मैंने आदत बदल ली है. इस बार किस्सागोई के सफ़र को आगे से शुरू करते हैं और फिर गुज़रे वक़्तों में यानी मंज़िल तक ले जाते हैं...किस्सा 2016 से शुरू होता है...

देश के एक बड़े विश्वविद्यालय के एक कमरे में कुछ लोग फैज़ अहमद फैज़ की नज़्म गा रहे हैं:

‘बोल के लब आज़ाद हैं तेरे,

बोल ज़बां अब तक तेरी है,

तेरा सुतवां जिस्म है तेरा,

बोल के जां अब तक तेरी है...’

गाने वालों को आगे के बोल याद नहीं आ रहे... तभी उन छात्रों का एक नेता (सहूलियत के लिए उसका नाम केके रख लेते हैं) कहता है - ‘पंखुड़ी को बुलाओ...’

पंखुड़ी हांफते-दौड़ते पहुचती है और नज़्म आगे बढ़ाती है....

‘देख वो अहांगर(लोहार) की दुकां में,

तुंद(गरम) हैं शोले, सुर्ख़ है आहन(लोहा)

खुलने लगे कुफ़्लों(ताले) के दहाने(मुंह)

फैला हर ज़ंज़ीर का दामन’

सब पंखुड़ी के पीछे-पीछे गा रहे हैं. नज़्म की एक-एक लाइन को ऊंची आवाज़ में कई-कई बार दोहराया जा रहा है. कमरा अब तक भर चुका है. कई और कदम कमरे की जानिब बढ़ रहे हैं...

‘बोल के थोड़ा वक़्त बहुत है,

ज़िस्म औ ज़ुबां की मौत से पहले,

बोल के सच ज़िंदा हैं अब तक,

बोल जो कुछ कहना है कह ले’

गाने वाले मुट्ठियां कस कर हाथों को हवा में लहरा कर गा रहे हैं... आख़री लाइन तक आते आते क्रेसेंडो हो गया.

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शाम तक पूरे कैंपस में ये नज़्म गायी जा रही थी....कैंपस के अंदर ठंड बढ़ गयी है. रात के वक़्त बड़े-बड़े अलाव जलाये गए हैं... मंच पर खड़ा केके छात्रों में जोश भर रहा है...थोड़ी देर के हो-हल्ले के बाद.

केके : ‘पंखुड़ी, फैज़ अहमद फैज़ की कहानी सुनाओ...’

पंखुड़ी हाथ में माइक संभाल कर : ‘पैदाइश आज के दिन सन 1911, गांव काला कादर, सियालकोट, आज का पाकिस्तान’... फिर ज़ोर देकर...’नहीं..., तब...का... हिं...दु...स्तान...’ माहौल में सनसनी फैल जाती है.

‘मैं ये बताने के लिए खड़ी नहीं हुई हूं कि फैज़ ने कहां पढाई की, किस गली में खेले, कितने भाई थे, किससे शादी की और कितने बच्चे पैदा किये... मैं ये बताने के लिए खड़ी हुई हूं कि फ़ैज़ ने कितने ख़यालों को जन्म दिया, ये कि कितने जज़्बातों से दुनिया को रूबरू कराया. और ये कि वो दुसरे के दर्द में कितना दर्दमंद थे.

तभी हुजूम में से एक आवाज़ उठती है, ‘हमें फैज़ के विचार सुनने हैं...’

‘फैज़ का जीवन ही फैज़ के विचार हैं.’ पंखुड़ी ने उसी आवाज़ की तरफ देख कर कहा...

‘अमृतसर आना उनकी ज़िंदगी का सबसे अहम् पड़ाव था. यहां उनके दोस्तों की वजह से सियासत की समझ उन्हें आने लगी, पहली मर्तबा वो शेर संजीदगी से लिखने लगे थे...’ कॉमरेडो, ये याद रखना फैज़ ने अमृतसर में आकर मज़दूर संगठन में काम किया था...’

फिर हुज़ूम में से आवाज़ आयी, ‘इंक़लाब गर लाएगा तो मज़दूर ही लाएगा...’

तभी ये नारा बनकर गूंजने लगा - ‘इंकलाब गर लाएगा तो मज़दूर ही लाएगा...’

दास्तानगोई आगे बढती है: ‘जब फैज़ दिल्ली आये तो उनकी दोस्ती मज़ाज, जान निसार अख़्तर, साहिर, सरदार जाफ़री, कृष्ण चंदर, राजिंदर सिंह बेदी जैसे तरक़्क़ी पसंद शायरों और अफ़सानानिगारों से हुई...’

