‘लोकतंत्र का अंतिम क्षण है, कहकर आप हंसे’, रघुवीर सहाय की यह पंक्ति हिंदी की कुछ सबसे लोकप्रिय पंक्तियों में से है. जो कहते हैं कि मुक्त छंद कविता लोकप्रियता में छंदोबद्ध कविता का मुकाबला नहीं कर सकती, वे अगर ऐसी पंक्तियों की सूची बनाने लगें, तो उन्हें ताज्जुब होगा. रघुवीर सहाय ऐसे कवि हैं जो संसदीय जनतंत्र के सार्वजनिक अनुभव की विडंबना को सबसे तीखे ढंग से व्यक्त करते हैं. जनता अपनी ही चुनी सरकार के आगे जिस कदर लाचार हो जाती है, उसकी चुभन रघुवीर सहाय की कविताओं में अभिव्यक्त होती है.

हंसी की किस्मों पर रघुवीर सहाय की ख़ास नज़र है. आपकी हंसी’ शीर्षक वाली कविता - जिसकी दूसरी पंक्ति से यह टिप्पणी शुरू की गई है - इस प्रकार है: ‘निर्धन जनता का शोषण है,/ कह कर आप हंसे/ लोकतंत्र का अंतिम क्षण है/ कह कर आप हंसे/ सबके सब हैं भ्रष्टाचारी/ कह कर आप हंसे /चारों ओर बड़ी लाचारी/ कह कर आप हंसे/ कितने आप सुरक्षित होंगे/ मैं सोचने लगा/ सहसा मुझे अकेला पाकर/ फिर से आप हंसे.’

पिछले साल नवंबर से इस कविता की याद बार-बार आई. तब जब जापान में हमारे देश के सबसे ताकतवर इंसान ने उंगलियां नचाते हुए सबको यह कह कर हंसने पर मजबूर किया कि शादी घर में है और जेब से पैसे गायब! फिर यह कहा कि देखो, मैंने सबको लाइन में खड़ा कर दिया. लोग फिर हंसे. सब, जो लाइन में खड़े हैं, भ्रष्टाचारी हैं, यह कहने वाला हंसा और उसे सुनने वाले भी हंसे, अपने अलावा बाकी सबको देखकर और उनकी भ्रष्टाचारी लाचारी का अनुमान करके.

एक हंसी, वह जो संसद में सुनाई पड़ी, जब वहां दार्शनिक चार्वाक को दो पंक्तियों में निबटा दिया गया और उनका इस्तेमाल एक सांसद पर फिकरा कसने के लिए किया गया. चार्वाक के बारे में ऐसी हल्की समझ नुक्कड़ की चाय-दुकान पर तो चल जाएगी, लेकिन संसद में, वह भी देश के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति द्वारा! और उसके जवाब में होगी सिर्फ एक सत्तासीन हंसी! इस आधिकारिक हंसी के आगे भारतीय दर्शन चुप रहने के अलावा कर भी क्या सकता है!

चार्वाक पर इस टिप्पणी और उस पर संसदीय हंसी का अनुमान निश्चय ही प्रेमचंद ने न किया होगा जब ‘हंसी; नामक निबंध में उन्होंने संस्कृत साहित्य से इस संबंध में एक नमूना पेश किया: ‘ज़बान कट नहीं जाती, सर फट नहीं जाता, फिर भी जब जो मुंह में आए बोलने में हर्ज ही क्या है.’

और एक हंसी वह थी जो बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के छात्रों और शिक्षकों के बीच से फूट कर सभागार में फैल गई, जब उनके सामने प्रधानमंत्री ने विपक्ष के नेता की नक़ल उतारी.

एक वक्त था जब भारतेंदु हरिश्चंद्र एक नाटक के बीच से उठकर चले गए कि भांडपन वे बर्दाश्त नहीं कर सकते. हंसी खींचना नाटक की सफलता कुछ लोगों के लिए है, भारतेंदु के लिए कतई न थी.

