अमेरिका में मीडिया एक बार फिर चर्चा में है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का इस पर हमला तीखा होता जा रहा है. क्या अखबार क्या टीवी चैनल, सब ट्रंप के निशाने पर हैं. वे मीडिया को झूठा बता रहे हैं और पत्रकारों को फटकार लगा रहे हैं. कुछ दिन पहले उन्होंने अमेरिकी मीडिया को जनता का दुश्मन तक कह दिया.

लेकिन डोनाल्ड ट्रंप की यह चोट मीडिया के लिए एक तरह से मरहम का काम भी कर रही है. आंकड़े कुछ ऐसा ही बताते हैं. मीडिया रिसर्च फर्म नील्सन के मुताबिक जब से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का मीडिया पर हमला बढ़ा है उसके पाठकों और दर्शकों की संख्या में भी बढ़ोतरी दर्ज हुई है. द न्यूयार्क टाइम्स, द वाशिंगटन पोस्ट और द वाल स्ट्रीट जर्नल जैसे प्रमुख अखबारों के साथ-साथ सीएनएन और फॉक्स न्यूज जैसे चैनलों को भी यह फायदा हुआ है.

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अभी तक सबसे ज्यादा निशाना द न्यूयार्क टाइम्स पर साधा है. आंकड़े बताते हैं कि नवंबर, 2015 में राष्ट्रपति चुनाव के बाद इसके शेयरों में 42 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. 2016 में अखबार के डिजिटल संस्करण से जुड़ने वाले पाठकों की संख्या पांच लाख थी. इनमें आधे से अधिक यानी 2,76,000 लोग अक्टूबर से दिसंबर के बीच इसके साथ जुड़े थे. इसके अलावा इसकी वेबसाइट पर एक साल पहले की तुलना में पाठकों की संख्या (ट्रैफिक) में तिगुनी बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

जो हाल द न्यूयार्क टाइम्स का है काफी कुछ वैसा ही द वाशिंगटन पोस्ट और द वाल स्ट्रीट जर्नल का भी है. इनके पाठकों की संख्या में भी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान और इसके नतीजे के बाद बढ़ोतरी देखी गई है. मीडिया मुगल रुपर्ट मर्डोक के स्वामित्व वाले द वाल स्ट्रीट जर्नल के डिजिटल संस्करण के सबस्क्राइबरों की कुल संख्या 11 लाख है. इनमें से करीब ढाई लाख लोग इससे पिछले साल जुड़े हैं.

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया

डोनाल्ड ट्रंप के सुर्खियों में छाने के बाद से फॉक्स न्यूज, एमएसएनबीसी और सीएनएन सबसे अधिक फायदे में रहे हैं. नील्सन के मुताबिक साल 2017 के पहले डेढ़ महीने के दौरान इनकी टीआरपी में 40 फीसदी से ज्यादा उछाल आया है. इनमें फॉक्स न्यूज अव्वल रहा है. इस दौरान इसके दर्शकों की संख्या 30 लाख से ज्यादा हो गई है. जनवरी, 2016 में यह आंकड़ा करीब 23 लाख था.

इस बदलाव का एक समाजशास्त्रीय पहलू भी है. वरिष्ठ मीडिया विश्लेषक आनंद प्रधान कहते हैं, ‘जब किसी देश में लोकतांत्रिक मूल्यों पर संकट आता है तो लोग प्रेस और न्यायपालिका की ओर देखते हैं और उसके साथ आते हैं.’ उनके मुताबिक अमेरिकी मीडिया के पाठकों और दर्शकों की संख्या में आई बढ़ोतरी की एक वजह यह भी है. वे कहते हैं, ‘भारत में भी सत्तर के दशक (1975-78) में आपातकाल के दौरान सेंसरशिप के बावजूद प्रेस का दायरा बढ़ा था.’ आनंद प्रधान के मुताबिक ऐसे माहौल में उदारवादी लोगों का रूझान भी मीडिया की ओर बढ़ता है.

इसकी पुष्टि बीते महीने गोल्डन ग्लोब्स पुरस्कार समारोह में अमेरिकी अभिनेत्री मेरिल स्ट्रीप द्वारा दिए गए भाषण से भी होती है. उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद लोकतांत्रिक मूल्यों पर आए संकट की बात करते हुए एक सिद्धांतवादी प्रेस की जरूरत बताई थी. उन्होंने कहा था कि अमेरिका को एक ऐसे प्रेस की जरुरत है, जो शासन को जिम्मेदार बनाने के साथ-साथ उसकी गलती पर अंगुली भी उठा सके. मेरिल स्ट्रीप ने अमेरिकी नागरिकों से पत्रकारों का साथ देने के लिए आगे आने की अपील भी की थी.

अमेरिका में मीडिया को लेकर डोनाल्ड ट्रंप का यह रूख कब तक बना रहेगा, इस पर अभी कुछ कहना मुश्किल लगता है. लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि उनका यह हमलावर रुख मीडिया को एक तरह से मजबूत ही कर रहा है.