केके उससे माइक से लेकर कहता है, ‘तरक़्क़ी पसंद शायरी मार्क्सवादियों, कम्युनिस्टों या तत्कालीन रूस के साम्यवाद में विश्वास रखने वालों की शायरी है. ये बात अलहदा कि रूस और चीन का साम्यवाद कब का मर गया और अब ये मुल्क़ भी पूंजीवादी अमेरिका के छोटे भाई की मानिंद हो गए हैं. दुनिया जिस पूंजीवाद को हर तक़लीफ़ का हल मान रही थी वो पूंजीवाद भी लंगड़ा कर चल रहा है. समाज में अमीरी और ग़रीबी की खाई पहले थी तो सही पर अब और भी बढ़ गयी है. हमें इसी खाई को पाटना है. अमीर से लेकर गरीब को देना है.’

केके की बातों ने उत्तेजना और बढ़ा दी... पंखुरी ने सांस भर कर कहा, ‘... आज जब पूंजीवाद ने देश की 99 प्रतिशत सम्पत्ति सिर्फ एक प्रतिशत लोगो के हाथों में दे दी है. आज के दौर में जब भूखों को कुछ टुकड़े डाल दिए जाते हैं पर उनकी बदहाली की वजह पर कोई बात नहीं होती. क्यों अमेरिका एक तरफ इसराइल बनाता है और दूसरी तरफ अफ़गानिस्तान, सीरिया जैसे मुल्क़ों को उजाड़ रहा है, इस दौर में जब सच बोलने पर अघोषित पाबंदी लगा दी गयी है, आपको और मुझको बोलना होगा. यही फैज़ ने किया था...यही है फैज़ की सोच...और यही हैं फैज़ अहमद फैज़... ‘ और वो कहकर खामोश हो गयी.

रात गहरा गयी थी और भीड़ अपने अपने हिस्से के फैज़ को लेकर छंट गयी. अब बस पंखुडी और कुछ चुनिंदा साथी फिर उसी कमरे में बैठे हुए हैं.... ‘पंखुड़ी , पूरी दास्ताँ सुनाओ.’

फैज़ के वालिद सुलतान अहमद अफ़गानिस्तान के अमीर अब्दुर रहमान की सत्ता में मीर मुंशी थे. उनका दूसरा निकाह फातिमा सुल्तान से हुआ और उनकी संतान थे फैज़ अहमद फैज़. उन्होंने स्कूल और कॉलेज के दिनों में अरबी, इंग्लिश, उर्दू, पंजाबी, फ़ारसी और बाद में रुसी ज़बान में महारत हासिल कर ली थी.

फैज़ की शायरी को आप दो हिस्सों में बांट सकते हैं - फैज़ की शुरूआती शायरी पर 1920 -1930 के दौर का असर रहा. वो दौर कुछ बेनियाज़ी का था, कुछ आज़ादी के ज़ज़्बे का था. उस दौर में हसरत मोहानी, जोश मलीहाबादी, हाफ़िज़ जालंधरी और अख़्तर शिरानी जैसे शायर धूम मचा रहे थे. 1935 के आते आते उनकी शायरी एक अलग रंग लेने लगी थे. अब वे सियासत को समझने लगे थे. ‘मुझसे पहली सी मोहब्बत मिरे महबूब न मांग’ उसी दौर में लिखा गया था. इस नज़्म की खास बात ये थी कि ये शुरू तो महबूब से होती है और बाद में वह महबूब-ए-वतन हो जाती है.

‘कुछ अशआर गुनगुना के सुनाओ, उस नज्म के’ किसी ने चिल्ला कर कहा.

‘...अनगिनत सदियों के तारीक बहिमाना (जानवर नुमा) तिलिस्म

रेशमो-अतलसों-किमख़्वाब (रेशम के कपड़े) में बनवाये हुए

जा-बा-जा बिकते हुए कूचा-औ-बाजार में ज़िस्म

ख़ाक में लिथड़े हुए, ख़ून में नहलाये हुए

लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे

अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे...

और भी दुःख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा

राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

मुझसे पहली-सी मोहब्बत मिरे महबूब न मांग

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इक़बाल की शायरी से भी कुछ हद तक फ़ैज़ मुतास्सिर तो थे पर बाद में वो इक़बाल से खयालातों से भी जुदा हो गए. इक़बाल की बाद के दौर की शायरी में ख़ुदा और इस्लाम हावी हो गया था. फैज़ अग्नोस्टिक(खुदा की सत्ता पर खामोश रहने वाला) थे. यही इक़बाल और उनमें फर्क था. ये बड़ा इत्तेफ़ाक है कि दोनों की पैदाइश सियालकोट की है और जिस कॉलेज से इक़बाल ने तालीम हासिल की उसी कॉलेज से फैज़ ने भी की थी. और फैज़ के अब्बा इक़बाल के अच्छे जानकारों में थे.

