.