1990 का दशक वह दौर था जब भारत के मोटरसाइकिल बाजार पर बुलेट, राजदूत और यजदी जैसे नामों की धाक थी. चलाने में ये मोटरसाइकिलें जितनी बिगड़ैल और असुविधाजनक होती थीं उतना ही ज्यादा खर्च इनके रखरखाव यानी मेंटेनेंस में लगता था. ऐसे में कुछ साल पहले (1984) अस्तित्व में आयी हीरो-होंडा बाजार में इन प्रतिद्वंदियों के बीच अपने लिए जगह तलाश रही थी. गहराई तक जमी कंपनियों के सामने उसकी डगर आसान नहीं थी लेकिन अपनी अलग रणनीति के चलते यह कंपनी जल्द ही भारतीय उपभोक्ताओं के दिलों में जगह बनाने में सफल रही.

हीरो-होंडा ने शुरुआत से ही मध्यम वर्ग की जरूरतों को अपनी प्राथमिकता पर रखा था. कंपनी की सबसे पहली बाइक सीडी 100 में यह बात साफ दिखती थी. इसी सिलसिले को जारी रखते हुए कंपनी ने 1994 में साधारण लुक्स और हल्के वजन वाली स्पलेंडर को भारत के बाजार में उतारा. इस बाइक के लॉन्च ने सिर्फ हीरो-होंडा बल्कि भारत के लाखों मिडिल क्लास परिवारों के सपनों को भी पहिए लगा दिए थे.

स्पलेंडर से पहले देश के एक बड़े वर्ग के लिए मोटरसाइकिल मेंटेन करना एक ख्वाब जैसा था. लेकिन औसत बजट में उपलब्ध स्पलेंडर ने लाखों लोगों का यह अरमान पूरा कर दिया. साथ ही कम खर्चीला रखरखाव और बेहतरीन माइलेज जैसी इसकी खूबियां उनके लिए मानो सोने पर सुहागा साबित हुईं.

असाधारण सफलता

हीरो होंडा की इस नई मोटर साइकिल ने ऐसी रफ्तार पकड़ी कि इसने बाजार में पहले से मौजूद दूसरी कंपनियों की नींद उड़ाकर रख दी. बिक्री न होने के कारण उन्हें अपनी कई मोटरसाइकिलों का उत्पादन तक रोकना पड़ गया. स्पलेंडर के बाद अलग-अलग कंपनियों ने इस सेगमेंट में दसियों गाड़ियों को लॉन्च किया लेकिन उनमें से कोई भी इसके इर्द-गिर्द भी नहीं फटक पायी. 2000, 2001 और 2002 यानी लगातार तीन सालों तक इस मोटरसाइकिल ने न सिर्फ भारत बल्कि पूरे विश्व में सर्वाधिक बिकने वाली मोटरसाइकिल का रिकॉर्ड अपने नाम किया.

बाजार में उतरने के 10 साल के भीतर ही हर साल स्पलेंडर की 50 लाख यूनिट का उत्पादन किया जाने लगा था. इसका शानदार प्रदर्शन यहीं नहीं रुका. 2009 में इस बाइक के उत्पादन ने प्रतिवर्ष एक करोड़ 10 लाख यूनिट का आंकड़ा पार कर लिया. एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर 30 सेकेंड के भीतर एक स्पलेंडर खरीदी जाती है.

ये सारे आंकड़े स्पलेंडर के ग्राहकों और हीरो-होंडा (वर्तमान में हीरो मोटोकॉर्प) के लिए फख्र की बात हैं. लेकिन, इन आंकड़ों के अलावा एक आंकड़ा ऐसा भी है जो स्पलेंडर रखने और इसे खरीदने की सोचने वालों, दोनों के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है.

चोरों की भी पसंदीदा बाइक

खबरों पर नज़र डालें तो हर साल चोरी होने वाली बाइकों में स्पलेंडर की संख्या सर्वाधिक होती है. मोटरसाइकिलों की चोरियों को लेकर दर्ज हुई रिपोर्टों के मुताबिक चोरी होने में स्पलेंडर का अनुपात लगभग वही है जिस अनुपात में उसकी बिक्री होती है. लेकिन, दूसरी गाड़ियों के साथ ऐसा नहीं होता.

इससे जेहन में यह सवाल कौंधता है, ‘आखिर क्यों इसी मोटरसाइकिल के मालिक को सबसे ज्यादा चौकन्ना रहने की जरूरत है और क्यों इसी मोटरसाइकिल पर उठाईगीरों की सबसे ज्यादा नज़र रहती है?’