बाद के वक़्तों में ग़ालिब की शायरी फैज़ पर ‘ग़ालिब’ हुई. वैसे तो ग़ालिब का तकरीबन हर शायर पर असर है. पर जो बात फ़ैज़ को ग़ालिब से अलग करती है वो ये कि ग़ालिब ने कभी उस समाज का बयान नहीं किया जिसमें वे रह रहे थे. न उन हालातों का जिनसे हिंदुस्तान गुज़र रहा था. और न ही अवाम की मुश्किलातों की कोई पुरज़ोर बात गालिब ने कही. ग़ालिब की जिंदगी में 1857 का ग़दर सबसे अहम् पड़ाव था. उस दौर पर उन्होंने कुछ नहीं लिखा. बल्कि वज़ीफ़े और पेंशन की जुगाड़ में अंगरेज़ सरकार की तरफ़ झुक गए. वो उस दौर पर लिखते तो शायद आज ग़ालिब का वक़ार कुछ और ऊंचा होता. फ़ैज़ ग़ालिब की तरह अपने सुखन की तारीफ नहीं करते थे. वो कहते थे, खुद-बयानी बोरियत से भरे लोगों का काम है.

ग़ालिब ख़ास के शायर थे और इक़बाल अवाम के लेकिन फैज़ आवाम औ ख़ास के शायर थे. बाद के वक़्त यानी 50 के दशक के आसपास जब कोल्ड वॉर शुरू हो गया और अमेरिका और रूस ने अलग अलग ब्लॉक्स बना लिए और जब पाकिस्तान अमेरिकी खेमे में चला गया तो उन्हें बहुत धक्का लगा और सोवियत रूस से मोहब्बत शुरू हो गयी. इन्ही दिनों पाब्लो नरूदा, पुश्किन सरीख़े शायरों के समाजवाद के ख़यालों से वे मुतास्सिर हुए.

‘कई बार जेल भी तो गए थे फैज़’ एक लड़के ने कहा. ‘हां, सबसे ज्यादा वक़्त उन्होंने रावलपिंडी साजिश केस में गुजारा. दरअस्ल, ये साजिश सोवियत रूस के इशारे पर हुई थी. प्लान था कि मेजर जनरल अकबर खान तब पाकिस्तान की लियाक़त अली खान की सरकार को गिरा देंगे और नयी सरकार चुनी जायेगी. चंद फौजी अफसरों के साथ इसमें फैज़ और उनके सबसे क़रीबी दोस्त सज्जाद ज़हीर भी शामिल थे. फैज़ उस समय पकिस्तान टाइम्स के एडिटर थे. तख़्तापलट होने से पहले ही प्लान लीक हो गया. फैज़, उनके दोस्त और बाकी के लोग बड़े ड्रामाई अंदाज़ में धर लिए गए. ‘दस्ते सबा’ और जिंदांनामा’ उस दौर में लिखी गयीं. ‘दस्ते-सबा’ की एक ग़ज़ल के दो अशआर सुनाती हूं जिससे आपको फैज़ के जेल के दिनों का अंदाज़ा होगा.’

‘तुम आये हो न शब-ए-इंतज़ार गुज़री है

तलाश में है सहर बार-बार गुज़री है’

जेल में ही उन पर मुकद्दमा चला, सैकड़ों झूठी गवाहियां हुईं. अनगिनत धाराओं में उन पर इलज़ाम लगे... ये शेर इस बात को कितनी खूबसूरती से बयान करता है:

वो बात सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र न था

वो बात उनको बहुत नागवार गुज़री है

केस के फैसले में उनके और सज्जाद ज़हीर के हिस्से आयी जेल की लंबी सज़ा.

जेल से छूटने के बाद भी सरकार से तनातनी बराबर रही. और अब वो ज़ाहिर तौर पर कम्युनिस्ट हो गए थे. बस चे ग्वेरा के जैसे टोपी नहीं पहनते. और जब कोई उनसे पूछता कि क्या वे कम्युनिस्ट हो गए हैं? तो कहते –

‘...नहीं भाई, मैंने टोपी कहां पहनी है?’ वे मुसलसल पकिस्तान की सरकारों से दूर होते जा रहे थे और अवाम और सोवियत रूस के करीब. 1977 में जब जनरल जिया उल हक़ ने ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की सरकार का तख़्ता पलट किया तब फैज़ को नज़रबंद कर दिया गया था. एक दिन रोज़मर्रा की तरह सुबह वे सैर को निकले तो तैनात सिपाहियों को अंदेशा भी न हुआ और वे सिगरेट पीते-पीते पाकिस्तान से धुंआ होकर बेरुत चले गए. एलिस, उनकी बेगम और बच्चे भी साथ उड़ गए. कुछ इस तरह जैसे उनके वालिद अफगानिस्तान से इंग्लैंड भाग गए थे जब अफ़गानी आमिर को उनके जासूस होने का शुबाह हुआ था.

