कश्मीर में तीन दशक पुरानी आतंकवाद और अलगाववाद की समस्या के समाधान के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक रिपोर्ट राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल को भेजी है. इसमें कहा गया है कि कश्मीर में मस्जिदों, मदरसों और मीडिया (प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक दाेनों) पर नियंत्रण की जरूरत है. इसके अलावा रिपोर्ट में खुफिया तंत्र को मजबूत करने और अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के उदारवादी धड़े के साथ संपर्क-संबंध बेहतर करने का भी सुझाव दिया गया है.

द इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से दी गई खबर में इस रिपोर्ट के बारे में जानकारी दी है. दिलचस्प बात है कि इस रिपोर्ट में न तो पाकिस्तान का जिक्र है और न ही कश्मीर में उसकी भूमिका का. हालांकि घाटी के राजनीतिक माहौल में परिवर्तन लाने की जरूरत जरूर बताई गई है. रिपोर्ट में शिया, बक्करवाल और पहाड़ी मुस्लिम समुदाय की घाटी में मौजूद आबादी के आंकड़े दिए गए हैं. साथ ही सुझाव भी कि अलगाववादी इन समुदायों को अपनी तरफ खींच लें, इससे पहले ही इनके लिए विकास की विशेष योजनाएं शुरू करनी चाहिए. रिपोर्ट के मुताबिक घाटी में अलगाववाद पर काबू पाने के लिए मौलवियों की मदद भी ली जानी चाहिए.

रिपोर्ट में प्रमुख सुझाव इस तरह हैं

  1. जिन लोगों ने 2014 के चुनाव में सक्रिय भागीदारी निभाई, उनको समर्थन और प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए ताकि वे कट्टरपंथियों के बहकावे में न आएं. केंद्र की योजनाओं को घाटी में लागू करने के लिए भी इन लोगों की मदद ली जा सकती है. ये अपनी तरह की सोच वाले अन्य लाेगों को भी सरकारी कार्यक्रमों से जोड़ सकते हैं.
  2. केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्रालय भी घाटी में निष्क्रिय सी पड़ी शाखा को सक्रिय करे. उन समाचार संस्थानों को हतोत्साहित करना चाहिए, जो भारत विरोधी भावनाएं भड़काते हैं.
  3. अलगाववादियों के खिलाफ आयकर विभाग और ऐसी अन्य एजेंसियों के जरिए कार्रवाई कर दबाव बढ़ाना चाहिए. लेकिन साथ ही उदारवादी धड़ों से संपर्क-संबंध भी बेहतर करने चाहिए.
  4. पत्थरबाजाें के खिलाफ पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत मुकदमे दर्ज किए जाने चाहिए. लेकिन पहली बार इस काम में शामिल होने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई से बचना भी चाहिए. खास तौर पर बच्चों और किशोरों के विरुद्ध. इनके लिए विशेष तौर पर किशोर अावास स्थापित किए जाने चाहिए.
  5. जम्मू-कश्मीर के लिए केंद्र सरकार नया कानून भी बना सकती है. इसके जरिए बड़े कारोबारी घरानों को कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) के तहत घाटी में तमाम गतिविधियां संचालित करने के लिए सालाना लक्ष्य दिए जा सकते हैं.