कुछ समय पहले सोशल मीडिया पर एक तस्वीर घूम रही थी जिसमें कस्तूरबा महात्मा गांधी के पैर पखारती नजर आ रही थीं. इस तस्वीर के बहाने यह संदेश देने की कोशिश की जा रही थी कि जो गांधी स्वयं अपनी पत्नी से पैर धुलवाते थे, वे स्त्री की आज़ादी या मुक्ति की बात कैसे कर सकते थे? लेकिन ऐसा करते हुए क्या हम स्वयं एक पत्नी को उसके पति की वैचारिक कसौटियों पर कसने की गलती नहीं करते?

दरअसल, महान सामाजिक प्रयोगों का हिस्सा रहने वाले गृहस्थों से हमारी एक अपेक्षा स्वतः ही हो जाती है. वह यह कि वे एक ‘आदर्श दंपति’ भी होंगे. लेकिन अपनी इस अपेक्षा में ‘आदर्श दाम्पत्य’ की परिभाषा भी हम ही तय करते हैं, भले ही वह कई बार अव्यवहारिक हो. आदर्श दाम्पत्य की इस परिभाषा में हम मानकर चलने लगते हैं कि पति-पत्नी के बीच हर प्रश्न को लेकर मतैक्य होगा. उनके बीच विचार और जीवन-शैली की एकरूपता होगी. उनकी धारणाएं और विश्वास-पद्धति एकसमान होंगी. लेकिन इन पंक्तियों को पढ़ रहे हमारे सामान्य गृहस्थ पाठक भी दाम्पत्य जीवन की असल व्यवहारिक उलझनों को बखूबी समझते होंगे.

इतना तो शायद हम सभी मानते होंगे कि सामान्य गृहस्थ जीवन में भी पति-पत्नी एक-दूसरे को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं. इसमें अलिखित और अप्रकट समझौतों और सामंजस्यों की प्रक्रिया सतत चलती रहती है. परिपक्व से परिपक्व दंपति भी इस प्रयोग का हिस्सा बनकर आजीवन सीखते और बदलते हैं. शुरू-शुरू में एक-दूसरे से सीखने और एक-दूसरे को बदलने के आग्रहपूर्ण प्रयास भी होते हैं. फिर पुराने कठोर आग्रह मंद पड़ते जाते हैं और उनके स्थान पर नए मृदु आग्रहों का सिलसिला चलता है. और इस सबके बीच परस्पर प्रेम, सम्मान और स्पेस की हमारी समझदारी बढ़ती जाती है. पारस्परिकता के बीच स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में स्थापित होने में लगने वाला यह समय छोटा भी हो सकता और लंबा भी.

कस्तूरबा में ज्यादा संकोच और दब्बूपना नहीं था. लड़कपन के इस वैवाहिक जीवन में दोनों खूब लड़ते थे. रूठने मनाने का सिलसिला भी चलता था  

और सार्वजनिक जीवन में जब कोई दंपति सामाजिक और आध्यात्मिक प्रयोगों का पारदर्शी तरीके से हिस्सा बनते हैं, तो उनकी स्थिति भी सामान्य गृहस्थों से अलग हो ऐसा नहीं होता. इसलिए किसी भी ऐतिहासिक शख्सियत के दाम्पत्य जीवन को स्त्री-विमर्श का आधार बनाते हुए हमें बहुत सावधानी की आवश्यकता भी होती है, अन्यथा हमारा निष्कर्ष ऐसे ही किसी सरलीकरण का शिकार हो जाएगा, जैसा प्रायः गांधीजी और कस्तूरबा के संबंधों में कई लोग करते पाए जाते हैं.

