शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे भाजपा से बहुत नाराज़ हैं या यूं कहे उद्धव ठाकरे को भाजपा के सिर्फ तीन नेताओं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस से निजी दिक्कत है तो ज्यादा मुफीद रहेगा. उद्धव के पास भाजपा के इन तीन नेताओं के नाम शिकायतों की एक लंबी लिस्ट है. मुसीबत ये है कि भाजपा के शीर्ष नेता उद्धव के मन की बात जानते हैं, लेकिन उनकी शिकायतों का समाधान नहीं करते. यही वजह है कि भाजपा की सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी धीरे-धीरे दूर होती गई है.

महाराष्ट्र की सियासत पर पैनी नज़र रखने वाले कहते हैं कि साल 2014 के लोकसभा चुनाव तक सब ठीकठाक था. महाराष्ट्र में शिवसेना मेन रोल में थी और भाजपा साइड रोल में. लेकिन 2014 चुनाव के बाद हालात अचानक बदलने लगे. शिवसेना के एक नेता ने अनौपचारिक बातचीत में बताया कि उद्धव ठाकरे ये मानकर चल रहे थे कि महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में शिवसेना वरिष्ठ सहयोगी होगी और भाजपा कम सीटों पर ही चुनाव लड़ेगी. पिछले 23 साल से ऐसा ही होता रहा था. लेकिन अमित शाह भाजपा के अध्यक्ष बने और उन्होंने महाराष्ट्र में भाजपा का मुख्यमंत्री स्थापित करने की कसम खा ली.

महाराष्ट्र भाजपा के एक नेता बताते हैं कि देवेंद्र फड़णवीस को अकेले दम पर चुनाव की तैयारी करने की बात अमित शाह ने पहले ही कह दी थी. शिवसेना और भाजपा के आज के नेतृत्व के बीच मनमुटाव यहीं से शुरू हुआ. मातोश्री के करीबी सूत्र बताते हैं कि शिवसेना प्रमुख की इच्छा महाराष्ट्र की सरकार चलाने की थी. अगर शिवसेना भाजपा गठबंधन की सरकार बनती और शिवसेना बड़ा दल होता तो मुख्यमंत्री की कुर्सी शिवसेना को मिलती. लेकिन ऐसा हो न सका. उद्धव ठाकरे की इस इच्छा को भाजपा का शीर्ष नेतृत्व जानता भी था, लेकिन 23 साल की लंबी दोस्ती को दरकिनार कर भाजपा ने शिवसेना को ज्यादा सीटें देने से इंकार कर दिया.

बाल ठाकरे के युग में भाजपा के दो नेता प्रमोद महाजन और गोपीनाथ मुंडे उनके और भाजपा के बीच पुल का काम करते थे. लेकिन अब न प्रमोद महाजन हैं और न ही गोपीनाथ मुंडे  

भाजपा की खबर रखने वाले एक पत्रकार बताते हैं कि भाजपा ने शिवसेना को तर्क दिया कि देश में मोदी लहर है, इसलिए भाजपा महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में कम से कम बराबर सीटों पर लड़ेगी. इसके समर्थन में उद्धव ठाकरे को महाराष्ट्र के लोकसभा चुनाव के नतीजे बताए गए जहां भाजपा 23 सीटें जीती थी और शिवसेना सिर्फ 18. महाराष्ट्र की सियासत को बारीकी से पढ़ने वाले मानते हैं कि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे भाजपा को विश्वासघाती मान बैठे और इसलिए उन्होंने विधानसभा चुनाव से पहले गठबंधन तोड़ दिया.

विधानसभा चुनाव में भाजपा और शिवसेना अलग-अलग चुनाव लड़े. लेकिन ऐसी विधानसभा का गठन हुआ जहां भाजपा का मुख्यमंत्री बनाने के लिए अमित शाह को एनसीपी या फिर शिवसेना में से एक को चुनना था. शुरू में शरद पवार की बैसाखी पर भाजपा सरकार कुछ दिन चली, लेकिन बाद में शिवसेना से समझौता करना पड़ा. भाजपा के एक नेता बताते हैं कि यह समझौता भी भाजपा की शर्तों पर ही हुआ क्योंकि शिवसेना के पास मोलभाव करने के लिए ज्यादा गुंजाइश नहीं थी. फडणवीस सरकार में शिवसेना उपमुख्यमंत्री का पद और भारी-भरकम मंत्रालय चाहती थी. जब महाराष्ट्र में शिवसेना का मुख्यमंत्री था तो भाजपा के नेता गोपीनाथ मुंडे उपमुख्यमंत्री थे, भाजपा के विधायकों के पास वजनदार मंत्रालय भी थे. लेकिन इस बार भाजपा ने शिवसेना का समर्थन तो लिया लेकिन उसे उपमुख्यमंत्री की कुर्सी देने से इंकार कर दिया.

लेकिन घमासान इतने पर ही नहीं थमा. प्रधानमंत्री मोदी ने मंत्रिमंडल का विस्तार किया. शिवसेना के लोकसभा में 18 सांसद हैं इसलिए उसकी मांग थी कि मोदी सरकार में उसके दो कैबिनेट मंत्री होने चाहिए. अनंत गीते पहले से कैबिनेट मंत्री थे, प्रधानमंत्री सिर्फ एक और राज्यमंत्री की कुर्सी शिवसेना को देने के लए तैयार हुए. शिवसेना के कोटे से अनिल देसाई मंत्री पद की शपथ लेने के लिए दिल्ली आए लेकिन उद्धव ठाकरे ने उन्हें दिल्ली हवाईअड्डे से वापस मुंबई बुला लिया. इस एक घटना ने मातोश्री और मोदी सरकार के बीच खाई इतनी बढ़ा दी जो आज तक नहीं भर सकी है.

