प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि एच-1बी वीजा को लेकर अमेरिका को संतुलित और दूरदर्शी नजरिया अपनाना चाहिए. अमेरिका से आए सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ मुलाकात में उन्होंने यह बात कही. माना जा रहा है कि अमेरिका द्वारा एच1बी वीजा सुविधा में कटौती का भारतीय सॉफ्टवेयर क्षेत्र पर बुरा असर पड़ेगा क्योंकि इससे भारतीय पेशेवरों की अमेरिका आवाजाही प्रभावित होगी. प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिकी सांसदों से कहा कि आज अमेरिकी समाज व अर्थव्यवस्था जिस मुकाम पर है उसमें भारतीय पेशवरों का बड़ा योगदान है.

अपने आक्रामक चुनाव प्रचार को लेकर चर्चा में रहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहली बार 4 मार्च 2016 को एच-1बी वीजा को लेकर अपना रुख स्पष्ट किया था. उन्होंने एक रैली में कहा था कि अगर वे अमेरिका के राष्ट्रपति बने तो इस पूरी कार्य प्रणाली को ही खत्म कर देंगे.

हालांकि, चुनाव के दौरान इस मुद्दे को उठाकर अमेरिकियों की नब्ज पकड़ने वाले ट्रंप के रुख में चुनाव जीतने के बाद चौंकाने वाला बदलाव देखा जा रहा है. पिछले हफ्ते व्हाइट हाउस के वरिष्ठ नीति सलाहकार स्टीफन मिलर ने भी संकेत दिए कि डोनाल्ड ट्रंप एच 1बी वीजा प्रणाली को पूरी तरह से खत्म करने के पक्ष में नहीं हैं और वे चाहते हैं कि योग्यता के आधार पर ही यह वीजा विदेशी लोगों को दिया जाए. मिलर के मुताबिक ट्रंप ने सुनिश्चित करने को कहा है कि नियमों को ऐसा बनाया जाए जिससे कंपनियों को भी मुश्किल न हो और अमेरिकी कर्मचारियों को भी विदेशी कामगारों के द्वारा विस्थापित न किया जा सके.

राष्ट्रपति बनने के एक हफ्ते के अंदर ही कई बड़े फैसले लेने वाले ट्रंप के रुख में एच 1बी वीजा को लेकर आए इस बदलाव को देखकर कई लोग हैरान हैं. असल में अन्य कार्यकारी आदेशों की तरह एच-1बी वीजा को लेकर कोई आदेश जारी करना अब डोनाल्ड ट्रंप के लिए आसान नहीं है. इसके कई कारण हैं.

बड़ी आईटी कंपनियों का विरोध

पिछले महीने डोनाल्ड ट्रंप ने इस मुद्दे को लेकर अमेरिका की करीब एक दर्जन बड़ी आईटी कंपनियों के साथ एक बैठक की थी. इसमें टेस्ला, ऐपल, गूगल, फेसबुक, माइक्रोसॉफ्ट और याहू के वरिष्ठ अधिकारियों ने हिस्सा लिया था. बताया जाता है कि इस बैठक में इन सभी ने ट्रंप से साफ़ तौर पर कह दिया कि उन्हें जिस तरह के लोगों की जरूरत है उनकी अमेरिका में भारी कमी है. इन लोगों का यह भी कहना था कि वीजा नियम कड़े करने के बजाय इनमें ढील दी जानी चाहिए. कंपनियों की ओर से यह भी कहा गया कि अगर नियमों में सख्ती हुई तो इसका खामियाजा अमेरिकी अर्थव्यवस्था की कमजोरी के रूप में सामने आ सकता है.

हालांकि, इस दौरान ट्रंप ने भी कई उदाहरण देते हुए कहा कि एच-1बी वीजा का कई कंपनियां गलत इस्तेमाल कर रही हैं और इसके सबूत भी हैं. उनकी दलील थी कि कंपनियां नियमों के विपरीत इसका उपयोग बाहर से सस्ते कर्मचारी लाकर अमेरिकियों की नौकरियां छीनने के लिए कर रही हैं इसलिए नियम कड़े करना जरूरी है. उन्होंने कंपनियों से यह भी पूछा कि अगर वे बड़ी कंपनियों (जो एच-1बी वीजा का सबसे ज्यादा उपयोग करती हैं) के लिए वीजा की फ़ीस को कई गुना बढ़ दें तो क्या किसी को आपत्ति है. बताया जाता है कि इस पर किसी कंपनी ने कोई आपत्ति नहीं जताई. रॉयटर्स के मुताबिक इस बैठक में ट्रंप का रुख काफी नरम था और कंपनियों की बात सुनने के बाद वे बीच का रास्ता खोजते नजर आ रहे थे.

