शिवानी शाह पिछले साल अपनी बेटी के जन्मदिन पर इस बात से बहुत खुश थीं कि वे दुबली दिख रही हैं. 44 साल की शाह का वजन सालभर पहले सामान्य से ज्यादा 96 किलो के आसपास था. उसी साल मुंबई के एक अस्पताल में उनकी बैरियाट्रिक सर्जरी (वजन घटाने के लिए होने वाला ऑपरेशन) हुई और इससे उनका वजन 40 किलो तक कम हो गया. हालांकि शाह के लिए वजन कम होने की खुशी जल्दी ही काफूर भी हो गई क्योंकि अब वे पहले के मुकाबले बीमार सी दिखने लगीं. शाह बताती हैं, ‘मेरे गाल पिचक गए थे और ऐसा लगता था जैसे मैंने नकली दांत लगा रखे हैं.’ दरअसल वजन में नाटकीय कमी और कम खाने से शाह के शरीर में पोषक तत्वों और विटामिनों की कमी हो गई. सर्जरी से पहले मोटा होने के बावजूद वे खुद को स्वस्थ महसूस करती थीं लेकिन अब उन्हें हमेशा कमजोरी सी लगती है.

अप्रैल, 2015 में शाह का स्लीव गैस्ट्रेक्टॉमी ऑपरेशन किया गया था. वजन घटाने के लिए होने वाले इस ऑपरेशन में उनके पेट का आकार कम किया गया जिससे उनकी खाने की क्षमता कम हो गई. हालांकि शाह के शरीर में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा काफी थी पर उनमें मोटापे से संबंधित किसी बीमारी के कोई लक्षण नहीं थे. फिर भी उन्होंने बैरियाट्रिक सर्जरी कराने का फैसला किया क्योंकि मोटापे के चलते उनका चलना फिरना और लोगों से मेलजोल काफी कम हो गया था.

स्लीव गैस्ट्रेक्टॉमी और ऐसी ही दूसरी बैरियाट्रिक सर्जरी में पेट के आकार को ऑपरेशन के जरिए छोटा किया जाता है. इससे भूख जगाने वाले हॉर्मोन का उत्पादन कम हो जाता है जिससे वजन कम होने लगता है. ओबेसिटी ऐंड मेटाबॉलिक सर्जरी सोसायटी ऑफ इंडिया का अनुमान है कि देश में हर साल 12 से 15 हजार बैरियाट्रिक सर्जरी की जाती हैं. इनमें से एक बड़ी तादाद विदेशी मरीजों की भी होती है.

शाह बताती हैं कि सर्जरी के बाद के 30 दिन उनके लिए काफी तकलीफभरे रहे. वे हर समय कमजोरी और थकान महसूस करती रहीं. फिर ऐसा भी एक दौर आया जब वे जो भी खातीं, उल्टी कर देतीं. शाह के मुताबिक आधी इडली भी वे हजम नहीं कर पा रही थीं. सर्जरी के तीन माह बाद घर में हुई शादी में उन्हें ज्यादातर समय वॉशरूम में उल्टियां करते बिताना पड़ा. हालांकि उन्हें सर्जरी को लेकर कोई पछतावा नहीं है. वे इसकी वजह बताती हैं, ‘ मैं अपने बच्चे को स्कूल तक छोड़ने नहीं जा सकती थी क्योंकि पहली बात तो यह कि आलस के कारण मुझे सुबह उठने में बहुत दिक्कत होती थी वहीं मोटापे के कारण मेरा आत्मविश्वास इतना हिला हुआ था कि बाहर निकलने में बहुत संकोच होता था.’ शाह को लगता है कि इस ऑपरेशन के बाद अब वे एक दिम्मेदार मां बन चुकी हैं.

साइड इफेक्ट्स के साथ जीवन

शाह जैसे कई मरीज़ बैरियाट्रिक सर्जरी के साइड इफेक्ट्स झेलने के बाद भी ऑपरेशन कराना पसंद करते हैं तो इसकी सबसे बड़ी वजह मोटापे से पैदा होने वाली बीमारियां जैसे डायबिटीज और हाइपरटेंशन का डर है. वहीं मोटे लोगों को सोते वक्त सांस लेने में दिक्कतों का भी सामना करना पड़ता है. देश में सबसे ज्यादा बैरियाट्रिक ऑपरेशन करने का दावा करने वाले इंदौर के अस्पताल मोहक बैरियाट्रिक एंड रोबोटिक्स फैसिलिटी की डॉ वीणा माथुर बताती हैं, ‘ऑपरेशन से कई मरीज़ों की स्किन ढीली हो सकती है लेकिन हमारी कोशिश होती है कि मोटापा संबंधी अन्य बीमारियों से मरीज़ों को निजात दिलाई जाए.’

