उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के छठे चरण का मतदान हो चुका है और आठ मार्च को सातवें और आखिरी चरण का मतदान होना है. आज से तकरीबन एक हफ्ते बाद यानी 11 मार्च को उत्तर प्रदेश सहित उन सभी पांच राज्यों के नतीजे आ जाएंगे, जहां चुनाव हो रहे हैं. इनमें पंजाब भी शामिल है, जहां बीती चार फरवरी को मतदान हो चुका है. लेकिन इस राज्य में प्रचार के दौरान कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी उतने सक्रिय नहीं दिखे, जितने वे उत्तर प्रदेश में नजर आ रहे हैं. वे अपनी पूरी ऊर्जा, समय और संसाधन उत्तर प्रदेश पर ही खर्च कर रहे हैं. जबकि कांग्रेस की चुनावी संभावनाएं उत्तर प्रदेश के बजाय पंजाब में कहीं ज्यादा बेहतर नजर आ रही हैं. इसीलिए राजनीति के जानकार मानते हैं कि पंजाब की अनदेखी कर पूरा जोर उत्तर प्रदेश पर लगाना, आने वाले समय में राहुल के लिए गलत दांव खेलने जैसा साबित हो सकता है.

राहुल की जगह कोई और राजनेता होता तो वह उस राज्य में ज्यादा सक्रिय दिखता, जहां उसे और उसकी पार्टी को जीत मिलने की संभावना ज्यादा होती. लेकिन राहुल ने उत्तर प्रदेश में चुनाव रैलियों की अगुवाई करने के लिए मैदान में उतरने का फैसला किया. यही नहीं, वे और उनकी टीम इससे पहले दूसरे तरीकों से भी कांग्रेस को यहां उभारने में जोर लगाते दिखे. जैसे कि पहले-पहल 78 साल की शीला दीक्षित (दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री) को राज्य में मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी बनाकर उतारना. इससे काम चलता नहीं दिखा तो प्रियंका गांधी वाड्रा के बारे में खबर फैलाई गई कि वे खुद उत्तर प्रदेश में प्रचार अभियान की कमान संभालेंगी. लेकिन जब असल तस्वीर सामने आई तो पता चला कि ऐसा कुछ नहीं हो रहा है. प्रियंका इस बार भी रायबरेली और अमेठी तक ही सीमित रहने वाली हैं.

गठबंधन के लिए कांग्रेस को झुकना पड़ा है लेकिन जीते तो श्रेय पूरा सपा को

इस सबके उलट राहुल की ही अगुवाई में कांग्रेस अब अखिेलेश यादव की हो चुकी समाजवादी पार्टी (सपा) की जूनियर सहयोगी की तरह उत्तर प्रदेश के चुनाव मैदान में है. सपा के साथ गठबंधन में महज 100 सीटें हासिल करने के लिए उसे अखिलेश के सामने करीब-करीब झुकना ही पड़ा. वह 150 से ज्यादा सीटों की उम्मीद कर रही थी. यह अलग बात है कि उसे राज्य में इतनी सीटों पर लड़ने के लिए प्रत्याशी ही नहीं मिल रहे थे. इसी आधार पर एकबारगी तो अखिलेश ने गठबंधन करने से ही मना कर दिया था. वे कांग्रेस को 90-95 सीटों से ज्यादा नहीं देना चाहते थे. बताते हैं कि इस स्थिति में प्रियंका के दखल के बाद कांग्रेस ने अखिलेश तक यह संदेश भिजवाया कि गठबंधन में उसका सम्मान बचा रहे, इसलिए 100 से दो-एक सीट ही ज्यादा मिल जाएं तो काम बन जाएगा.

कहा तो यहां तक जाता है कि अखिलेश को मनाने के लिए खुद प्रियंका ने उनसे कई बार फोन पर बात की. समझौते के लिए अंतिम प्रस्ताव रखने के लिए अपने एक विश्वस्त दूत को लखनऊ भी भेजा. तब कहीं जाकर अखिलेश राजी हुए और वोटों का बंटवारा रोकने की गरज से वे कांग्रेस को 105 सीटें देने पर राजी हुए. हालांकि राजनीति के कई जानकार इस स्थिति को भी कांग्रेस के लिए ठीक ही मानते हैं. उनके मुताबिक, 2012 में कांग्रेस राज्य की 404 विधानसभा सीटों में से सिर्फ 28 ही जीत पाई थी और चौथे स्थान पर रही थी. लिहाजा, सपा के साथ समझौता ही इस बार उसकी स्थिति को कुछ बेहतर कर सकता था. इस नजर से कांग्रेस के लिए यह सर्वश्रेष्ठ रणनीति लगती है.