सहानुभूतिपूर्ण और ईमानदाराना नज़रिए से देखने पर कस्तूरबा और गांधीजी का जीवन एक सफल दाम्पत्य का अद्भुत नमूना बनकर सामने आता है. दोनों का जन्म एक ही वर्ष 1869 में हुआ और कस्तूरबा तो गांधीजी से छह महीने बड़ी ही थीं. सात साल की उमर में ही दोनों की सगाई हो गई. कस्तूरबा का परिवार अत्यंत पुराने विचारों वाला था, जिसमें लड़कियों को स्कूल जाने की मनाही थी. इसलिए वे पढ़-लिख नहीं पाईं. 13 साल की उम्र में कस्तूर और मोहन का विवाह हो गया. अंग्रेजी पढ़ने-लिखने वाले मोहन की पत्नी अनपढ़ हो, यह मोहन को अच्छा नहीं लगता, इसलिए उसने कस्तूर को पढ़ाने की भी कोशिश की. एक अच्छी बात थी कि दोनों हमउम्र थे और कस्तूरबा में ज्यादा संकोच और दब्बूपना नहीं था. लड़कपन के इस वैवाहिक जीवन में दोनों खूब लड़ते थे. रूठने मनाने का सिलसिला भी चलता था. उस समय के मोहन में पुरुषोचित हेकड़ी भी थी. लेकिन वह कस्तूर को चाहते भी बहुत थे.

फिर एक ऐसा समय भी आया जब मोहनदास बैरिस्टरी पढ़ने के लिए कस्तूर को छोड़कर विलायत रवाना हुए. कस्तूरबाई बहुत रोई थीं. और जब मोहनदास भारत वापस आए, तो उन पर अंग्रेजियत कुछ ज्यादा ही हावी हो चुकी थी. उन्होंने अब कस्तूरबा को गुजराती पढ़ने के बजाय अंग्रेजी सिखाने की ठानी. लिखने के लिए स्लेट और पढ़ने के लिए किताबें भी आ गईं. लेकिन तब तक कस्तूरबा घर-गृहस्थी के कार्यों में इतनी उलझ चुकी थीं कि उनके लिए यह सब व्यवहारिक नहीं लग रहा था.

इसी बात पर एक दिन मोहनदास और कस्तूरबा के बीच इतनी ठन गई कि आवेश में मोहनदास ने वह कह दिया जिसकी कस्तूरबा ने कभी कल्पना भी नहीं की थी- ‘तू तो एकदम बुद्धिहीन है. एक बात कहे देता हूं ऐसी अनपढ़ पत्नी से मेरा मेल नहीं बैठ सकेगा.’ अब जो जिसको जितना चाहता है उसकी कठोर बातों का दुःख भी उसे उतना ही होता है. आत्मसम्मानी कस्तूरबा ने भी कह दिया- ‘सुन लिया. यदि मुझसे मेल नहीं बैठ सकता, तो जाने दीजिए. संभालिये अपना घर-बार.’ कस्तूरबाई सचमुच अपने पीहर चली गई.

जिसका पति कमाऊ न हो, उस पत्नी के सम्मान को जो ठेस पहुंचती है उसका एहसास कस्तूरबा को जितना होता गया, वे उतनी ही भक्तिविह्वल होती गईं  

जल्दी ही मोहनदास को अपनी भूल और कस्तूरबाई की अहमियत का एहसास हुआ. कदम-कदम पर उनकी कमी खलने लगी. गृहस्थी तो पूरी तरह ठप्प हो गई. कस्तूर के एक-एक गुण याद आने लगे. अपनी कड़वी बात और ओछे व्यवहार को याद करते तो बहुत दुख और पश्चाताप होता, वे रुआंसे हो जाते. ससुराल में संदेश भिजवाया गया कि घर की मालकिन के बिना मोहनदास और उनकी गृहस्थी बेहाल हो गई है. कस्तूर भी रुक न सकीं. दोनों का क्षोभ कबका पिघल चुका था. इस घटना से मोहनदास को दाम्पत्य में परस्पर सम्मान की एक बड़ी सीख मिली. अब दोनों में आपसी नोंक-झोंक बहुत ही कम हो गयी थी. समय के उतार-चढ़ाव में मोहनदास को अपनी बैरिस्टरी का अहं भी नहीं रहा. लेकिन कठिन से कठिन परिस्थितियों में कस्तूरबाई ने जिस तरह उनका साथ दिया और उनका हौसला बढ़ाया, उसने मोहनदास की नज़र में कस्तूरबाई का एक नया ही रूप स्थापित होता गया.

