जब नरेंद्र मोदी ने 26 मई, 2016 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली तो उनके साथ शपथ लेने वाली टीम में सुरेश प्रभाकर प्रभु शामिल नहीं थे. तब कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे सदानंद गौड़ा रेल मंत्री बनाए गए थे. लेकिन सत्ता में आने के छह महीने के भीतर अक्टूबर, 2014 में प्रधानमंत्री ने जो अपना पहला मंत्रिमंडल विस्तार किया उसमें वे सुरेश प्रभु को बतौर रेल मंत्री अपनी टीम में ले आए.

प्रधानमंत्री मोदी को सुरेश प्रभु पर कितना भरोसा था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस वक्त तक शिव सेना में रहे प्रभु को खुद उनकी पार्टी मंत्री नहीं बनने देना चाहती थी. शिव सेना ने जो नाम मंत्री बनाने के लिए भेजे थे, उसमें प्रभु का नाम नहीं था. इसके बावजूद प्रधानमंत्री ने उन्हें मंत्री बनाया. प्रभु को मंत्री बनाने से पहले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने उन्हें पार्टी में शामिल कराया और अपनी सहयोगी पार्टी शिव सेना को नाराज करके उन्हें रेल मंत्री बनाया गया.

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान बिजली के क्षेत्र में प्रभु द्वारा किए गए कामों को याद करके दावा किया जा रहा था कि वे रेलवे का कायापलट कर देंगे. यह बात भी सामने आई कि उनसे प्रधानमंत्री मोदी ने काफी उम्मीदें लगा रखी हैं. प्रधानमंत्री सार्वजनिक तौर पर यह कह रहे थे कि उनकी विकास योजनाओं के केंद्र में रेलवे है. जानकारों के मुताबिक मोदी उम्मीद कर रहे थे कि सुरेश प्रभु रेलवे में निजी क्षेत्र और विदेशी एजेंसियों से भारी निवेश करा पाने में कामयाब होंगे.

लेकिन यह हो नहीं पाया. बल्कि सुरेश प्रभु के तकरीबन तीन साल के कार्यकाल में रेलवे में ज्यादातर बुरी चीजें ही हुई हैं. इनके आधार पर यह कहा जाने लगा है कि सुरेश प्रभु अब तक के सबसे बुरे और नाकाम रेल मंत्री हैं. जानते हैं उन पांच बातों को जिनके आधार पर सुरेश प्रभु को लेकर यह राय बन रही है.

संगठित लूट का माध्यम

सुरेश प्रभु के रेल मंत्री बनने के बाद न सिर्फ रेल किरायों में बढ़ोतरी की गई बल्कि टिकट रद्द कराने संबंधित नियमों में भी बदलाव किए गए. उनके राज में ऐसे नियम आ गए कि अगर किसी दिक्कत की वजह से किसी की ट्रेन छूट जाए तो उसे रेलवे एक रुपया भी वापस नहीं करेगा जबकि पहले आधा पैसा वापस हो जाता था. रेल किरायों में तो बढ़ोतरी हुई ही, टिकट रद्द कराने के शुल्क में भी रेलवे ने बढ़ोतरी कर दी. अगर किसी का टिकट प्रतीक्षा सूची में ही रह जाए तो भी रेलवे अच्छे-खासे पैसे काट ले रहा है. प्रभु के राज में सबसे अधिक संगठित लूट डायनेमिक प्राइसिंग के नाम पर हो रही है. राजधानी, शताब्दी और दूरांतो ट्रेनों में टिकटों की कीमतें बहुत अधिक बढ़ जा रही है. जहां दिल्ली से मुंबई एसी थ्री का किराया राजधानी में तकरीबन 1900 रुपये है, वह डायनैमिक प्राइसिंग में बढ़कर वह 3,000 से अधिक तक हो जा रहा है. इस वजह से बड़ी संख्या में सीटें खाली जा रही हैं और जो सीटें भर रही हैं, उन पर सफर करने वालों को अनाप-शनाप पैसे चुकाने पड़ रहे हैं.

रेल दुर्घटनाएं

19 अगस्त को उत्तर प्रदेश में खतौली के पास कलिंग उत्कल एक्सप्रेस पटरी से उतर गई. इस हादसे में 21 यात्रियों की मौत हो गई जबकि 200 से ज्यादा घायल हो गए. इसके चार दिन बाद औरैया के पास कैफियत एक्सप्रेस के भी पटरी से उतरने और हादसे में 70 लोगों के घायल होने की खबर आई. इसी साल 21 जनवरी को आंध्र प्रदेश के विजयनगर में हीराखंड एक्सप्रेस पटरी से उतर गई थी. हादसे में 39 लोगों की मौत हो गई थी जबकि 70 से ज्यादा घायल हो गए थे. इसमें पहले 20 नवंबर 2016 को कानपुर के पास इंदौर-पटना एक्सप्रेस पटरी से उतर गई थी. इस हादसे में 149 यात्री मरे थे.