ट्रंप खुद भी एक उद्द्योगपति हैं

राष्ट्रपति चुनाव के दौरान पांच प्रमुख मुद्दों में शामिल रहे एच-1बी वीजा के मुद्दे पर अब ट्रंप के रुख में आई नरमी का एक कारण जानकार उनका उद्योगपति होना भी मानते हैं. इनके मुताबिक अमेरिका में ट्रंप की कंपनियां भी एच-1बी वीजा का इस्तेमाल करती हैं और इसलिए वे अच्छे से जानते हैं कि अगर इस प्रक्रिया में कोई बड़ा बदलाव किया गया तो अमेरिकी कंपनियों और अमेरिकी अर्थव्यवस्था का भट्टा बैठ सकता है.

अमेरिका के श्रम मंत्रालय की ओर से ट्रंप की दो कंपनियों के बारे में मीडिया को जानकारी मिली है. इसके मुताबिक डोनाल्ड ट्रंप की ‘ट्रंप नेशनल गोल्फ क्लब’ और ‘ट्रंप मॉडल मैनेजमेंट’ पिछले छह सालों से हर साल दो दर्जन से ज्यादा एच-1बी वीजा धारकों को अपने यहां नौकरी देती है. जानकारों का मानना है कि चुनाव जीतने के लिए भले ही ट्रंप ने इस मुद्दे को जोर शोर से उठाया हो लेकिन, एक सफल व्यवसायी के रूप में अब तक की अपनी जिंदगी गुजार चुके ट्रंप इस मुद्दे की गंभीरता को समझते हैं. यही कारण है कि अपने प्रशासन के दबाव के बाद भी वे बीच का रास्ता अपनाने पर ही जोर दे रहे हैं.

भारत के साथ रिश्तों का दबाव

पिछले कुछ सालों में वैश्विक राजनीति में जिस तरह के समीकरण बने हैं उनमें भारत अमेरिका का एक बड़ा सहयोगी बनकर सामने आया है. चीन से मिल रही चुनौती हो या पाकिस्तान और चीन के मजबूत होते रिश्ते, अमेरिका और भारत दोनों के लिए ही एक दूसरे का साथ महत्वपूर्ण बन गया है. अमेरिका के लिए भारत के महत्व का पता इस बात से भी चलता है कि पिछले दिनों राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद दुनिया के जिन पांच लोगों से डोनाल्ड ट्रंप ने फोन पर सबसे पहले बात की थी उनमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल थे.

जानकारों के मुताबिक ट्रंप प्रशासन इस बात को अच्छे से जानता है कि एच-1बी वीजा को लेकर कोई बड़ा फैसला होता है तो इसका सबसे ज्यादा खामियाजा भारत को ही उठाना पड़ेगा. भाररत में 150 अरब डॉलर की आईटी इंडस्ट्री का 60 फीसदी से ज्यादा राजस्व अमेरिका से आता है और भारतीय कंपनियां ही सबसे ज्यादा एच-1बी वीजा धारकों का इस्तेमाल भी करती हैं. अमेरिकी मीडिया के अनुसार ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप वीजा मामले में जल्दबाजी में कोई फैसला लेकर एशिया में अपने महत्वपूर्ण साथी भारत से संबंध नहीं बिगाड़ना चाहते हैं. पिछले दिनों व्हाइट हाउस से एच-1बी वीजा से जुड़े कार्यकारी आदेश का कथित मसौदा लीक होने के तुरन्त बाद भारत सरकार ने ट्रंप प्रशासन को अपनी चिंताओं के बारे में सूचित कर दिया था. इसके अलावा जैसा कि रिपोर्ट की शुरुआत में जिक्र हुआ, भारत आए 26 अमेरिकी सांसदों के सामने खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मुद्दे को उठाया है.