जिसका पति कमाऊ न हो, उस पत्नी के सम्मान को जो ठेस पहुंचती है उसका एहसास कस्तूरबा को जितना होता गया, वे उतनी ही भक्तिविह्वल होती गईं. रोज सुबह-शाम तुलसी को जल चढ़ाकर उसकी प्रदक्षिणा करते हुए आंखों से आंसू गिरते रहते. शनिवार को हनुमान जी का व्रत और मंगलवार को गणेशजी का व्रत. एकादशी का व्रत अलग से. वे पूजाघर में बैठकर भगवान की मूर्ति के सामने उन्हें अपना दुख सुनाती, प्रार्थना करती. इसके बाद जब मोहनदास अफ्रीका गए तो कस्तूरबा को कुछ उम्मीद बंधी कि अब गृहस्थी फिर से पटरी पर आ जाएगी.

लेकिन जब वे जहाज पर सवार होकर अफ्रीका चलीं तो भीतर ही भीतर एकदम घबरा रही थी कि यदि वहां कोई अपनी भाषा समझने वाला न मिला तो क्या होगा. इधर मोहनदास पर यह धुन सवार हो गई थी कि वे अपने बच्चों को बिल्कुल अंग्रेजीदां बनाएंगे. बूट, मोजे, कांटे और चम्मच, पारसी रंग-ढंग के कपड़े. यह सब कस्तूरबाई के लिए भी एक नई मुसीबत बनकर आया. लेकिन अब वह तुरंत प्रतिकार करने के बजाए हां में हां मिलाने की सहनशीलता पर उतर आई थीं. क्योंकि अंग्रेज सरकार से राजनीतिक तौर पर उलझ चुके मोहनदास यदि अपने घर के भीतर अपने मन के विरुद्ध कुछ भी होता देखते, तो गुस्से से लाल हो जाते थे. वे चाहते थे कि जो भी प्रयोग वे अपने जीवन के स्तर पर शुरू कर चुके थे, उसमें उनकी पत्नी और बच्चे पूरी तरह बिना कोई सवाल पूछे ही साथ दें. ध्यान रहे कि मोहनदास ने तब तक महात्मा बनने की राह पर पूरी तरह बढ़ना शुरू नहीं किया था.

अफ्रीका में गांधीजी पर होने वाले हिंसक हमलों और कानूनी मुकदमों के दौरान अकेली पड़ गई कस्तूरबा बार-बार ईश्वर की शरण में जातीं कि हे भगवान, इन्हें किसी तरह बचा ले. और जब अफ्रीका में गांधीजी को अपने सत्याग्रहों में सफलता मिलनी शुरू हुई, उनकी विशेष पहचान बन गई, कीर्ति और कर्मठता बढ़ती गई, तो कस्तूरबा यही समझतीं कि उनकी मन्नतें देवताओं ने मान ली है. लेकिन तभी एक दिन कुछ ऐसा हुआ जिसका वर्णन गांधीजी ने भी अपनी आत्मकथा में बहुत मार्मिक ढंग से किया है. इस घटना से ज्यादातर पाठक वाकिफ होंगे जब डरबन में किसी और के पेशाब के बरतन को बेमन से उठाने की बात पर गांधीजी कस्तूरबा का हाथ पकड़कर घर के दरवाजे तक खींचकर ले गए थे और घर से निकल जाने को कहा था. और कस्तूरबा के इस जवाब से गांधीजी बहुत ही शर्मिंदा हुए थे कि ‘यहां मेरे मां-बाप नहीं हैं कि उनके घर चली जाऊं. तुम्हारी पत्नी हूं, इसलिए मुझे तुम्हारी डांट-फटकार सहनी ही होगी.’

अपनी तमाम कमजोरियों के साथ मोहनदास के महात्मा बनने की यात्रा को यदि किसी ने सबसे करीब से देखा, तो वह निस्संदेह कस्तूरबा ही थीं, जो परछाई की तरह हमेशा उनके साथ रहीं  

महात्मा गांधी ने बड़ी साफगोई से अपने उस समय के व्यवहार के बारे में लिखा है- ‘मैं तो जितना प्रेमी उतना ही क्रूर पति था. मैं अपने को उसका शिक्षक भी मानता था, इस कारण अपने अंधे प्रेम के वश होकर उसे खूब सताता था. ...यह वह समय था जब मुझे इसका स्पष्ट भान न था कि पत्नी केवल सहधर्मिणी, सहचारिणी और सुख-दुःख की साथिन है. बल्कि मैं यह मानकर चलता था कि पत्नी विषय-भोग का भाजन है और पति की कैसी भी आज्ञा क्यों न हो, उसका पालन करने के लिए वह सिरजी गई है.’