साफ है कि रेलवे के परिचालन से संबंधित सुरक्षा उपायों पर रेलवे ने वह सब नहीं किया जिसकी जरूरत थी. सुरेश प्रभु जब से रेल मंत्री बने तब से रेल बजट में नई गाड़ियों की घोषणा का चलन खत्म हो गया. उन्होंने कहा कि नई गाड़ियों की घोषणा इसलिए नहीं की जा रही है ताकि जो गाड़ियां पहले से चल रही हैं, वे ठीक से चलें, यह सुनिश्चित किया जा सके. लेकिन लगातार होती रेल दुर्घटनाएं यह साबित कर रही हैं कि रेलवे ने सुरक्षा के मोर्चे पर उतना निवेश नहीं किया जितना किया जाना चाहिए था. जब भी कोई रेल दुर्घटना होती है तो प्रभु इसकी जांच के लिए एक समिति बनाने की घोषणा करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं. हालांकि अब उन्होंने अपने इस्तीफे की पेशकश की है लेकिन यह भी तब हुआ है जब पानी सिर से ऊपर निकल गया.

खराब परिचालन औसत

2016-17 का रेल बजट पेश करते हुए सुरेश प्रभु ने कहा था कि वे 92 फीसदी के परिचालन औसत का लक्ष्य हासिल करेंगे. परिचालन औसत को सामान्य शब्दों में ऐसे समझा जा सकता है कि हर 100 रुपये कमाने के लिए रेलवे को कितने रुपये खर्च करने पड़ते हैं. 92 फीसदी परिचालन औसत का मतलब यह हुआ कि रेलवे को 100 रुपये कमाने के लिए 92 रुपये खर्च करने होंगे यानी हर 100 रुपये पर आठ रुपये का लाभ होगा. अब जबकि वित्त वर्ष समाप्त होने में सिर्फ दो महीने बचे हैं तो रेलवे ने इसे संशोधित करके 94 फीसदी कर दिया है. लेकिन असली कहानी कुछ और ही है. अक्टूबर महीने के आखिरी दिनों में रेलवे बोर्ड की ओर से जोनल कार्यालयों को एक पत्र भेजा गया था. इसमें बताया गया है कि रेलवे का परिचालन औसत 114 फीसदी हो गया है. इसका मतलब यह हुआ कि रेलवे को 100 रुपये कमाने के लिए 114 रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं. हालांकि, रेलवे औपचारिक तौर पर इस बात को स्वीकार नहीं कर रहा लेकिन, यह सच है तो यह हाल के सालों में सबसे बुरा परिचालन औसत है.

खतरे में स्वायत्ता

बतौर रेल मंत्री सुरेश प्रभु के कार्यकाल को इसलिए भी याद किया जाएगा कि अलग से संसद में पेश होने वाला रेल बजट उनके कार्यकाल में खत्म हो गया. अब यह आम बजट का हिस्सा होगा जिसे केंद्रीय वित्त मंत्री संसद में पेश करेंगे. 1924 में एकवर्थ समिति की सिफारिश पर रेल बजट को अलग किया गया था लेकिन 92 साल की यह परंपरा सुरेश प्रभु के रेल मंत्री रहते खत्म हो गई. खुद प्रभु और वित्त मंत्री अरुण जेटली की ओर से रेल बजट के आम बजट में विलय के फायदे गिनाए जा रहे हैं. लेकिन रेल मंत्रालय में अहम पदों पर रहे आला अधिकारी इसे रेलवे की स्वायत्ता के लिए एक खतरे की घंटी मानते हैं. इनका कहना है कि अलग रेल बजट होने से रेल मंत्री जनता के प्रति अधिक जवाबदेह होते थे और उन्हें रेल बजट में जन भावनाओं का सम्मान करना पड़ता था. लेकिन विलय की वजह से रेल मंत्री और रेल मंत्रालय की राजनीतिक जवाबदेही कम हो जाएगी.

भरोसे का संकट

यह माना जा रहा है कि रेलवे के सामने आज सबसे बड़ा संकट भरोसे का है. जिस रेल को कई लोग भारत की जीवन रेखा मानते हैं उसमें सफर करने में लोगों को लगातार होती रेल दुर्घटनाओं की वजह से डर लगने लगा है. किरायों में बढ़ोतरी, टिकट रद्द कराने पर अनाप-शनाप पैसे कटने और डायनैमिक प्राइसिंग जैसी रेलवे की योजनाओं से लोगों को ऐसा लगने लगा है कि रेलवे किसी साहूकार की तरह काम कर रहा है. जब भी किराये में बढ़ोतरी की जाती है तो कहा जाता है कि सेवाओं को सुधारने के लिए ऐसा किया जा रहा है. लेकिन कुछ चुनिंदा ट्रेनों को छोड़ दें तो अधिकांश गाड़ियां देरी से ही चल रही हैं. स्टेशनों और ट्रेनों के अंदर की सुविधाएं जस की तस बनी हुई हैं. खुद सुरेश प्रभु अपने दोनों रेल बजट में यात्री सेवाओं को ठीक करने के लिए बड़ी-बड़ी बातें कर चुके हैं. इसके बावजूद सेवाओं का स्तर जस का तस बना हुआ है. ऊपर से लगातार हो रहे हादसों के चलते लोगों में भरोसे का संकट पैदा हुआ है.