किसी ने पूछा,’ पंखुड़ी, तुम इतना सब कैसे जानती हो? वो लापरवाही से धुंआ उड़ाती हुई बोली – ‘जनरल नॉलेज है, बॉस...’ सब हंस पड़ते हैं. ‘अच्छा अब आगे सुनो... 1985 में जनरल ज़िया उल हक़ ने फैज़ के कलाम पर पाबंदी लगा दी थी. मतलब बैन कर दिया था और अगर कोई गाता हुआ पकड़ा जाए तो उसे जेल भी हो सकती थी. मशहूर गायिका इक़बाल बानो ने इस फरमान की मुख़ालफ़त की और कहा, ‘भाई हम तो गाएंगे. कोई गिरफ़्तार करे, तो मय साजिंदे करे जिससे हम जेल में भी फैज़ को गा सकें.’ और फिर लाहौर में 50000 लोगों के सामने, ‘हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे...’ सुनाई. इस नज़्म के बीच में एक लाइन आती है, ‘सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख़्त गिराए जाएंगे...’ तो इस बात ने 50000 लोगों में सनसनी पैदा कर दी और लगभग पांच मिनट तक सिर्फ तालियां पड़ती रहीं. इस नज़्म ने इक़बाल बानो को, बानो ने इस नज़्म को अमर कर दिया. कहते हैं के नज़्म उस दौर की एंथेम बन गयी थी.’

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‘उनकी शायरी तीसरी दुनिया की शायरी थी. कुछ एक नज़्म जैसे ‘आ जाओ ऐफ्रीका, ‘फिलिस्तीन के लिए’, ईरानी तुलबा के नाम’ इस बात की तस्दीक करती हैं. जब अमेरिका और उसके दोस्त मुल्कों ने यहूदियों को बाहर बसाने का प्लान बनाया तो एक नया मुल्क़ उन्हें दे दिया. जिस ज़मीन पर हज़ारों सालों से फ़िलिस्तीन रह रहे थे, अपने घर से बेघर हो गए. इस मुद्दे पर भी उन्होंने अमेरिका के खिलाफ जम कर बोला. ठीक उसी तरह उन्होंने बाग्लादेश के बनने पर भी एक नज़्म लिखी, ‘ढाका से वापसी पर.’ 1983 में जब इसराइल ने लेबनान पर हमला बोला तो उस समय वहां एक अखबार, ‘लोटस’, के संपादक थे. हमले के बाद फिर पाकिस्तान आ गए. उन्होंने 50 साल तक रूमानी और सियासी (पोलिटिकल) शायरी की और इस दौर के सबसे बड़े शायर बनकर उभरे’ पंखुड़ी रुक गयी थी....फिर बोली, ‘बस यही है फैज़ का फ़साना. बाकी तो बातें जैसे वे पहले ऐशियाई थे जिन्हें लेनिन शांति पुरुस्कार मिला. दो एक बार नोबल पुरुस्कार के लिए भी नामित हुए...हां, एक बात और वे एक बार इलाहाबाद गये थे और खुली कार में सडकों पर घुमाये जा रहे थे. लोगों ने हर उस सड़क को फूलों से भर दिया था जहां से वे गुज़रे. लेनिन अवार्ड पर दिया हुआ उनका भाषण दुनिया के चंद सबसे अच्छे भाषणों में से एक है. पाकिस्तान की एक टीवी एंकर जुगनू मोहसिन ने एक प्रोग्राम में कहा था - आज अगर कोई मुझे पूछे कि फील्ड मार्शल अयूब ख़ान कौन थे, तो मैं कहूंगी वो फैज़ अहमद फैज़ के दौर के सबसे पहले फौजी आमिर थे.’

किस्सा ख़त्म हो गया था. और लोग खामोश.

चलते चलते

कमरे में किसी मौजूद ने पंखुड़ी से कहा, ‘मालूम है तुमने ‘किस ऑफ़ लव’ आरएसएस के दफ्तर के बाहर किया था. यह भी मालूम है कि तुम पर साम्यवाद हावी है, पर बात ये है कि तुम इतना सब फैज़ के बारे कैसे जानती हो...?’ वो हंसते हुए बोली, ’फैज़ के दोस्त सज्जाद ज़हीर सज़ा काटने के बाद हिंदुस्तान आकर बस गए थे. मैं उन्हीं की पोती हूं.’