अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की संरक्षणवादी नीतियों ने सभी की मुश्किलें बढ़ा रखी हैं. माना जा रहा है अब इनका अगला शिकार आईटी कंपनियां होने वाली हैं. सात मुस्लिम देशों के लोगों के अमेरिका आने पर रोक लगने के कार्यकारी आदेश के कुछ ही दिनों बाद व्हाइट हाउस से एक नए कार्यकारी आदेश का कथित मसौदा लीक हुआ है. अमेरिकी मीडिया के मुताबिक इस मसौदे में एच-1बी वीजा के नियमों को कड़ा करने का प्रस्ताव है. इसमें न केवल एच-1बी वीजा के लिए न्यूनतम आय को दोगुना करने का प्रस्ताव है, बल्कि इंसपेक्टर राज बढ़ाने और पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के उस फैसले को भी पलटने की बात कही गई है जिसके तहत विदेशी छात्रों को पढ़ाई पूरी करने के बाद अमेरिका में रुकने की छूट मिल जाती है.

इस कथित मसौदे की सत्यता को लेकर जाहिर की जा रही आशंकाएं तब खत्म हो गयीं जब व्हाइट हाउस के प्रेस सचिव सान स्पाइसर ने कुछ ही घंटे बाद साफ़ कर दिया कि राष्ट्रपति ट्रंप का यह कदम प्रवासी सुधार संबंधी व्यापक कार्यक्रम का ही हिस्सा है जिसकी वे लंबे समय से बात करते आ रहे हैं. इस प्रस्ताव के लीक होने और डोनाल्ड ट्रंप की वादे पूरे करने की तेजी ने अमेरिकी और भारतीय आईटी कंपनियों सहित भारत सरकार के माथे पर भी बल डाल दिए हैं.

क्या है एच -1बी वीजा ?

एच-1बी वीजा एक गैर-प्रवासी वीजा है. यह किसी कर्मचारी को अमेरिका में छह साल काम करने के लिए जारी किया जाता है. अमेरिका में कार्यरत कंपनियों को यह वीजा ऐसे कुशल कर्मचारियों को रखने के लिए दिया जाता है जिनकी अमेरिका में कमी हो. इस वीजा के लिए कुछ शर्तें भी हैं. जैसे इसे पाने वाले व्यक्ति को स्नातक होने के साथ किसी एक क्षेत्र में विशेष योग्यता हासिल होनी चाहिए. साथ ही इसे पाने वाले कर्मचारी की सैलरी कम से कम 60 हजार डॉलर यानी करीब 40 लाख रुपए सालाना होना जरूरी है. इस वीजा की एक खासियत भी है कि यह अन्य देशों के लोगों के लिए अमेरिका में बसने का रास्ता भी आसान कर देता है, एच-1बी वीजा धारक पांच साल के बाद स्थायी नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं. इस वीजा की मांग इतनी ज्यादा है कि इसे हर साल लॉटरी के जरिये जारी किया जाता है. एच-1बी वीजा का सबसे ज्यादा इस्तेमाल टीसीएस, विप्रो, इंफोसिस और टेक महिंद्रा जैसी 50 से ज्यादा भारतीय आईटी कंपनियों के अलावा माइक्रोसॉफ्ट और गूगल जैसी बड़ी अमेरिकी कंपनियां भी करती हैं.

वीजा के विरोध की वजह?

अमेरिका में पिछले कई सालों से इस वीजा को लेकर लोग कड़ा विरोध करते आ रहे हैं. उनका मानना है कि कंपनियां इस वीजा का गलत तरह से इस्तेमाल करती हैं. उनकी शिकायत है कि यह वीजा ऐसे कुशल कर्मचारियों को जारी किया जाना चाहिए जो अमेरिका में मौजूद नहीं हैं, लेकिन कंपनियां इसका इस्तेमाल आम कर्मचारियों को रखने के लिए कर रही हैं. इन लोगों का आरोप है कि कंपनियां एच-1बी वीजा का इस्तेमाल कर अमेरिकियों की जगह कम सैलरी पर विदेशी कर्मचारियों को रख लेती हैं.

पिछले कुछ सालों में इसे लेकर कई अदालती लड़ाइयां भी लड़ी जा चुकी हैं. 2015 में अमेरिका की मशहूर कंपनी डिज्नी को एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी थी. डिज्नी के कुछ कर्मचारियों का आरोप था कि कंपनी ने कम सैलरी की वजह से उनकी जगह एच 1बी वीजा धारक कर्मचारियों को रखा था. कई अन्य मामलों में अमेरिकी कर्मचारियों का यह भी कहना है कि उनकी कंपनी ने उन्हें निकालने से पहले उनसे अपना काम एच-1बी वीजा धारक कर्मचारियों को सिखाने के लिए कहा था. इस वीजा के गलत इस्तेमाल को लेकर भारतीय आईटी कंपनियों पर भी आरोप लगते रहे हैं. 2013 में भारतीय आईटी कंपनी इंफोसिस को ऐसे ही एक मामले को लेकर करीब 25 करोड़ रुपए का जुर्माना देना पड़ा था.

