पूर्व केंद्रीय मंत्री ई अहमद की मौत सत्ता के गलियारों में एक रहस्य बनी हुई है. लोकसभा और राज्यसभा, दोनों सदनों में कई बार इसे लेकर कामकाज रुका. विपक्ष के सांसदों ने मोदी सरकार पर आरोप लगाए कि उसने जानबूझकर एक पूर्व मंत्री की मौत की खबर को दबाया, उनके परिवार तक को समय पर खबर नहीं दी.

राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आज़ाद और लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने तो यहां तक कह दिया कि सरकार बजट पेश करना चाहती थी इसलिए ई अहमद के निधन की खबर पर चुप्पी साधी गई. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी ने इस पूरे मामले की संसदीय कमेटी से जांच कराने की मांग की है. लेकिन सरकार की तरफ से अभी तक साफ-साफ शब्दों में कुछ नहीं कहा गया है.

मोदी सरकार के किसी प्रवक्ता की बजाय राम मनोहर लोहिया अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट ने जरूर बयान दिया कि ई अहमद की मौत की खबर दबाई नहीं गई. जब तक उनमें जीवन की उम्मीद बाकी थी डॉक्टरों ने पूरी कोशिश की, इलाज़ में बाधा न आए इसलिए बाहरी लोगों को मरीज़ से मिलने नहीं दिया गया. विपक्षी दल के नेताओं के आरोप और अस्पताल के इस जवाब में जबरदस्त विरोधाभास है और सच्चाई ज़मीन-आसमान के इसी अंतर के बीच कहीं फंसी है.

सुनी-सुनाई है कि पूर्व मंत्री के निधन की खबर अस्पताल ने सबसे पहले सरकार को ही दी थी. लेकिन सरकार उहापोह में थी. अगले दिन सुबह बजट पेश होना था. सारी तैयारी हो चुकी थी. उसे एक दिन टालने का मतलब था बजट के लीक हो जाने का खतरा. हालांकि बजट पेश होने की सुबह तक सरकार इस पर फैसला करने में हिचक रही थी. सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि सरकार के एक कैबिनेट मंत्री ने लोकसभा की स्पीकर सुमित्रा महाजन से बात की. खबर यहां तक है कि राष्ट्रपति से भी सलाह ली गई. सुमित्रा महाजन शुरु-शुरू में बजट एक दिन टालने के पक्ष में थी, लेकिन जब उन्हें सरकार का पक्ष बताया गया तो वे मान गईं.

इस मामले में केंद्र सरकार की तरफ से एक पुरानी ऐसी ही घटना का जिक्र किया गया जब एक संसद सदस्य का निधन बजट से ठीक पहले हुआ था. उस वक्त बजट शाम पांच बजे पेश किया जाता था. तब सुबह संसद सदस्य को श्रंद्धाजलि देकर संसद का कार्य स्थगित किया गया और शाम को तय वक्त पर बजट पेश हुआ था.

इस मामले को जानने वाले एक सूत्र के मुताबिक पूर्व मंत्री ई अहमद के निधन को दबाने वाली बात इसलिए सही नहीं है कि उनके एक करीबी रिश्तेदार विदेश में नामी डॉक्टर हैं. वे खुद राम मनोहर लोहिया अस्पताल के डॉक्टरों के संपर्क में थे. अस्पताल के डॉक्टर्स की टीम ने उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की और आधी रात के बाद जब उम्मीद टूट गई तो उन्हें मृत घोषित कर दिया गया.

ई अहमद
ई अहमद

सूत्रों के मुताबिक ई अहमद की मौत के बाद सरकार में भी अलग-अलग मत थे. कुछ मंत्री चाहते थे कि बजट एक दिन के लिए टाल दिया जाए. कुछ चाहते थे कि इसे बसंत पंचमी वाले दिन पेश किया जाए. लेकिन वित्त मंत्रालय इसके लिए तैयार नहीं था. विपक्ष के ज्यादातर नेता मानते थे कि ई अहमद को दिल का दौरा संसद के अंदर पड़ा, राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान वे बीमार हुए, इसलिए उनके सम्मान में बजट एक दिन बाद पेश किया जाए. शुरू-शुरू में सरकार बजट की तारीख एक दिन आगे बढ़ाने के पक्ष में थी. एक टेलीविजन चैनल ने इस खबर को सुबह ब्रेकिंग और एक्सक्लूसिव न्यूज़ की तरह चलाया भी. देश के ज्यादातर बड़े टीवी चैनल्स एक फरवरी को सुबह खबर दे रहे थे कि बजट आज पेश नहीं किया जाएगा.

लेकिन वित्त मंत्रालय के भारी दवाब के बाद खुद गृह मंत्री समेत मोदी सरकार के कई वरिष्ठ मंत्रियों ने लोकसभा स्पीकर से लेकर विपक्ष के नेताओं तक से इस पर बात की. कांग्रेस को छोड़कर ज्यादातर विपक्षी नेता इस बात पर तैयार हो गए कि बजट भाषण से पहले लोकसभा स्पीकर ई अहमद को सदन में श्रद्धांजलि देंगी और ऐलान करेंगी कि बजट के अगले दिन सदन का कामकाज नहीं होगा. शुरू में कांग्रेस ने बजट टालने की बात कही लेकिन बजट भाषण शुरू हो जाने के बाद उन्होंने इसमें व्यवधान नहीं किया.

अब सवाल है कि सच्चाई क्या है? सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि सच्चाई ये है कि निधन की खबर दबाई नहीं गई थी. लेकिन निधन के बाद बजट पेश करने को लेकर सरकार में एक मत नहीं था. इसी संशय का नतीजा हुआ कि सरकार के अलग-अलग मंत्री अलग अलग बातें मीडिया और विपक्ष के नेताओं को बता रहे थे. अगर सरकार एक मत से यह फैसला करती तो इतना संगीन आरोप उस पर नहीं लगता.