बीमार-सा दिखना, कमजोरी और भूख में कमी बैरियाट्रिेक सर्जरी के आम साइड इफेक्ट्स हैं. हालांकि कभी—कभी सर्जरी के समय ज्यादा खून बहना या नसों में थक्के जमने जैसे स्थितियां भी बन सकती हैं हालांकि यह हमेशा नहीं होता. डॉ माथुर बताती हैं कि उनके हॉस्पिटल में होने वाली सर्जरी में केवल एक से दो फीसदी मामलों में ही मरीज़ों में ऐसी जटिल समस्याएं देखी गईं. बैरियाट्रिक सर्जरी पर जारी एम्स की रिपोर्ट भी यही दावा करती है कि इस दौरान गंभीर जटिलता वाले मामले एक से दो फीसदी ही होते हैं.

हालांकि बैरियाट्रिक सर्जरी से होनेवाली दिक्कतें जानलेवा भी हो सकती हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, मार्च 2014 में एक व्यक्ति की बैरियाट्रिक सर्जरी हुई थी और बाद में संभवत: फेफड़ों में पैदा हुई दिक्कत के चलते उसकी मौत हो गई.

बैरियाट्रिक सर्ज़री के बाद का जीवन आसान नहीं होता. कई मरीज़ों का शरीर ऑपरेशन के बाद जीने के लिए जरूरी न्यूनतम आहार भी नहीं पचा पाता. वहीं ज्यादातर मरीज़ों को खानपान के मामलों में सख्त परहेज बरतना जरूरी होता है. बैरियाट्रिक सर्जन डॉ रमन गोयल के अनुसार, ‘अगर ऑपरेशन के बाद मरीज़ शराब पियें या तला—भुना खायें तब वे फिर से मोटे हो सकते हैं.’

भारी शरीर से कुपोषण तक का सफर

मुंबई की आहार विशेषज्ञ रत्ना थार के पास एक बार एक 50 वर्षीया महिला आईं, जो ऐसे ही एक ऑपरेशन के बाद खून की कमी यानी एनीमिया की शिकार हो गई थीं. पहले जहां वे 90 किलो की थीं, वहीं ऑपरेशन के बाद उनका वजह महज 38 किलो रह गया था. थार के मुताबिक इन हालात में उस महिला को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा ताकि उसका वजन सामान्य हो सके. थार बताती हैं कि बैरियाट्रिक सर्जरी के बाद खानपान में सख्त परहेज के कारण उस महिला को प्रोटीन संबंधी कुपोषण हो गया था.

सर एचएन रिलायंस फाउंडेशन हॉस्पिटल, मुंबई के न्यूट्रीशन एंड डायटेटिक्स विभाग की प्रमुख डॉ एलीन कैंडे बताती हैं कि ऑपरेशन से मरीज़ की खुराक कम हो जाती है और वह इसे भी पूरी तरह पचा नहीं पाता. जाहिर है कि इससे शरीर में विटामिन, खनिज तत्व और अन्य पोषक तत्वों की कमी हो जाती है जिससे शरीर की कार्यप्रणाली प्रभावित होने लगती है. कैंडे के मुताबिक खानपान संबंधी दिक्कतों के लिए केवल मरीज को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता और यह ऑपरेशन करने वाले सेंटर की जिम्मेदारी है कि वे आजीवन ऐसे मरीजों को परामर्श देते रहें.

थार यह जानकारी भी देती हैं कि बैरियाट्रिक सर्ज़री के बाद बाल झड़ने की समस्या को लेकर भी कई लोग उनसे संपर्क करते हैं. वे कहती हैं, ‘यह छोटी-मोटी समस्या लग सकती है लेकिन लोग इसके चलते भारी तनाव में आ जाते हैं.’ बैरियाट्रिक सर्जरी कराने वालों में यह बहुत आम समस्या है क्योंकि इसके बाद उनके शरीर में उन पोषक तत्वों की भारी कमी हो जाती हो जो कम मात्रा में ही सही लेकिन शरीर के लिए बेहद जरूरी होते हैं. कैंडे भी इस बात का समर्थन करती हैं कि पोषक तत्वों की कमी के चलते बाल, त्वचा और नाखूनों पर असर पड़ता है.