इस घटना के आस-पास अन्य घटनाएं भी हुई जिससे कस्तूरबा के प्रति गांधीजी के व्यवहार में बड़े परिवर्तन हुए. जैसे विवाह के पंजीकरण संबंधी कानून और ऐसे ही अन्य कानूनों के विरोध में जब कस्तूरबा स्वयं सत्याग्रह के लिए तैयार हो गईं और उनके साथ सैकड़ों महिलाएं जेल गईं, तो गांधीजी को कस्तूरबा के साथ-साथ भारत की सभी महिलाओं की एक अलग प्रकार की शक्ति का एहसास हुआ. कस्तूरबा की असल शक्ति उनकी श्रद्धा थी, उनका मातृत्व था, त्याग और समर्पण के बावजूद कायम रहनेवाला उनका आत्मसम्मान था.

बाद में गांधीजी ने लिखा- ‘आज मैं मोहांध पति नहीं हूं. शिक्षक नहीं हूं. कस्तूरबाई चाहे तो आज मुझे धमका सकती है. आज हम परखे हुए मित्र हैं, एक-दूसरे के प्रति निर्विकार बनकर रहते हैं. ...जैसे-जैसे मैं निर्विकार बनता गया, वैसे-वैसे मेरी गृहस्थी शांत, निर्मल और सुखी होती गई है और आज भी होती जा रही है.’

अपनी तमाम कमजोरियों के साथ मोहनदास के महात्मा बनने की यात्रा को यदि किसी ने सबसे करीब से देखा, तो वह निस्संदेह कस्तूरबा ही थीं, जो परछाई की तरह हमेशा उनके साथ रहीं. चाहे वह संपत्ति का पूर्णतः त्याग करनेवाली बात हो, या ब्रह्मचर्य का एकतरफा व्रत लेने की बात, कस्तूरबा ने कभी मित्रवत मीठे उलाहने के साथ, तो कभी पूरी श्रद्धा के साथ गांधीजी का साथ दिया. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि वह कस्तूरबा से अपनी सारी बात आंख मूंदकर मनवा सके. कस्तूरबा के व्यक्तित्व का एक ऐसा कोना हमेशा कायम रहा, जो स्वायत्त रहा. वह गांधीजी के प्रयोगों को भी पहले स्वयं समझकर और जहां तक संभव हो उसे परखकर फिर अपनाना चाहती थीं. और फिर जितनी तेजी से गांधीजी अपने आपको बदल रहे थे, उस गति से कस्तूरबा भी अपने आप को बदलती जातीं यह अपेक्षा भी अव्यावहारिक ही थी.

आश्रम जीवन अपनाने के बाद गांधीजी कस्तूरबाई को ‘बा’ यानी मां कहने लगे थे और कस्तूरबाई भी उन्हें ‘बापू’ कहने लगी थीं. बा ने धीरे-धीरे गांधीजी के नज़रिए से ही जीवन और समाज को देखना शुरू कर दिया था  

मसलन कस्तूरबा ने गहनों का त्याग भले ही कर दिया था, लेकिन गांधीजी चाहते थे कस्तूरबा अपनी लाल कांच की चूड़ियों का भी त्याग करें. अब एक निहायत धार्मिक और पारंपरिक संस्कारों में रची-बसीं कस्तूरबा के लिए ऐसा करना बहुत ही मुश्किल था. क्योंकि एक पत्नी के तौर पर वे इसे अपने सुहाग से जोड़कर देखती थीं और गांधीजी का जीवन उन्हें अपनी संतानों से भी ज्यादा प्रिय था. इसलिए यह बात गांधीजी उनसे अंत समय तक नहीं मनवा सके. यहां तक कि जब गांधीजी के आग्रह पर जमनालाल बजाज की पत्नी जानकीदेवी ने भी चूड़ियां पहननी छोड़ दी, इस पर गांधीजी ने बा को चिढ़ाते हुए जानकीदेवी से कहा था- ‘देखो न, मुझमें तुम्हारी आस्था बा से भी अधिक है’. इस पर कस्तूरबा ने कहा- ‘आप मुझे कितना भी चिढ़ाइये, जब तक प्राण रहेंगे, मैं इन्हें नहीं निकालूंगी’. बापू ने हंसते हुए कहा- ‘इस बूढ़ी का चूड़ियों में कितना मन है.’