इस सवाल के जवाब की तलाश में हमने कुछ पुलिस थानों से लेकर हीरो मोटोकॉर्प के शोरूमों और बाजार के तमाम मिस्त्रियों की दुकानों की खाक छानी. इसके बाद हमारे सामने इस मोटरसाइकिल के चोरी होने की कुछ दिलचस्प वजहें सामनें आईं.

पार्ट्स की बड़ी मांग

स्पलेंडर की सबसे ज्यादा चोरी को लेकर कई लोगों की एक सीधी दलील है. उनके मुताबिक जाहिर सी बात है कि जो बाइक बाजार में सबसे ज्यादा उपलब्ध होगी सबसे ज्यादा चुराया भी उसी को जाएगा. कुछ हद तक यह तर्क ठीक भी है. लेकिन यदि किसी वाहन की सर्वाधिक उपलब्धता ही उसकी चोरी की एकमात्र वजह समझी जाए तो कुछ ऐसा ही आंकड़ा हमें दूसरी मोटरसाइकिलों और चौपहिया वाहनों की तरफ देखने पर भी नज़र आना चाहिए. लेकिन ऐसा नहीं होता, बाजार में जिन दूसरी बाइक या कारों को सबसे ज्यादा देखा जा सकता है, वे कभी-कभी वाहन चोरों की लिस्ट में दूर तक नहीं होती हैं.

तब अलग-अलग लोगों से बात करने पर सामने आया कि बाजार में स्पलेंडर की सर्वाधिक संख्या ही इसकी चोरी की प्रमुख वजहों में से एक है. लेकिन यहां संख्या के मायने सिर्फ उपलब्धता से आगे जाते हैं.

स्पलेंडर की विशेषताओं पर सरसरी नज़र डालने पर पता चलता है कि 97.2 सीसी क्षमता के इंजन के साथ हल्के वजन की यह मोटरसाइकिल 80 किमी/ली का जबरदस्त माइलेज देती है. यह गाड़ी भारत के उस वर्ग के लिए सर्वश्रेष्ठ साबित होती है जो अर्थव्यवस्था में बीच के पायदान पर है और संख्या में सबसे ज्यादा है. अमूमन मध्यमवर्गीय परिवारों में घर के हर एक सदस्य के पास निजी वाहन होना थोड़ा मुश्किल होता है. मतलब पूरे परिवार के बीच एक या दो वाहन ही खरीदे जाते हैं. यही वह वर्ग है जो नौकरीपेशा होने के साथ-साथ लघु व्यवसायों से सबसे ज्यादा जुड़ा होता है. यानी सड़कों पर सबसे ज्यादा दौड़-भाग करने वाला यही वर्ग है. जानकारों के मुताबिक जब ऐसे परिवारों में एक से ज्यादा सदस्यों के बीच कोई गाड़ी होगी तो निश्चित तौर पर उसके चलने की संभावना भी सर्वाधिक होगी और जो वाहन जितना ज्यादा चलेगा उसमें टूट-फूट के साथ उसके पार्ट्स के घिसने की संभावना भी सबसे ज्यादा होगी. ऐसे में स्पलेंडर के पार्ट्स की खपत सबसे ज्यादा होने के कारण बाजार में उनकी मांग सबसे ज्यादा होती है.

पार्ट्स की यही खपत स्पलेंडर की चोरी की प्रमुख वजहों में से एक है. जानकारों के मुताबिक आमतौर पर जो अन्य बाइक संख्या में ज्यादा हैं उनमें से कई इस तरह से डिजाइन की गयी हैं कि उन्हें बहुत संभाल कर उपयोग में लाया जाता है. ऐसे में उनकी टूट-फूट की संभावना तुलनात्मक तौर पर बहुत कम हो जाती है. इनके अलावा वे बाइकें जिन्हें स्पलेंडर की तरह रफ इस्तेमाल में लिया जाता है, उनकी संख्या कम होने के कारण बाजार में उनके पार्ट्स की बड़ी मांग नहीं आती. तो सिर्फ उनके पार्ट्स के लिए चोरी का खतरा मोल लेने से कोई भी आम चोर बचता है.

स्पलेंडर के मॉडल की खासियत यह भी है कि यह इस तरह डिजाइन की जाती है कि इसके पार्ट्स को इसी सेगमेंट में उपलब्ध हीरो की दूसरी मोटरसाइकिलों, (जिन्होंने बाजार का एक बड़ा हिस्सा घेर रखा है) जैसे पैशन, सीडी डीलक्स, सुपर स्पलेंडर आदि में से किसी भी बाइक में बखूबी फिट किया जा सकता है. ऐसे में सिर्फ एक स्पलेंडर की चोरी कर इतनी बाइकों के पार्ट्स की खपत आसानी से हो जाती है. यही कारण है कि इस बाइक पर चोरों की सबसे ज्यादा नजर रहती है.

