भारत को उम्मीद है कि अमेरिका के साथ एच-1बी वीजा मामले में जल्द ही कोई न कोई हल निकल आएगा. भारत इस मसले के हल के लिए अमेरिकी प्रशासन के साथ लगातार संपर्क में है.

केंद्रीय सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद के मुताबिक, ‘अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भारतीय आईटी कंपनियों की महत्वपूर्ण भागीदारी है. ये कंपनियां अमेरिकी प्रशासन को हर साल करीब 20 अरब डॉलर (लगभग 1,333 अरब रुपए) का कर भुगतान करती हैं. इसके अलावा अमेरिका में 4,00000 से ज्यादा रोजगार पैदा करती हैं. ऐसे में, उम्मीद करनी चाहिए कि समस्या का जल्द ही हल हो जाएगा.’

एक दिन पहले ही केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी विदेश, वित्त, वाणिज्य, दूरसंचार, सूचना-तकनीक मंत्रालयों के शीर्ष अधिकारियों के साथ इस मसले पर विचार किया था. इस बैठक में उद्याेग जगत की कुछ जानी-मानी कंपनियों के प्रतिनिधि भी थे. साथ ही, नैसकॉम (नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विसेज कंपनीज) के अध्यक्ष आर चंद्रशेखर ने भी इसमें हिस्सा लिया था.

इस बैठक के बाद चंद्रशेखर ने बताया, ‘हमने मंत्री को अपनी चिंताएं बता दी हैं. हम विभिन्न कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल अमेरिका भी भेजने वाले हैं. यह प्रतिनिधिमंडल अमेरिकी प्रशासन के शीर्ष नेतृत्व से मिलकर उन्हें अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भारतीय कंपनियों के योगदान के बारे में बताएगा. साथ ही, उनसे वीजा नीति में संभावित बदलावों पर फिर विचार करने का आग्रह करेगा.’

भारतीय कंपनियां राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार की ओर से एच-1वी वीजा नियमों में किए जा रहे बदलाव से चिंतित हैं. ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी संसद में एक प्रस्ताव पेश किया है. इस प्रस्ताव में एच-1बी वीजाधारकों की न्यूनतम तनख्वाह सालाना 60,000 से बढ़ाकर 1,30,000 डॉलर करने तथा यह वीजा जारी करने की सीमा सालाना 65,000 से घटाकर 50,000 करने जैसे कई सख्त प्रावधान हैं.