दरअसल शिवसेना के नेता चाहते हैं कि उद्धव ठाकरे को वही सम्मान मिले जो उनके पिता बालासाहेब ठाकरे को मिलता था. अटल-आडवाणी युग में भाजपा और शिवसेना के बीच एक मौखिक समझौता जैसा था कि देश की राजनीति भाजपा करेगी और महाराष्ट्र की राजनीति शिवसेना के इशारे पर होगी. नरेंद्र मोदी-अमित शाह के युग में यह समझौता पूरी तरह ध्वस्त हो गया. बाल ठाकरे के युग में भाजपा के दो नेता प्रमोद महाजन और गोपीनाथ मुंडे उनके और भाजपा के बीच पुल का काम करते थे. जब भी दोनों पार्टियों के बीच संबंध बिगड़ते थे प्रमोद महाजन और बाल ठाकरे मिल बैठकर पेंचीदा मसले सुलझा लेते थे. लेकिन अब न प्रमोद महाजन हैं और न ही गोपीनाथ मुंडे.

भाजपा के दिल्ली के नेताओं ने बातचीत करने का जिम्मा मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस पर छोड़ दिया जबकि मातोश्री की इच्छा थी कि मामला सुलझाने के लिए दिल्ली के नेता पहल करें  

आज दिल्ली में महाराष्ट्र से भाजपा का सबसे बड़ा नेता नितिन गडकरी को माना जाता है. उनके और मातोश्री के बीच कभी ऐसे रिश्ते नहीं रहे कि दुश्मनी के वक्त दोस्ती की गांठ बांधी जा सके. यही वजह है कि आज की शिवसेना भाजपा विरोध की राजनीति कर रही है, शिवसेना के मुखपत्र सामना में भाजपा और मोदी सरकार के खिलाफ ऐसी तीखी टिप्पणी की जाती है जितनी कांग्रेस के नेता भी नहीं करते. महाराष्ट्र की सरकार में जूनियर बनने के बाद मुंबई नगर निगम चुनाव जिसे बीएमसी कहा जाता है, एकमात्र मौका है जब शिवसेना अपना दबदबा दिखा सकती है. शिवसेना की दलील थी कि अब 2014 जैसी मोदी लहर महाराष्ट्र में नहीं दिखती, इसलिए भाजपा को अब अपनी असली ताकत समझनी चाहिए.

बीएमसी चुनाव में भाजपा को भी शिवसेना की ज़रूरत थी. लेकिन यहां भी वही हुआ जो विधानसभा चुनाव में गठबंधन टूटने की वजह बना था. इस बार भाजपा की तरफ से बराबरी की वकालत की गई. खुद मुख्यमंत्री दवेंद्र फड़णवीस ने बीएमसी चुनाव में बराबर-बराबर सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कही. लेकिन शिवसेना की तरफ से 227 में से सिर्फ 60 सीट देने का ऑफर आया. साल 2012 में शिवसेना बीएमसी की 158 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और 75 सीटें जीती थी. भाजपा 69 सीट पर मैदान में उतरी थी और 32 सीटों पर विजय रही. शिवसेना चाहती थी कि बीएमसी में वही पुराना फॉर्मूला दोहाराया जाए. लेकिन भाजपा की दलील थी कि 2014 के विधानसभा चुनाव में मुंबई में भाजपा नंबर एक पर रही. मुंबई की 36 विधानसभा सीटों में से भाजपा ने 15 सीटें जीती और शिवसेना को 14 सीटें मिली. इसलिए बीएमसी में सीटों का बंटवारा 2014 के विधानसभा चुनाव के नतीजे के आधार पर होना चाहिए. अगर ज्यादा नहीं तो कम से कम बराबर की सीटें मिलनी चाहिए.

लेकिन इस बार भी उद्धव ठाकरे झुकने के लिए तैयार नहीं हुए. उद्धव के एक करीबी पत्रकार बताते हैं कि शिवसेना प्रमुख के मन की बात इस बार भी भाजपा नहीं समझ पाई. भाजपा के दिल्ली के नेताओं ने बातचीत करने का जिम्मा मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस पर छोड़ दिया जबकि मातोश्री की इच्छा थी कि मामला सुलझाने के लिए दिल्ली के नेता पहल करें. अगर प्रधानमंत्री खुद फोन उठाकर उद्धव ठाकरे से बात करते तो एक दिन में गठबंधन हो सकता था. लेकिन पिछले ढाई साल में पूरी तरह संबंध विच्छेद हो चुका है, बातचीत बंद है इसलिए ऐसा इस बार भी नहीं हुआ.

अब उद्धव ठाकरे को फरवरी में आने वाले बीएमसी चुनाव के नतीजे से ज्यादा मार्च में आने वाले उत्तर प्रदेश चुनाव के नतीजे का इंतजार है. उद्धव ने अपने हर इंटरव्यू में अखिलेश यादव की जमकर तारीफ की है और अखिलेश को एक और मौका देने की अपील तक कर दी है. उद्धव ने पहले ही कह दिया है कि महाराष्ट्र की सरकार नोटिस पीरियड पर चल रही है. यह नोटिस 11 मार्च तक का है.अगर उत्तर प्रदेश में भाजपा हारी तो महाराष्ट्र में मध्यावधि चुनाव की संभावना प्रबल हो जाएगी.