भारतीय कंपनियों के अमेरिका से जाने का खतरा

भले ही दुनिया को एच-1बी वीजा का मुद्दा डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद काफी बड़ा लग रहा हो लेकिन, अमेरिका में यह काफी समय से एक राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है. अमेरिकी संसद में करीब एक दशक से इसकी प्रक्रिया में बदलाव को लेकर बिल आ रहे हैं और वहां की संसद लगभग हर दो-चार साल बाद इसकी फीस में भी इजाफा कर देती है. इन सब बातों को भारतीय आईटी कंपनियां अच्छे से जानती हैं और इसीलिए उन्होंने कई साल पहले ही इस मामले में बनने वाली किसी भी विपरीत परिस्थिति से निपटने की तैयारी शुरू कर दी थी. पिछले एक दशक में भारतीय कंपनियों ने अमेरिका के पड़ोसी देशों में तेजी से अपना विस्तार किया है.

अमेरिका में 2006-2007 में यह मुद्दा जोर पकड़ने के बाद 2007 में टीसीएस ने अर्जेंटीना, ब्राजील, चिली और उरुग्वे जैसे देशों में अपने ऑफिस खोले. इसके अलावा उसने अमेरिका के पड़ोसी देश मैक्सिको में एक बड़ा ‘ग्लोबल डिलीवरी सेंटर’ स्थापित किया. भारतीय कंपनी विप्रो ने भी मैक्सिको में अपने कई ऑफिस खोले हैं. इंफोसिस ने उत्तरी अमेरिकी देशों में कई ऑफिस खोलने के बाद 2013 से बड़ी संख्या में गैर अमेरिकी कर्मचरियों को इनमें भेजना शुरू कर दिया है. हाल में एच-1बी वीजा में बदलाव होने की खबर आने के बाद मैक्सिको सरकार ने भारतीय कंपनियों को अपने यहां आने का न्योता भी दिया है.

जानकर कहते हैं कि अमेरिकी प्रशासन इन बातों से अच्छे से परिचित है और वह जानता है कि अगर एच-1बी वीजा के नियमों में कोई बड़ी पाबंदी लगाई गई तो भारतीय कंपनियां अमेरिका की जगह पडोसी देशों पर अपनी निर्भरता बढ़ा देंगी जिससे अमेरिका अर्थव्यवस्था और वहां के लोगों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ेगा.

लंबी संसदीय प्रक्रिया और कानूनी अड़चनें

हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप ने सात मुस्लिम देशों को लेकर एक कार्यकारी आदेश जारी किया था. लेकिन, एक हफ्ते के अंदर ही अमेरिकी अदालत ने इस पर रोक लगा दी थी. अमेरिका में अप्रवासी मामलों के विशेषज्ञ स्टीफन येल-लोहर कहते है कि अचानक कार्यकारी आदेश के जरिये वीजा नियमों में छोटे-मोटे बदलाव तो ट्रंप कर सकते हैं, लेकिन उन्होंने इसमें कोई बड़े बदलाव किये तो उन्हें अपने पिछले आदेश की तरह ही कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ेगा.

स्टीफन का यह भी कहना है कि अगर ट्रंप प्रशासन कानूनी लड़ाइयां जीत भी लेता है तो भी उसे ग्रीन कॉर्ड, वीजा की संख्या घटाने और न्यूनतम सैलरी बढ़ाने जैसे बड़े बदलावों को लेकर संसद की मंजूरी लेनी जरूरी होगी. उनके मुताबिक अचानक बिना किसी की सहमति के लिए गए कार्यकारी आदेश के जरिए जब इतने बड़े फैसले लिए जाएंगे तो इन पर संसद की सहमति बना पाना काफी कठिन हो जाएगा. ऐसे हालात में कानून में बदलाव करवाने के लिए ट्रंप प्रशासन को एक लंबी संसदीय प्रक्रिया का सामना करना पड़ेगा. जानकारों का मनाना है कि इन बातों को देखते हुए ट्रंप प्रशासन कार्यकारी आदेश के जरिये एच-1बी वीजा की शर्तों में कोई बड़ा बदलाव करने का खतरा नहीं उठाएगा.