लेकिन क्या वाकई में यही सबसे अच्छी रणनीति थी? इस सवाल का जवाब उस परिदृश्य में देखें, जब तमाम ओपिनियन पोल के अनुमान गलत साबित हो जाएं? जिस भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को इन अनुमानों में सबसे आगे बताया जा रहा है, वह सत्ता से दूर रह जाए? साथ ही, कांग्रेस के साथ गठबंधन का फायदा उठाते हुए सपा लगातार दूसरी बार सरकार बनाने लायक बहुमत हासिल कर ले? तो क्या इस नतीजे का श्रेय राहुल या कांग्रेस पार्टी को मिलेगा? क्या राहुल राष्ट्रीय राजनीति में इस नतीजे की बिना पर अपना कद बढ़ा पाएंगे? निश्चित रूप से नहीं. इन नतीजों का श्रेय अखिलेश और उनकी पार्टी को मिलना तय है क्योंकि वही सपा-कांग्रेस गठबंधन के निर्णायक किरदार थे. ऐसे में, राज्य ही नहीं देश की राजनीति में भी कद सिर्फ अखिलेश का ही बढ़ेगा.

कांग्रेस की निगाहें 2019 पर हैं लेकिन उत्तर प्रदेश के नतीजों की अहमियत भाजपा के लिए ज्यादा है

राहुल ने उत्तर प्रदेश पर ही जोर लगाने का फैसला क्यों किया? इस सवाल का सीधा जवाब यह समझ आता है कि यह राज्य लोकसभा में सबसे ज्यादा 80 सांसद भेजता है. यानी अगर किसी पार्टी को दिल्ली की सत्ता हासिल करनी है, तो जाहिर तौर पर उत्तर प्रदेश में बेहतर प्रदर्शन करना ही होगा. यही नहीं, राज्य के विधानसभा चुनाव में जिस पार्टी का पलड़ा भारी रहेगा, उसका आत्मविश्वास भी 2019 के लोकसभा चुनाव में ऊपर होगा. संभवत: इसीलिए राहुल ने पूरा ध्यान उत्तर प्रदेश पर ही लगाने का निर्णय किया है. मोटे तौर पर इस फैसले में कोई मीन-मेख भी नजर नहीं आती. लेकिन गहराई से देखें तो समझ आएगा कि यह दांव कांग्रेस और राहुल, दोनों के लिए आने वाले समय में महंगा पड़ सकता है.

उत्तर प्रदेश की जीत-हार कांग्रेस पार्टी के लिए उतनी मायने नहीं रखेगी, जितनी कि भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए रखने वाली है. भाजपा 2014 के चुनाव में इस राज्य से 71 सांसदों (भाजपा के साथ गठबंधन करने वाले अपना दल के दो सांसद के अलावा) के साथ दिल्ली की गद्दी तक पहुंची थी. ऐसे में, अगर भाजपा इस राज्य में तीसरे या चौथे नंबर पर गई तो लोगों में यह संदेश जाना तय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जादू कम हो चुका है. एक हद तक यह भी माना लिया जाएगा कि 2019 में दिल्ली तक पहुंचने की राह भाजपा और नरेंद्र मोदी के लिए मुश्किल हो चुकी है. लेकिन भाजपा की असफलता से कांग्रेस को कोई बड़ा राजनीतिक लाभ मिलने वाला है, ऐसा नहीं कहा जा सकता. हां, यह जरूर है कि उसे भाजपा पर एक तरह की मनोवैज्ञानिक बढ़त मिल जाएगी.

पंजाब से राहुल सिर्फ कांग्रेस ही नहीं अपनी लकीर भी बड़ी कर सकते थे

यानी अगर यह कहें कि सिर्फ मनोवैज्ञानिक लाभ या भाजपा को कमजोर करने के लिए कांग्रेस और राहुल उत्तर प्रदेश में पूरा जोर लगा रहे हैं, तो गलत नहीं होगा. लेकिन इस चक्कर में उन्होंने पार्टी की संभावनाएं पंजाब में कुछ कमजोर कर दी हैं. यह मानने में किसी को ज्यादा दिक्कत नहीं होनी चाहिए पंजाब वह राज्य है जहां कांग्रेस की वापसी की संभावनाएं इस बार सबसे ज्यादा थीं. अकाली दल-भाजपा गठबंधन की सरकार यहां खासी अलोकप्रिय हो चुकी है. यह 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजों में भी साफ दिखा था. उस वक्त नरेंद्र मोदी की लहर के बावजूद भाजपा-अकाली पंजाब की 13 में से छह सीटें ही जीत पाए. ऐसे में कांग्रेस मौके का फायदा उठाते हुए थोड़ी मेहनत करके सत्ता में पहुंचने की अपनी संभावनाएं काफी मजबूत कर सकती थी.