ऐसी ही एक घटना जगन्नाथपुरी की यात्रा के दौरान हुई. गांधीजी तो वहां जन-जागरण के कार्य से गए थे और वह मंदिर में दर्शन के खिलाफ थे, क्योंकि पुरी के मंदिर में तब हरिजनों का प्रवेश वर्जित था. लेकिन कस्तूरबा से रहा न गया. उन्होंने सोचा कि फिर कभी भगवान जगन्नाथ के मंदिर का दर्शन करने का अवसर मिले न मिले. संभवतः समुद्र स्नान के बहाने महादेव देसाई की जानकारी में उनकी पत्नी दुर्गाबेन के साथ कस्तूरबा मंदिर में चली ही गईं. गांधीजी से यह बात छिपी न रही और उन्हें बहुत ही क्षोभ हुआ. शाम की प्रार्थना के बाद इस बात पर महादेव भाई को डांट भी पड़ी और इस पर ‘हरिजन’ में गांधीजी ने लेख लिखकर भी अपना असंतोष जाहिर किया था.

आश्रम जीवन अपनाने के बाद गांधीजी कस्तूरबाई को ‘बा’ यानी मां कहने लगे थे और कस्तूरबाई भी उन्हें ‘बापू’ कहने लगी थीं. बा ने धीरे-धीरे गांधीजी के नज़रिए से ही जीवन और समाज को देखना शुरू कर दिया था. आश्रम में एक हरिजन परिवार को रखने के बाद जो अफरा-तफरी मची थी, उसमें भी बा ने गांधीजी की भावना को आत्मसात करने में देरी न की. आश्रम में हर व्यक्ति द्वारा साफ-सफाई की बात पर गांधीजी की सगी बहन रलियातबेन तक आश्रम छोड़कर चली गई थीं. फिर भी आश्रम जीवन की बारीकियों में एक बार कस्तूरबा से हल्की सी सैद्धांतिक चूक हुई और अनुशासनप्रिय गांधीजी ने इसे भी अनदेखा नहीं किया.

एक दिन शाम की प्रार्थना के बाद बापू ने बड़ी गंभीरता से सभा में कहा- ‘बा ने आश्रम के लिए प्राप्त धनराशि जो बारह रुपये थी, आश्रम में जमा न कराते हुए स्वयं ही खर्च कर दी. इस तरह उन्होंने अस्तेय व्रत को भंग किया है.’ सीधे शब्दों में कहा जाए तो उनके कहने का आशय था कि बा ने एक प्रकार से चोरी की है. प्रार्थना में मौजूद सौ से अधिक लोगों में किसी को भी बापू का यह व्यवहार अच्छा नहीं लगा, क्योंकि बा ने वह पैसे आश्रम के लिए ही खर्च किए थे. लेकिन कस्तूरबा कुछ नहीं बोलीं. एकदम शांत रहीं. लेकिन बंबई से आईं एक महिला को इस बात से इतना दुःख हुआ कि उन्होंने कस्तूरबा को चिट्ठी में लिखा- ‘मुझे आपसे सहानुभूति है. सत्य-अहिंसा के गीत गानेवाले बापू का आपके बारे में ऐसा बोलना ठीक नहीं था. उन्होंने जीवन भर आपको बहुत कष्ट दिया है. खाने-पीने और कपड़े-लत्ते जैसी साधारण बातों के लिए भी इतनी सख्ती?’ इस पर कस्तूरबा ने जवाब में लिखा- ‘मुझसे भूल हुई और उन्होंने उसे बता दिया तो इसमें विशेष बात क्या हुई. हमारी गृहस्थी कुछ ऐसी ही है कि जो कुछ होता है, वह दस आदमियों के सामने ही होता है. क्या हर घर में ऐसा नहीं होता?’