एक जानकारी के मुताबिक यदि अलग से सिर्फ स्पलेंडर का इंजन असेंबल किया जाए तो उसका खर्च 30 से 40 हजार के बीच आता है. और पूरी बाइक को जोड़ कर बनाने की कोशिश की जाए तो यही खर्च 70 से 80 हजार के बीच बैठता है. जबकि कंपनी ने नई बाइक (स्पलेंडर प्लस) की कीमत 50 हजार रू. तय कर रखी है. यानि अलग से पार्ट खरीदें जाएं तो वे मूल बाइक से काफी महंगे पड़ते हैं. ऐसे में चोर चोरी करने के बाद कबाड़ वालों से मिलकर मोटरसाइकिल के हर एक पुर्जे को खुलवा देते हैं. इन पार्ट्स पर कोई खास पहचान (जैसे चेसिस नंबर) नहीं होने के कारण पकड़े जाने का भी खतरा कम रहता है. फिर पार्टस की थोड़ी बहुत सफाई और मरम्मत कर उन्हें फिर से बेचने के लिए तैयार कर लिया जाता है.

सिर्फ इंजन की बात की जाए तो इसमें- गीयर ट्रांसमिशन बॉक्स, क्रेंक शाफ्ट, सिलेंडर किट और हैड सिलेंडर जैसे अन्य भाग खासे दामों में बिकते हैं. इसके अलावा गाड़ी के अन्य बॉडी पार्ट्स जैसे पैट्रोल टैंक, पहिए, शॉकर्स, बैटरी आदि को बेचकर भी मोटी कमाई की जाती है. ऐसे में कहा जा सकता है कि बाजार में स्पलेंडर के पुर्जों की सर्वाधिक खपत उसकी चोरी की प्रमुख वजह है. यानी संभावना बनती है कि कभी आपने अपनी स्पलेंडर में कोई पार्ट अलग से डलवाया है तो सकता है कि वह चोरी का हो.

इंजन का सबमर्सिबल पंप में इस्तेमाल

स्पलेंडर के चोरी के पीछे जो दूसरी वजह सामने आई वह और ज्यादा चौंकाने वाली है. लोगों द्वारा स्पलेंडर को चाहने की खास वजह इस गाड़ी का मजबूत, दमदार और टिकाऊ इंजन है. लेकिन यही इंजन इस गाड़ी के चोरी के प्रमुख कारणों में से एक है.

देश के जिन भागों में जलस्तर ऊंचा है या फिर जिन क्षेत्रों में पारंपरिक तरीकों जैसे तालाबों, कुंओं आदि से खेतों में सिंचाई की जाती है (जैसे उत्तर प्रदेश या हरियाणा के कई हिस्से) वहां पंप के साथ मोटर की तरह जोड़ने के लिए स्पलेंडर के इंजन की खासी मांग रहती है. ऐसे में दूसरे राज्यों (जैसे राजस्थान) में चोरी हुई गाड़ियों के अन्य भाग तो वहीं खपा दिए जाते हैं लेकिन बड़ी संख्या में उनके इंजनों को इन राज्यों तक चोरी-छिपे पहुंचाया जाता है. यहां आने के बाद इस काम में माहिर मिस्त्री अपनी कारीगरी दिखाकर इन्हें पंप के साथ इस्तेमाल की जाने वाली मोटर में बदल देते हैं और एक जुगाडु सबमर्सिबल-पंप बनकर तैयार हो जाता है.

इस तरह से बनता है इंजन से सबमर्सिबल पंप

स्पलेंडर के इंजन की बनावट कुछ इस तरह की होती है कि यह बाजार में उपलब्ध कई पंपों के साथ फांउडेशन बेस पर ऐसे बैठ जाता है मानो उसी के लिए बना था.

इसके लिए बाइक से इंजन को किक और कार्ब्यूरेटर समेत निकाल लिया जाता है और इसे लोहे और लकड़ी के एक फाउंडेशन पर सीधा (खड़ा) कसा जाता है. ईंधन की सप्लाई के लिए इंजन के साथ अलग से एक टंकी फिट की जाती है जिसकी क्षमता को जरूरत और संतुलन के हिसाब से बदला जा सकता है. आमतौर पर यह टंकी तीन लीटर क्षमता की होती है. यह टंकी अंदर से दो हिस्सों में बंटी होती है जिनमें 1:5 के अनुपात में पेट्रोल और केरोसिन रखा जाता है. तीन लीटर के हिसाब से बात की जाए तो इस टंकी में 500 मिली पेट्रोल और 2.5 लीटर केरोसिन भरते हैं. टंकी के दोनों भागों के नीचे अलग-अलग दो टैब लगाए जाते हैं ताकि एक तरह के ईंधन की सप्लाई के समय दूसरे की आपूर्ति बंद की जा सके.