पंजाब में काफी समय तो कांग्रेस पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष प्रताप सिंह बाजवा की गुटबाजी से जूझती रही. राहुल भी बाजवा को समर्थन देते रहे. वह तो दिसंबर 2015 में जाकर कहीं कैप्टन को प्रदेश इकाई की कमान सौंपी गई. वह भी तब जब उन्होंने यह धमकी दी कि वे अलग पार्टी बना सकते हैं. यह बात खुद कैप्टन ने मई, 2016 में एनडीटीवी को दिए इंटरव्यू में बताई थी. कैप्टन को लेकर राहुल की झिझक संभवत: दो कारणों से थी. पहला यह कि कैप्टन उम्रदराज हो चले हैं और दूसरा उनके स्वभाव में राजसी अक्खड़पन स्वाभाविक तौर पर नजर आता है. इसके बावजूद वे पंजाब में सबसे लोकप्रिय चेहरा हैं लेकिन इस तथ्य को राहुल ने देर से समझा और उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने में भी देरी की.

कैप्टन कांग्रेस की तरफ से 27 जनवरी को मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी घोषित किए गए थे. यानी उस वक्त जब मतदान के लिए बमुश्किल एक हफ्ता ही बचा था. आखिरी मौके पर ही राहुल खुद भी पंजाब में सक्रिय हुए. उन्होंने प्रचार के दौरान हिंदुओं में भय फैलाने की भी कोशिश की. दावा किया कि अगर आम आदमी पार्टी (आप), जो कि मजबूत दावेदार भी है, ने पंजाब की सत्ता हासिल कर ली तो राज्य में सिख आतंकवाद फिर लौट आएगा. हालांकि इस इस दावे का राहुल के पास कोई सबूत या मजबूत तर्क नहीं था. इससे साफ है कि उन्होंने पंजाब को बहुत हल्के में लिया.

इसके उलट कल्पना कीजिए कि राहुल ने वैसे ही धुआंधार दौरे पंजाब के भी किए होते, जैसे वे उत्तर प्रदेश में कर रहे हैं. उन्होंने राज्य के लोगों से 1984 के दंगों के लिए माफी मांग ली होती, जो कि अब तक गांधी परिवार के किसी सदस्य ने नहीं किया है. राज्य में 1980-90 के दौर में आतंकवाद के दमन के नाम पर मानवाधिकारों का जिस तरह से हनन किया गया, उसके लिए अफसोस जता दिया होता तो शायद बेहतर होता. राज्य के लोगों के इन कटु अनुभवों पर मरहम लगाकर राहुल अपना कद काफी ऊंचा कर सकते थे. इससे कांग्रेस को भी अप्रत्याशित बढ़त मिलती. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और एक अच्छा मौका गंवा दिया.

अब राहुल और कांग्रेस का काफी कुछ दांव पर लग चुका है

लेकिन मौका तो निकल चुका और अब राहुल और कांग्रेस का काफी कुछ दांव पर लग चुका है. पंजाब की फिर बात करें तो ऐसा सभी का मानना है कि वहां ‘आप’ एक बड़ी राजनीतिक ताकत के तौर पर उभर रही है. चुनाव में भी उसने सबसे ज्यादा वोट कांग्रेस के ही काटे होंगे, यह भी समझा जा सकता है. राहुल ने जिस तरह आप के सत्ता में आने पर सिख आतंकवाद उभरने का लोगों को डर दिखाया, इससे भी यह निष्कर्ष सही साबित होता दिखता है. ऐसे में, अगर आप वाकई राज्य में सत्ता में आ गई, या उसने दूसरी बड़ी पार्टी का दर्जा भी हासिल कर लिया तो कांग्रेस के लिए ही नहीं राहुल गांधी के लिए मुश्किल होना तय मानिए. क्योंकि यह चुनौती आगे चलकर राष्ट्रीय स्तर पर सबसे ज्यादा राहुल के लिए ही परेशानी पैदा करने वाली है.