कस्तूरबा के सान्निध्य में आने वाले हर किसी ने उनकी मातृत्व भावना की चर्चा की है. चाहे वह मीराबहन हों, प्रभावती हों या सुशीला नैयर. उनकी अपनी संतानें और विस्तृत कुल-कुटुंब भी उनसे हमेशा ही जुड़े रहे  

अफ्रीका से लेकर चम्पारण तक और फिर भारत छोड़ो आंदोलन तक में महिलाओं तक पहुंचने और उन्हें आंदोलन से जोड़ने में कस्तूरबा की एक स्वायत्त और अहम भूमिका भी रही. चम्पारण में तो महिलाओं की स्थिति शायद गांधीजी पूरी तरह समझ भी नहीं पाते यदि कस्तूरबा साथ न होतीं. क्योंकि किसी तरह महिलाओं की झोपड़ियों में प्रवेश करके ही बा की मुलाकात असली दरिद्रता से हो पाई. यहां उन्होंने देखा कि झोपड़ी में महिलाएं तो तीन-चार होती हैं, लेकिन साड़ी उनके पास एक ही होती है और वह भी आधा शरीर ढंकने जितना ही. इसके बाद तो जब तक कस्तूरबा जीवित रहीं, उनका चरखा चलाना नहीं छूटा. अपनी अंतिम संपत्ति के रूप में बची एक जोड़ी खादी साड़ी में से एक साड़ी उन्होंने मनु को दी और दूसरी आश्रम में आए हरिजन परिवार की बेटी लक्ष्मी को.

कस्तूरबा के सान्निध्य में आने वाले हर किसी ने उनकी मातृत्व भावना की चर्चा की है. चाहे वह मीराबहन हों, प्रभावती हों या सुशीला नैयर. उनकी अपनी संतानें और विस्तृत कुल-कुटुंब भी उनसे हमेशा ही जुड़े रहे. मानसिक स्थिति बिगड़ने के बाद भी हरिलाल का स्नेह अपनी मां के लिए बराबर बना रहा. एक बार तो मध्य प्रदेश के कटनी रेलवे स्टेशन पर रेलगाड़ी की खिड़की के सामने ‘महात्मा गांधी की जय’ की जगह ‘कस्तूरबा गांधी की जय’ का नारा लगाते हुए वे अचानक प्रकट हो गए. कहीं से भीख मांगकर वे कस्तूरबा के लिए एक मोसम्बी लाए और उनकी जिद थी कि यह कस्तूरबा ही खाएं, बापू नहीं. बापू से उन्होंने इतना ही कहा कि बा के प्रताप से ही आप इतने बड़े बने हैं.

कस्तूरबा ने अपने निधन से कुछ दिनों पूर्व ही आत्मप्रेरणा से अंग्रेजी सीखने का अभ्यास शुरू किया था. 22 फरवरी, 1944 का दिन महाशिवरात्रि का दिन था. शाम 7 बजकर 35 मिनट पर जब मंदिरों में आरती हो रही थी, उसी समय आगा खां पैलेस में नजरबंद गांधीजी की गोद में ही कस्तूरबा ने अंतिम सांसें लीं. अपने पति के माध्यम से राष्ट्र को समर्पित एक श्रद्धालु वृद्धा का इससे सुंदर निधन भला और क्या हो सकता था?

कस्तूरबा को श्रद्धांजलि में एक बार गांधीजी ने कहा था- ‘अगर बा का साथ न होता तो मैं इतना ऊंचा उठ ही नहीं सकता था. यह बा ही थीं, जिसने मेरा पूरा साथ दिया...’ 