हंसी और फूहड़पन के बीच एक रिश्ता है जो परिष्कृत रुचि को उससे सावधान करता है. प्रेमचंद लिखते हैं कि पशु विज्ञान के किसी पंडित ने यह छानबीन नहीं की लेकिन हंसी और निर्लज्जता में कोई संबंध ज़रूर है.

प्रेमचंद लेकिन नहूसतपसंद न थे. उनके लिए लेखक वही है जो ग़म की कहानी को मज़े लेकर कहता है. खुद वे ‘फसानाए आज़ाद’ के मुरीद थे और रतन नाथ सरशार के पात्र खोजी को वे विश्व साहित्य के अमर पात्रों में - शेक्सपीयर के फॉल्स्टाफ और सर्वान्तिस के डॉन क्विक्जोट - की कतार में रखते थे. वे मुंह लंबा करके गंभीर बने रहने पर लानत भेजते थे. लेकिन उनके लिए भी मज़े और मज़े में फर्क है.

क्या आप मज़ा ले रहे हैं या मज़ाक उड़ा रहे हैं? और किसका? खुद से कमज़ोर की हंसी उड़ाने में कोई शान नहीं, ताकतवर की खिल्ली उड़ाने में ज़रूर बहादुरी है.

मिखाइल बाख्तीन कार्निवाल की हंसी को इस श्रेणी में रखते हैं, हमारे यहां स्वांग और भड़ैती के जरिए ज़मींदारों का मज़ाक उड़ाना क्षम्य था. लेकिन क्या सचमुच. गोबर ने जो स्वांग होली में रचा, उसकी कीमत उसके पिता को चुकानी ही पड़ी. उसकी हिमाकत को बर्दाश्त न किया गया. कौन हंस सकता है और कितना, यह भी उसकी हैसियत पर निर्भर है.

कौन सी हंसी क्षम्य है और कौन सी नहीं, इसे तय करने का एक और आधार यह हो सकता है कि क्या वह किसी को अलग-थलग तो नहीं कर रही. अगर वह किसी को, किसी समुदाय को अपमानित कर रही है तो निश्चय ही उसमें शामिल होना जुर्म है.

आप किसका मज़ा ले रहे हैं, इससे आपका भी स्तर तय होता है. मेरिल स्ट्रीप ने हाल में अमरीका के राष्ट्रपति को फटकार लगाई क्योंकि उन्होंने एक विकलांग पत्रकार की शारीरिक अक्षमता के सहारे मज़ा पैदा किया था.

हमारे यहां कोई मेरील स्ट्रीप नहीं और भारतेंदु भी दूसरे ज़माने के लोग थे. फिर भी अपने कुछ करीब रघुवीर सहाय की मदद से तो हम पहचान सकते हैं कि किस हंसी में कितना कलुष है और कौन कितनी क्रूर है. यह भी कि वह सत्ता कैसी है जो हमें अपनी हर बात पर खुश होते ही देखना चाहती है.

रघुवीर सहाय ने अपने एक संग्रह का नाम ही रखा, ‘हंसो, हंसो जल्दी हंसो.’ इस कविता की ये पंक्तियां देखिए - ‘हंसो अपने पर न हंसना क्योंकि उसकी कड़वाहट पकड़ ली जाएगी/ और तुम मारे जाओगे.’ और यह - ‘सबको मानने दो कि तुम सबकी तरह परास्त होकर / एक अपनापे की हंसी हंसते हो/ जैसे सब हंसते हैं बोलने के बजाय.’

रघुवीर सहाय किस गुंबद में गूंजती हंसी का जिक्र कर रहे हैं, क्या उसे पहचानना इतना मुश्किल रह गया है? – ‘जितनी देर ऊंचा गोल गुंबद गूंजता रहे, उतनी देर/ तुम बोल सकते हो अपने से/ गूंज थमते थमते फिर हंसना.’

हंसते रहना इसलिए कि अगर चुप रहे और इस राष्ट्रीय हंसी में शामिल न हुए तो आप दूसरे हो जाओगे.

तो, आइए, या तो हंसें, या हंसी में हंसी मिलाएं.