भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अंतरिक्ष विज्ञान का एक और कीर्तिमान अपने नाम कर लिया है. उसने बुधवार को एक साथ 104 उपग्रहों को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया. यह एक विश्व कीर्तिमान है, जो कि इससे पहले रूस के नाम था, जिसने 2014 में एक ही अभियान में 37 उपग्रहों का प्रक्षेपण किया था. यही नहीं भारत ने जिन उपग्रहों को इस बार अंतरिक्ष में भेजा है, उनमें 96 तो अमेरिका के हैं.

यहां अमेरिका और रूस का जिक्र करना इसलिए जरूरी है क्योंकि ये दोनों ही देश विज्ञान के मामले में दुनिया की दिशा तय करते रहे हैं. लेकिन अंतरिक्ष विज्ञान में इसरो की सफलता यह साबित करती है कि दुनिया की ये महाशक्तियां भी इस क्षेत्र में कार्यकुशलता और लागत के मामले में भारत से पीछे हो रही हैं या फिर मदद ले रही हैं. सिर्फ यही नहीं, इस अभियान के बाताल्लुक इसरो के प्रमुख एस किरण कुमार का बयान भी काबिलेगौर है. उन्होंने बताया है कि अभियान के आधे खर्च की भरपाई विदेशी ग्राहकों के भुगतान से हुई है. यानी अंतरिक्ष विज्ञान, खासकर उपग्रह प्रक्षेपण के क्षेत्र में भारत की क्षमताओं पर दुनिया के दूसरे देश भी भरोसा कर रहे हैं.

इसरो की यह और इससे पहले जनवरी-2014 में स्वदेशी क्रायोजनिक इंजन के साथ भूस्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण यान (जीएसएलवी डी 5) के सफल परीक्षण जैसी सफलताएं मिसाल पेश करती हैं. ये बताती हैं कि किस तरह कोई संगठन एक-एक लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करते हुए अपने मानव संसाधन के सर्वश्रेष्ठ उपयोग से अंतर्राष्ट्रीय स्तर की उपलब्धियां हासिल कर सकता है.

हर एक सफलता आपको पहले से बड़े लक्ष्य हासिल करने की महत्वाकांक्षा भी देती है. इसरो के साथ भी यही हुआ है. इस संगठन की परियोजनाएं भी बीते कुछ दशक में लगातार बड़ी और महत्वाकांक्षी होती गईं. जाहिर है कि इसकी अपनी चुनौतियां भी रहीं. उदाहरण के लिए ‘मंगलयान मिशन.’ जब इसरो ने इस मिशन की घोषणा की थी तो किसी को इसकी सफलता पर पक्का यकीन नहीं था. तब तक एशिया में ही तकनीकी रूप से भारत से कहीं ज्यादा उन्नत माने जाने वाले चीन और जापान जैसे देश कोशिश करने के बावजूद मंगल अभियान में सफलता नहीं पा सके थे. चीन का पहला मंगल मिशन यंगहाऊ-1, 2011 में असफल हो गया था. इसी तरह 1998 में जापान का मंगल अभियान ईंधन खत्म होने के कारण नाकाम चुका था. मंगल तक पहुंचने की अमेरिका की भी पहली छह कोशिशें नाकाम रही थीं.

भारत के पहले तक दुनिया में सिर्फ अमेरिका, रूस और यूरोपीय यूनियन ही कई कोशिशों के बाद मंगल पर कामयाब मिशन भेज पाए थे. लेकिन इसरो ने सभी आशंकाएं गलत साबित कर दीं. नवंबर 2013 को आंध्र प्रदेश में श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से छोड़ा गया मंगलयान पहली ही कोशिश में सितंबर 2014 को मंगल की कक्षा में सफलतापूर्वक प्रवेश कर गया. इस पर इसरो का खर्च भी सिर्फ 450 करोड़ रुपए हुआ, जो मंगलयान के समकालीन अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के मावेन मिशन (मंगल के लिए ही) के खर्च का 10वां हिस्सा है. लेकिन अगर यह कहें कि इन सफलताओं के बावजूद इसरो की कामयाबी का चरम अभी बाकी है तो गलत नहीं होगा.

जीएसएलवी डी-5 भविष्य में भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी की कई बड़ी कामयाबियों की वजह बन सकता है. यह रॉकेट इसरो की सेटेलाइट प्रक्षेपण की क्षमता कई गुना बढ़ा सकता है. यह पृथ्वी की कक्षा से 36,000 किलोमीटर की दूरी तक भी उपग्रह प्रक्षेपित कर सकता है और अपने साथ 2,500 किलोग्राम तक के वजनी उपग्रह लेकर जा सकता है. हालांकि दुनिया में फ्रांस जैसे देशों के पास 10,000 किलोग्राम वजन वाले उपग्रह ले जाने वाले एरियन जैसे रॉकेट मौजूद हैं. लेकिन इससे जीएसएलवी डी-5 की अहमियत को कम करके नहीं आंका जा सकता. इसरो ने इसी रॉकेट के लिए स्वदेसी क्रायोजनिक इंजन का विकास किया है.