बैरियाट्रिक सर्ज़री कराने वाली 33 साल की पूनम जैन भी बालों के झड़ने से परेशान हैं. वे इस समस्या से निजात पाने के लिए खास आहार लेती हैं. वे बताती हैं पहले उनका वजन 80 किलो था और इसके चलते उनकी कमर में दर्द रहा करता था. पूनम योग या कसरत भी नहीं कर पाती थीं. हालांकि वजन घटाने के उन्होंने तमाम उपाय किए पर कोई फायदा नहीं हुआ. उन्होंने कई तरह की डाइट अपनाईं इससे उनका वजन कुछ समय के लिए तो कम होता लेकिन फिर बढ़ जाता. आखिर में उन्होंने सर्जरी करा ली. अब उनका वजन 54 किलो हो गया है.

बैरियाट्रिक सर्ज़री की ज़रूरत किसे है?

जैन और शाह दोनों ने इंटरनेट पर खोजबीन के आधार पर बैरियाट्रिक सर्ज़री का विकल्प चुना था. शाह कई डॉक्टरों से भी मिली थीं. वहीं जैन ऑपरेशन करा चुके कई मरीज़ों से भी मिलीं थीं. चूंकि कोई भी डाइट और एक्सरसाइज उनके वजन को कम करने में कारगर साबित नहीं हुई तो आखिर में थक-हारकर उन्होंने सर्जरी का विकल्प चुना.

कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल के डॉ गौरव मेहता कहते हैं कि इस सर्ज़री की वकालत काफी हल्के-फुल्के अंदाज में कर दी जाती है लेकिन इसके अपने ढंके-छिपे दूसरे पहलू भी हैं. आमतौर पर जब कोई व्यक्ति दूसरे उपायों से वजन घटाने में कामयाब नहीं हो पाता अस्पताल सर्ज़री का मशविरा दे देते हैं. लेकिन वजन घटाने का दावा करने वाले कई क्लिनिक नियमितरूप से अपने ऑनलाइन विज्ञापनों में बैरियाट्रिक सर्जरी का सुझाव देते हैं. कभी-कभार तो वे इस पर डिस्काउंट भी देते हैं. कई अस्पताल दूसरी बीमारियों के इलाज के साथ पैकेज में इसे भी प्रोमोट करते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि किसी मामले में बैरियाट्रिक सर्ज़री की कितनी अनिवार्यता होती है.

सर जेजे हॉस्पिटल एंड ग्रांट मेडिकल कॉलेज, मुंबई के सर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ ए भंडारवार कहते हैं कि मरीजों का चयन सोच—समझकर होना चाहिए. उनके मुताबिक, ‘ऑपरेशन से पहले मरीज की मनोवैज्ञानिक और आहार—विशेषज्ञ से काउंसलिंग करानी चाहिए. ताकि उसे यह पता चल जाए कि सर्ज़री के बाद व्यायाम नहीं किया और खाने-पीने में परहेज न किया तो ऑपरेशन कराने का कोई मतलब नहीं होगा.’

भंडारवार के विभाग में 2013 से अब तक मध्य और निम्न आयवर्ग के 250 से ज्यादा मरीज़ों के ऑपरेशन हुए हैं. उनके मुताबिक सर जेजे हॉस्पिटल एंड ग्रांट मेडिकल कॉलेज बैरियाट्रिक ऑपरेशन कराने के लिए कोई आर्थिक प्रोत्साहन देने के हथकंडे (डिस्काउंट आदि) नहीं अपनाता. और केवल जरूरी मामलों में ही ऑपरेशन किया जाता है.

हालांकि डॉ गोयल और डॉ माथुर दोनों का कहना है कि निजी केंद्रों में भी ऑपरेशन के पहले मरीज़ों की काउंसलिंग की जाती है. इस पूरे ऑपरेशन पर सर्जन और अस्पताल के हिसाब से 3 से 10 लाख रुपये तक का खर्च आता है.