अमेरिका में पिछले काफी समय से यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी रहा है और चुनाव के समय पार्टियां इस पर शिकंजा कसने को लेकर वादे भी करती हैं. पिछले साल हुए चुनावों में डोनाल्ड ट्रंप ने इसे एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था. ट्रंप ने अपनी कई रैलियों में इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की बात भी कही थी. इससे पहले भी वहां की सरकारें पूरी कोशिश करती रही हैं कि कंपनियां इस वीजा का कम से कम इस्तेमाल कर पाएं और इसलिए समय-समय पर इसकी फीस में भारी इजाफा भी किया जाता रहा है. ओबामा सरकार ने पहले 2010 में और उसके बाद 2016 में एच-1बी वीजा की फ़ीस में भारी बढ़ोतरी की थी. बीते साल जनवरी में इस फ़ीस को 2000 से बढ़ाकर 6000 डॉलर कर दिया गया था. इस पर भारत सरकार ने कड़ी प्रतिक्रिया जताई थी.

भारत की चिंता का कारण

पिछले दिनों जब इससे संबंधित कार्यकारी आदेश का मसौदा सार्वजनिक हुआ तो अचानक बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में तीन प्रमुख भारतीय कंपनियों के शेयर अचानक तेजी से गिर गए. भारतीय आईटी कंपनी टीसीएस के शेयर में 4.4 फीसदी तो इंफोसिस और विप्रो के शेयरों में 2-2 फीसदी की गिरावट आ गई. इस गिरावट का प्रमुख कारण यह है कि इन कंपनियों का करीब 60 फीसदी राजस्व यानी रेवेन्यू अमेरिका से आता है. साथ ही ये सभी कंपनियां बड़ी संख्या में एच-1बी वीजा धारकों से काम करवाती हैं.

अमेरिकी श्रम मंत्रालय के अनुसार बीते साल इस वीजा के लिए आवदेन करने वाली कंपनियों में विप्रो, इंफोसिस और टीसीएस का नंबर क्रमश: पांचवां, सातवां और दसवां था. साथ ही इन्हीं कंपनियों को सबसे ज्यादा एच-1बी वीजा की मंजूरी मिली थी. मंत्रालय के अनुसार हर साल दिए जाने वाले कुल 85000 एच-1बी वीजा में से 60 फीसदी भारतीय कंपनियों को दिए जाते हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका में इंफोसिस के कुल कर्मचारियों में 60 फीसदी से ज्यादा एच 1बी वीजा धारक हैं. इसके अलावा वाशिंगटन और न्यूयॉर्क में एच-1बी वीजा धारकों में करीब 70 प्रतिशत भारतीय हैं.

इन आंकड़ों को देखकर साफ़ हो जाता है कि यदि अमेरिका में एच-1बी वीजा दिए जाने के नियमों में कोई बदलाव किया गया तो इससे सबसे ज्यादा भारतीय इंजीनियर और भारतीय कंपनियां प्रभावित होंगी. साथ ही इसका बुरा प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा. पिछले दिनों भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने कहा था, ‘अगर अमेरिका में एच-1बी वीजा नियम कड़े किये जाते हैं तो इसका सबसे ज्यादा असर भारत की जीडीपी पर पड़ेगा और जो हमने 8-10 फीसदी की जीडीपी का लक्ष्य निर्धारित किया है उसे हम हासिल नहीं कर पाएंगे.’

दरअसल, भारतीय जीडीपी में भारतीय आईटी कंपनियों का योगदान 9.5 प्रतिशत के करीब है और इन कंपनियों पर पड़ने वाला कोई भी फर्क सीधे तौर पर अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगा. यही वजह है कि भारत सरकार ने भी अमेरिका से वीजा नियमों में बदलाव की खबर आते ही ट्रंप प्रशासन को अपनी चिंताओं के बारे में सूचित कर दिया है. इस मसले पर केंद्र सरकार और आईटी कंपनियों के अधिकारियों के बीच कई बैठकें भी हो चुकी हैं. खबर यह भी है कि इस महीने के अंत में भारत आ रहे 27 अमेरिकी सांसदों के सामने भी यह मुद्दा भारत सरकार और प्रमुख आईटी कंपनियों के द्वारा जोर-शोर से उठाया जाएगा.