यह इंजन बेहद कम तापमान पर ईंधन का भंडारण कर पाता है. इससे रॉकेट लॉन्चर की क्षमता बढ़ जाती है. यानी वह ज्यादा वजन उठाने में सक्षम हो जाता. क्रायोजनिक इंजन के जरिए अब इसरो जीएसएलवी रॉकेटों की उस श्रृंखला को विकसित करने की शुरुआत कर सकता है, जो कम से कम 4,500 किलोग्राम का उपग्रह अंतरिक्ष में ले जा सकें. कारोबारी लिहाज से भारत के लिए यह काफी फायदेमंद स्थिति होगी..

इसरो की स्थापना 1962 में जाने-माने वैज्ञानिक डॉक्टर विक्रम साराभाई के प्रयासों से हुई, जो भारत में उपग्रह संचार तंत्र की स्थापना करना चाहते थे. वे अंतरिक्ष तकनीक को सीधे विकास परियाेजनाओं से जोड़ने की मंशा रखते थे. डॉक्टर साराभाई की जीवनी लिखने वाली अमृता शाह बताती हैं, ‘शुरू में यह बहुत साधारण कार्यक्रम था. इसरो एक-एक पैसे को बड़ी सावधानी से खर्च करता था. संगठन के सामाजिक विकास से जुड़े लक्ष्य पूरी तरह स्पष्ट थे. लेकिन इसके साथ ही यह महत्वाकांक्षी कार्यक्रम भी था क्योंकि उस वक्त तक यह सोचना भी अटपटा लगता था कि भारत जैसा कोई गरीब देश अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में कदम बढ़ा सकता है.’

स्थापना के बाद से अब तक की यात्रा बताती है कि भारत सरकार के अंतरिक्ष विभाग के तहत आने वाला इसरो उन चुनिंदा सरकारी विभागों में से है, जो लगातार सकारात्मक नतीजे दे रहे हैं. इस संगठन को सभी सरकारों का भी भरपूर समर्थन मिलता रहा है. अगर ऐसा नहीं होता तो इसरो के पास विश्वस्तरीय वैज्ञानिक होने के बावजूद वह इस तरह के नतीजे नहीं दे सकता था. अभी पिछले कुछ साल को ही देखें तो विभिन्न सरकारों ने हर साल 25-30 फीसदी की दर से इसरो का बजट बढ़ाया है.

इसरो में भी अब तक एक मौके को छोड़ दें तो पिछले 50 साल में कोई घोटाला सामने नहीं आया. इकलौता मामला 2011 में सामने आया था, जिसमें आरोप लगा था कि संगठन ने निजी क्षेत्र की कंपनी देवास मल्टी मीडिया से औने-पौने दाम पर दुर्लभ कहे जाने वाले एस बैंड का 70 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम का सौदा किया है. हालांकि गड़बड़ी सामने आने के बाद सरकार ने इस पर निर्णायक तरीके से कार्रवाई की. इसरो के तत्कालीन प्रमुख जी माधवन नायर को हटा दिया गया. उन्हें यह भी बता दिया गया कि वे भविष्य में कोई सरकारी पद नहीं ले सकेंगे. लेकिन इस इकलौते मामले ने भी इसरो की प्रतिष्ठा को धूमिल नहीं होने दिया.

बीच-बीच में इसरो के अब तक के सफर में कुछ असफलाएं भी दर्ज हैं. इसके बावजूद यह साफ कहा जा सकता है कि इसरो, सरकार से सबसे ज्यादा माली मदद हासिल करने वाले विज्ञान-तकनीकी संगठनों में से है. और बाकी संस्थानों की तरह इस पर गोपनीयता का मोटा परदा भी नहीं है.

वैसे विज्ञान हमेशा से सरकारों की रुचि का क्षेत्र रहा है. इसीलिए वे समय-समय पर ऐसे इस संगठनों के कार्यक्रमों के बारे में पूछ-परख भी करती रही हैं. हालांकि रक्षा अनुसंधान व विकास संगठन (डीआरडीओ) और परमाणु ऊर्जा केंद्रों के मामले में ऐसा नहीं होता क्योंकि ये संस्थान इसरो की तरह खुले नहीं हैं. इसरो के जैसी फंडिंग का मॉडल भी इन संगठनों या लोकनिर्माण जैसे विभागों पर लागू नहीं हो सकता. फिर भी इसरो के कामकाजी मॉडल से ये विभाग यह प्रेरणा तो ले ही सकते हैं कि सफलता की सीढ़ियां कैसे चढ़ते हैं.