ओबेसिटी ऐंड मेटाबॉलिक सर्जरी सोसाइटी ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष डॉ शशांक शाह जानकारी देते हैं कि ऐसी सर्जरी की मार्केटिंग और प्रमोशन को विनियमित करने में सोसाइटी की कोई भूमिका नहीं है. उनके मुताबिक यह काम मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया जैसी विनियामक संस्थाओं (रेगूलेटरी बॉडी) के दायरे में आते हैं. बैरियाट्रिक सर्जरी के लिए मरीज़ों का चयन करते समय डॉक्टरों को विभिन्न पेशेवर मेडिकल संस्थाओं द्वारा तय दिशा-निर्देशों का पालन करना चाहिए. सोसाइटी की वेबसाइट बताती है कि आमतौर पर ऑपरेशन के लिए उस मरीज का चयन किया जाता है जिनका बॉडी मास इंडेक्स यानी बीएमआई 40 से ज्यादा हो.

शाह कहते हैं कि अगर किसी मरीज़ में मोटापे से होने वाली बीमारियों के लक्षण हैं तो 40 से कम बीएमआई होने के बावजूद ऑपरेशन किया जा सकता है. उनके मुताबिक सोसाइटी के ये दिशानिर्देश अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार हैं जो देश के लिहाज से बदलते रहते हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि अलग-अलग देशों में मोटापे और उससे होने वाली बीमारियों की उम्र आमतौर पर अलग-अलग होती है.

बैरियाट्रिक सर्जरी का फलता-फूलता उद्योग

भारत में करीब 220 सर्जन बैरियाट्रिक सर्ज़री करते हैं. कोई भी डॉक्टर जो सर्जन हो वह बैरियाट्रिक सर्ज़री कर सकता है. ओबेसिटी सर्जरी सोसाइटी ऑफ इंडिया के संस्थापक सदस्य डॉ गोयल कहते हैं, ‘ सर्जरी में प्रशिक्षित कोई भी डॉक्टर जिसे अपने पर भरोसा हो वो बैरियाट्रिक सर्जरी कर सकता है.’ यह सोसाइटी और दूसरी चिकित्सा संस्थाएं डॉक्टरों को बैरियाट्रिक सर्जरी में प्रशिक्षित करने के लिए शॉर्ट टर्म कोर्स भी तैयार कर रही हैं. डॉ शाह के मुताबिक तकनीक में सुधार और डॉक्टरों की कुशलता बढ़ने के साथ-साथ देश में ऐसे ऑपरेशनों का स्तर लगातार सुधर रहा है. शाह बताते हैं कि सर्ज़री बाद होने वाली दिक्कतों की निगरानी ज्यादा कठिन नहीं है, क्योंकि फिलहाल 90 फीसदी बैरियाट्रिक सर्ज़री देश के केवल 20 सर्जन कर रहे हैं.

जहां तक बैरियाट्रिक सर्जरी के बाजार की बात है तो इससे जुड़े उपकरणों का अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार 2015 में करीब 135 करोड़ डॉलर का था, जिसके 2022 तक यानी पांच साल बाद करीब 300 करोड़ डॉलर होने का अनुमान है. यानी महज सात सालों में दोगुने से ज्यादा की वृद्धि होने वाली है और इस क्षेत्र के विशेषज्ञों की मानें तो इसमें भारत का योगदान काफी महत्वपूर्ण रहने वाला है.

भारत में बैरियाट्रिक सर्जरी की इतनी मांग के बावजूद इसके नतीजों पर बहुत कम जानकारी उपलब्ध है. इसके लिए ओबेसिटी सर्जरी सोसाइटी ऑफ इंडिया ने ‘इंडियन रजिस्ट्री’ बनाई है. डॉ गोयल के मुताबिक अब सर्जन को ऑपरेशन से संबंधित आंकड़े-जानकारियां यहां भेजनी होंगी. अगर यह रजिस्ट्री सार्वजनिक की जाती है तो ऑपरेशन के इच्छुक मरीज़ों को ऑपरेशन से जुड़ी दिक्कतों, खतरों ओर साइड इफेक्ट्स का पता चल सकेगा. हालांकि सोसाइटी अब तक तय नहीं कर पाई है कि ये आंकड़े सार्वजनिक किए जाएंगे या नहीं.