महात्मा गांधी पर किताब लिखनेवाले ब्रिटिश लेखक होरेस अलेक्ज़ेंडर को कुछ पश्चिमी लेखकों की किताबें पढ़कर लगा कि गांधीजी और कस्तूरबा के बीच संबंध अच्छे नहीं रहते हैं और उनके बीच मतैक्य भी नहीं रहता. उन्होंने 1929 में गांधीजी को पत्र लिखकर पूछा कि क्या यह बात सच है. इसके जवाब में 7 मार्च, 1929 को गांधीजी ने अपने पत्र में लिखा - ‘अपनी पत्नी के बारे में लिखी गई बातों को मैंने नहीं देखा है. लेकिन आपको बतला सकता हूं कि हम दोनों के बीच अत्यंत प्रेमपूर्ण संबंध है. यदि उन पुस्तकों से आपको ऐसा लगा हो कि मेरी पत्नी बुद्धिपूर्वक मेरा अनुसरण नहीं करती है, तो यह बिल्कुल सच है. उसकी निष्ठा अद्भुत है और मेरे जीवन में जो भी परिवर्तन हुए हैं उन सबमें उसने मेरा साथ दिया है. मेरा अपना दृढ़ विश्वास है कि भारतीय पुरुष भारतीय स्त्रियों के लिए जो आदर-भाव रखते हैं, वह पश्चिम में पुरुषों द्वारा स्त्रियों के प्रति महसूस किए जानेवाले आदर-भाव के बराबर ही है. लेकिन जरा भिन्न ढंग का है...’

‘...महिलाओं के प्रति सम्मान दिखाने के लिए पश्चिम में प्रचलित कई तरीके मुझे अत्यंत कृत्रिम मालूम होते हैं और कभी-कभी तो पाखंडपूर्ण भी. फिर भी हम अपनी स्त्रियों के साथ जैसा व्यवहार करते हैं उसमें बहुत कुछ आलोचना योग्य है. कुछ पति राक्षस होते हैं. कुछ माता-पिता अपनी लड़कियों के प्रति एकदम निष्ठुर होते हैं. इन मामलों में आपसी समझदारी के लिए मेरी राय में सहिष्णुता ही कुंजी है. ...मैं जानता हूं कि आप इस अनुच्छेद का अर्थ यह नहीं लगाएंगे कि मैं अपने यहां के पुरुषों द्वारा स्त्रियों के साथ किए जाने वाले उस व्यवहार का बचाव कर रहा हूं जो कि न्याय के स्तर से बहुत नीचा पड़ता है.’

इसलिए आगे से जब भी हम गांधीजी और कस्तूरबा के बहाने से स्त्री-विमर्श के निष्कर्ष सिद्ध करने की जल्दी में हों, तो थोड़ा रुककर स्वयं महात्मा गांधी द्वारा अपनी आत्मकथा में लिखे इस विचार को अवश्य पढ़ लें- ‘...कोई यह न समझ ले कि हम दोनों आदर्श पति-पत्नी हैं, या मेरी पत्नी में कोई दोष ही नहीं है या कि अब तो हमारे आदर्श एक ही हैं. कस्तूरबाई के अपने कोई स्वतंत्र आदर्श हैं या नहीं, सो वह बेचारी खुद भी नहीं जानती होगी. संभव है कि मेरे बहुतेरे आचरण उसे आज भी अच्छे न लगते हों. इस संबंध में हम कभी चर्चा नहीं करते, करने में कोई सार भी नहीं है. उसे न तो उसके माता-पिता ने शिक्षा दी और न जब समय था तब मैं दे सका. पर उसमें एक गुण बहुत ही बड़ी मात्रा में है, जो दूसरी बहुत सी हिन्दू स्त्रियों में कमोबेश मात्रा में रहता है. इच्छा से हो चाहे अनिच्छा से, ज्ञान से हो चाहे अज्ञान से, उसने मेरे पीछे-पीछे चलने में अपने जीवन की सार्थकता समझी है और स्वच्छ जीवन बिताने के मेरे प्रयत्न में मुझे कभी रोका नहीं है. इस कारण यद्यपि हमारी बुद्धि-शक्ति में बहुत अंतर है, फिर भी मैंने अनुभव किया है कि हमारा जीवन संतोषी, सुखी और उर्ध्वगामी है.’

कस्तूरबा को श्रद्धांजलि में एक बार गांधीजी ने कहा था- ‘अगर बा का साथ न होता तो मैं इतना ऊंचा उठ ही नहीं सकता था. यह बा ही थीं, जिसने मेरा पूरा साथ दिया. नहीं तो भगवान जाने क्या होता? मेरी पत्नी मेरे अंतर को जिस प्रकार हिलाती थी उस प्रकार दुनिया की कोई स्त्री नहीं हिला सकती. वह मेरा अनमोल रत्न थी.’