इंजन और पंप पर टंकी फिट करने का काम
इंजन और पंप पर टंकी फिट करने का काम

उसके बाद इसी फांउडेशन पर पंप को कसा जाता है. इंजन का साइड केस/कवर खोलकर उसके काउंटर शाफ्ट (वह हिस्सा जहां से पिछले पहिए को घुमाने के लिए पॉवर जेनरेट की जाती है) से उचित आकार की एक मूविंग रॉड जोड़ी जाती है. वाटर पंप को उसकी डिजाइन और क्षमता के आधार पर इस रॉड से आमतौर पर दो तरीकों से जोड़ा जाता है. एक तो पंप के शाफ्ट और रॉड पर कपलिंग शाफ्ट्स (आपस में जोड़ने वाले रिंगनुमा पुर्जे) लगाकर और दूसरे, इस रॉडनुमा शाफ्ट और पंप शाफ्ट पर पुली (बेल्ट) चढ़ाकर.

जब पंप और इंजन आपस में जुड़ जाते हैं तो इंजन को चालू किया जाता है. यदि इंजन पुराने मॉडल की बाइक का है तो इसे किक से चलाया जाता है और इंजन नयी बाइक का है तो इसे सेल्फ बटन से. इस तरह का काम करने वाले तकनीकी तौर पर इतना पारंगत हो जाते हैं कि थोड़ी ज्यादा कीमत मिलने पर पुराने इंजन में ही किक की जगह सेल्फ बटन का विकल्प तैयार कर देते हैं.

इंजन को चलाते समय केरोसिन वाला टैब बंद रखा जाता है और पेट्रोल का उपयोग किया जाता है ताकि इग्निशन के समय कार्बोरेटर कोई रुकावट पैदा न करे. एक बार जब इंजन चालू हो जाता है उसके बाद लगभग 30 सेकेंड तक पेट्रोल की सप्लाई दी जाती है. जब इंजन ढंग से चल जाता है तो पेट्रोल के टैब को बंद कर कैरोसिन की आपूर्ति को शुरू कर दिया जाता है. तीन लीटर ईंधन की क्षमता वाले इस जुगाड़ पंप से लगभग तीन घंटों तक पानी की सप्लाई की जा सकती है.

कम लागत

बाजार में उपलब्ध आम डीज़ल इंजन जितनी सिंचाई के लिए 100 रूपए का ईंधन फूंकता है उतनी ही सिंचाई इस जुगाड़ इंजन से सिर्फ 50 रूपए में की जा सकती है, यानी ठीक आधे में. उसके अलावा बाजार में उपलब्ध अलग-अलग कंपनियों के डीजल इंजनों की कीमत 10 से 25 हजार के बीच में होती है जबकि 8000 आरपीएम पर 7.4 बीएचपी से ज्यादा पॉवर जनरेट करने वाले चोरी के ये इंजन मात्र चार से 10 हजार रू में बन जाते हैं. इस तरह से यह देसी सबमर्सिबल-पंप, चोर और इसके खरीददारों के लिए हर तरह से उपयुक्त होता है.

कंक्रीट वाइब्रेटर में भी इस्तेमाल

सबमर्सिबल पंप की तरह स्पलेंडर के इंजन के काउंटर शाफ्ट के साथ मूविंग रॉड की जगह वाइब्रेटिंग स्प्रिंग जोड़कर कंक्रीट वाइब्रेटर (छतों व सड़कों पर कंक्रीट बिछाने के लिए उपयोग में आने वाला उपकरण) भी बनाए जाते हैं. बाजार में उपलब्ध वाइब्रेटर की तुलना में यह जुगाड़ भी आनुपातिक तौर पर लगभग उतना ही सस्ता बनकर तैयार हो जाता है जितना कि सबमर्सिबल पंप.

किसी मोटरसाइकिल का इंजन इस तरह से इस्तेमाल होने पर जब हमने आश्चर्य व्यक्त किया तो एक मिस्त्री का कहना था, ‘भाईसाहब यह तो कुछ नहीं है. अगर आप उन्हें थोड़े पैसे और देंगे तो वे दो इंजनों से जुगाड़ कर आपके लिए सिंगल सीटर हैलीकॉप्टर भी बना देंगे. फिर मजे से घूमना उसमें.’