वक्त की फितरत है, बदलना. अच्छे से बुरे वक्त में और बुरे से अच्छे में. वक्त अपनी खासियतों के साथ ही बदलता है, यानी अच्छा हो तो कब गुजर गया पता ही नहीं चलता. इसी तरह बुरा हो तो लाख दिलासे मिलते रहें कि यह वक्त भी गुजर जाएगा पर लगता है कि काटे नहीं कट रहा. लेकिन एक ठिया है जहां वक्त अक्सर ठहरा हुआ मिलता है और वक्त का वह ठिया खुद घड़ियां हैं. कैसी मजेदार सी बात है कि जिस घड़ी के घूमने पर दुनिया चक्कर लगाती है उसी घड़ी के ज्यादातर विज्ञापनों में उसके कांटे एक ही वक्त यानी 10 बजकर 10 मिनट पर अटके रहते हैं. तो अब सवाल है कि ऐसा क्यूं है?

इन घड़ियों के हमेशा एक सा वक्त बताने के पीछे कई कारण बताए जाते हैं. पहले हम उन कारणों की चर्चा कर लेते हैं जो ज्यादा प्रचलित हैं लेकिन सही नहीं हैं. पहला और सबसे आसान (और सबसे बेतुका भी) कारण बताया जाता है कि जिस पल घड़ी की खोज की गई उस समय 10 बजकर 10 मिनट बज रहे थे. इसलिए यह समय घड़ियों पर अटक गया. हालांकि इस जानकारी के समर्थन में कोई ऐतिहासिक तथ्य नहीं मिलते इसलिए इसे कोरी बकवास माना जाता है.
एक अन्य मान्यता के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की मृत्यु ठीक इसी समय पर हुई थी इसलिए उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए घड़ियों पर यह समय दिखाया जाता है. यह जानकारी भी सही नहीं है क्योंकि लिंकन को 15 अप्रैल 1865 को रात ठीक सवा दस बजे गोली मारी गई थी लेकिन अगले दिन सुबह 07:22 बजे उनकी मृत्यु हुई थी. इस घटना से जुड़े सभी ऐतिहासिक रिकॉर्ड मौजूद हैं जिनसे मिले इन तथ्यों के आधार पर घड़ियों में 10 बजकर 10 मिनट दिखाने की गुत्थी नहीं सुलझती. एक धारणा यह भी है कि हिरोशिमा और नागासाकी पर हमला ठीक इतने बजे ही हुआ था. लेकिन समय के आंकड़े यहां भी मेल नहीं खाते. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान पहला परमाणु बम सुबह ग्यारह बजे और दूसरा दो दिन बाद सुबह सवा आठ बजे गिराया गया था. यानी इसका भी घड़ी में 10 बजकर 10 मिनट बजाए जाने से कोई संबंध जोड़ना महज गप्पबाजी है.
बीसवीं सदी की शुरूआत में जब घड़ी के प्रिंटेड विज्ञापन आने शुरू हुए तब घड़ियों में यह समय नहीं दिखाया जाता था. तब इसका कोई नियम नहीं था और निर्माता कंपनियां मनमर्जी से कोई भी समय दिखा देती थीं. माना जाता है कि 1920 के बाद विज्ञापनों के साथ-साथ दुकानों में घड़ियों में एक निश्चित समय दिखाने का चलन शुरू हुआ. उस समय की अग्रणी घड़ी निर्माता कंपनियों में से एक वाल्थम ने जहां घंटे और मिनट की कांटों या सुइयों को 10 और 2 के बीच रखा वहीं रूमर्स वॉचेज ने 8 और 4 के बीच कांटे सेट किए. इसके पीछे सबसे बड़ा तर्क यह दिया गया कि कांटों के इस तरह व्यवस्थित रहने से घड़ी की स्टाइलिंग स्पष्ट नजर आती है. यह बात बहुत हद तक सही है क्योंकि प्रयोग भी बताते हैं कि सममित वस्तुएं (जिन्हें एक आभासी या वास्तविक लाइन के जरिए दो बिलकुल एक जैसे हिस्सों में बांटा जा सके) ग्राहक को अधिक आकर्षक और प्रभावी लगती हैं.
कांटों को इस तरह सेट करने के पीछे एक मंशा यह भी थी कि ऐसा करने पर निर्माता कंपनी का नाम स्पष्ट दिखाई देगा जो अमूमन 12 के पास लिखा जाता है. घड़ी में कभी-कभी तारीख या सेकंड बताने के लिए अलग से सेकंडरी डायल बनाया जाता है. यह अक्सर 3, 6 और 9 नंबरों के पास या इनके बीच में कहीं रखा जाता है. ऐसे मे 10 और 2 पर सेट की गई कांटों की व्यवस्था में सेकंडरी डायल साफ-साफ देखा जा सकता है. यह बात 8 और 4 पर सेट कांटों की व्यवस्था के लिए भी सही है. ये दोनों पैटर्न कारगर होने के चलते अगले पचास सालों तक चलन में बने रहे.
लेकिन 1970 का दशक आते-आते ज्यादातर घड़ी कंपनियों ने 10 और 2 पर कांटों की व्यवस्था को अपना लिया. इसकी एक और वजह थी. विशेषज्ञों के मुताबिक 8 और 4 के बीच कांटों को सेट करने के पैटर्न में ब्रांडनेम या निर्माता का नाम तो अधिक स्पष्टता से दिखता है लेकिन यह कहीं न कहीं ग्राहकों पर नकारात्मक प्रभाव डालता है. कांटों की यह स्थिति सैड स्माइली फेस (उदास या दुखभरा चेहरे का प्रतीक) बनाती है. इसके उलट 10 बजकर 10 मिनट बजाने वाले पैटर्न में कांटों की स्थिति मुस्कुराने जैसी होती है. कुछ लोग इसमें जीत यानी विक्टरी का ‘वी’ भी देखते हैं. ये कुछ ऐसे तर्क थे जो बड़े जल्दी ही तमाम घड़ी निर्माताओं ने मान लिए और फिर तकरीबन सभी ने विज्ञापनों या शोरूम में रुकी हुई घड़ियों पर 10:10 बजे के वक्त को ही अपना लिया.
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