अभी राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस और वाम दल ही हैं, जिनकी एक से ज्यादा राज्यों में प्रभावी पहुंच है. लेकिन इनका प्रभाव फिलहाल ढलान पर दिख रहा है. आप ने इस स्थिति को सूंघ लिया है. उसके नेता अरविंद केजरीवाल राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका निभाने की महत्वाकांक्षा भी पाले हुए हैं. इसीलिए वे पंजाब और गोवा में पूरा जोर लगा रहे हैं. दिल्ली में सरकार चलाते हुए उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और साफ-सुथरी सरकार जैसे मुद्दों पर ध्यान दिया है, जो लोगों पर सीधे असर करते हैं. इसके जरिए वे पार्टी की राष्ट्रीय छवि का निर्माण करने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में अगर आप ने पंजाब और गोवा जीत लिया (जैसा केजरीवाल इन दिनों दावा कर रहे हैं) या इन राज्यों में दूसरी बड़ी पार्टी ही बन गई, तो राहुल के लिए मोदी के अलावा केजरीवाल एक नई चुनौती बन जाएंगे.

हार मिली तो सबसे पहले उंगलियां राहुल पर ही उठेंगी

इन हालात में स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को कोई ज्यादा फायदा नहीं होने वाला. राहुल ने यहां सपा के साथ गठबंधन कर, अखिलेश के साथ चुनावी रैलियों में शिरकत यह संदेश तो दे ही दिया है कि कांग्रेस अब अपने दम पर चुनाव नहीं लड़ सकती. वहीं अगर पंजाब में भी वह सत्ता से दूर रह गई तो सबसे ज्यादा उंगलियां राहुल पर ही उठेगीं. उनके खिलाफ एक बार फिर यह आक्षेप चल पड़ेगा कि वे अपने दम पर पार्टी को चुनाव नहीं जिता सकते. वे सिर्फ नरेंद्र मोदी को वैचारिक और शाब्दिक चुनौती ही दे सकते हैं, इससे ज्यादा कुछ नहीं. यहां एक तथ्य ध्यान में रखने की जरूरत है कि 2019 के चुनाव के लिहाज से भी अब तक यह करीब-करीब तय माना जा रहा है कि राष्ट्रीय राजनीति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इर्द-गिर्द ही घूमने वाली है.

चुनावी लिहाज से बड़े राज्यों में बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु में कांग्रेस पहले ही सिकुड़ चुकी है. महाराष्ट्र में यह भरोसा करना मुश्किल है कि वह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के बिना जीत सकेगी. मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और गुजरात जैसे राज्यों में वह भाजपा के साथ अकेले मुकाबले में जरूर रहती है, लेकिन राजस्थान को छोड़कर दसियों साल से इन प्रदेशों की सत्ता हासिल नहीं कर पाई है. इनमें से गुजरात में इसी साल के अंत में चुनाव हैं, जबकि राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में 2018 के अंत में. यानी ऐन उस वक्त जब देश का ज्यादा ध्यान चंद महीनों बाद (अप्रैल-मई में) होने वाले लोकसभा चुनाव पर टिक जाता है. कर्नाटक अभी कांग्रेस के पास है, मगर वहां भी उसे अगले साल के मध्य में होने वाले चुनाव के वक्त सत्ता-विरोधी रुझान का सामना करना पड़ेगा.

ऐसे में संभव है कि 2019 के चुनाव आते तक कांग्रेस सिर्फ पुडुचेरी की ही सत्ता में रह जाए, जो कि केंद्रशासित प्रदेश है. जहां तक मणिपुर या उत्तराखंड की बात है तो यह भी 11 मार्च को पता चलेगा कि इन राज्यों में कांग्रेस सत्ता तक पहुंच पाती है या नहीं. फिलहाल इसकी आधी-आधी संभावना है. यानी मौजूदा स्थिति यह है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के सामने चंद छोटे राज्यों तक सिमट जाने का खतरा पैदा हो गया है. आने वाले समय में इसके लिए काफी हद तक राहुल गांधी की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है और यह काम कांग्रेस के भीतर से ही होने लगे तो अचरज नहीं. क्योंकि राहुल खुद अपने फैसलों से विपक्ष में अपनी स्थिति कमजोर कर रहे हैं.