भारत में दिल की बीमारियों और मधुमेह यानी डायबिटीज से जुड़े चिंताजनक आंकड़े अक्सर चर्चा का विषय बनते हैं. लाखों की जिंदगी खतरे में डाल रहे जानलेवा प्रदूषण पर भी खूब बात हो रही है. लेकिन स्वास्थ्य से जुड़ी एक और चुनौती भी है जिसका जिक्र उतना नहीं हो रहा है. यह चुनौती है थकान.

एक हालिया रिपोर्ट बता रही है कि 18 से 64 साल के लोगों की आबादी में 22 फीसदी लोग ऐसे हैं जिन्हें सबसे ज्यादा परेशानी थकान से है. मिंटेल नाम की संस्था द्वारा जारी इस रिपोर्ट के मुताबिक लोगों के लिए यह उच्च रक्तचाप यानी हाई ब्लडप्रेशर और डायबिटीज से भी बड़ी चिंता है. महिलाएं इससे ज्यादा परेशान हैं. 25 फीसदी महिलाओं का कहना है कि वे सबसे ज्यादा परेशान उन्हें रहने वाली थकान से हैं. मिंटेल की यह रिपोर्ट एक सर्वेक्षण पर आधारित है. बीते साल जून में 3,029 लोग इस सर्वेक्षण का हिस्सा बने थे.

दुनिया के मशहूर अर्थशास्त्री जॉन कीन्स ने कभी कहा था कि भविष्य में लोगों के पास फुर्सत के काफी क्षण होंगे. लेकिन लगता है भारत को उनकी इस भविष्यवाणी को गलत साबित करने वाले देश के रूप में चुना जा सकता है. हालांकि भारत में निजी क्षेत्र की कार्यसंस्कृति देखें तो ये आंकड़े हैरत पैदा नहीं करते.

काम और जीवन के बीच का संतुलन हमारे देश में चुटकुलों का विषय बन चुका है. यहां एक कर्मचारी साल भर में औसतन 2,200 घंटे काम करता है. यह आंकड़ा बाकी देशों की तुलना में कहीं ज्यादा है. भारत के लोग प्रति​ सप्ताह औसतन 52 घंटे काम करते हैं और यह आंकड़ा अमेरिका, ब्रिटेन और चीन से काफी ज्यादा है. पिछले साल उन देशों की सूची में भारत चौथे स्थान पर था जहां लोगों को सबसे कम छुट्टियां मिल रही हैं.

कामकाजी आबादी की थकान लंबे समय में एक बड़ी समस्या साबित होने वाली है. थकान का मतलब सिर्फ थकान नहीं बल्कि एनीमिया, अवसाद और मधमुेह जैसी अन्य बीमारियों की आहट भी है. विशेषज्ञों के मुताबिक भारत को इस समस्या पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है.