डिजिटल इकनॉमी और नगद रहित लेन-देन (कैशलेस ट्रांजेक्शन) की तरफ बढ़ रहे देश के लिए ये खबरें चेतावनी हैं. पहली खबर बताती है कि विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर मौजूद आम लोगों की तमाम निजी जानकारी (पर्सनल डेटा) महज एक रुपए से भी कम कीमत पर बाजार में खरीद-फरोख्त के लिए उपलब्ध है. दूसरी खबर के मुताबिक, देश 2,20,000 में से करीब 60 फीसदी एटीएम ऐसे हैं जिनमें आसानी से छेड़छाड़ की जा सकती है. उनके जरिए धोखाधड़ी को अंजाम दिया जा सकता है.

द इकनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक अखबार ने देश के कई हिस्सों में सक्रिय डेटा ब्रोकरों से संपर्क किया. डेटा ब्रोकर यानी वे कंपनियां जो आम आदमी की जानकारी के बिना उससे जुड़ी जानकारी विभिन्न माध्यमों से अपने पास जुटाती हैं और फिर उसे किसी को बेचती हैं. अखबार ने इन कंपनियों से जब खरीदार की तरह संपर्क किया तो उनके प्रतिनिधि दिल्ली, बेंगलुरू, हैदराबाद में रह रहे करीब एक लाख लोगों का पर्सनल डेटा सिर्फ 10 से 15,000 रुपए या इससे भी कम में बेचने को राजी हो गए. एक डेटा ब्रोकर ने तो पेशकश कर दी कि वह किसी भी इलाके के धनी-मानी लोगों (हाईनेटवर्थ इंडिविजुअल्स) क्रेडिट कार्ड होल्डरों, वेतनभोगियाें, सेवानिवृत्त महिलाओं आदि से जुड़ी सभी जानकारियां उपलब्ध करा सकता है. एक अन्य का कहना था कि वह दिल्ली, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) और बेंगलुरू के करीब 1.79 लाख लोगों का पर्सनल डेटा सिर्फ 7,000 रुपए में मुहैया करा सकता है. इसमें लोगों का नाम, उम्र, पता, आमदनी, ईमेल आईडी, पेशा, वैवाहिक स्थिति, ऑनलाइन कब-क्या खरीदा-बेचा आदि जानकारियां शामिल है.

रिपोर्ट के मुताबिक कुछ डेटा ब्रोकरों ने तो नमूने के तौर पर एक्शेल शीट में रखकर कुछ लोगों से संबंधित जानकारियां भी अखबार को भेज दीं. उदाहरण के लिए गुड़गांव के एक डेटा ब्रोकर ने महज 1,000 रुपए लेकर एचडीएफसी और एक्सिस बैंक के करीब 3,000 क्रेडिट कार्ड होल्डरों की जानकारी अखबार को भेज दी. इनमें से करीब 10-12 लोगों के नंबरों पर जब अखबार ने संपर्क किया तो उपलब्ध जानकारी सही पाई गई. इसी तरह बेंगलुरू और हैदराबाद के कुछ डेटा ब्रोकरों ने भी सैंपल के तौर पर जानकारी भेजी और उसे भी प्रमाणिक पाया गया.

अखबार ने जानकारी की पुष्टि करने के लिए जिनसे संपर्क किया उन्हीं में से एक हैँ, हैदराबाद के राजशेखर रेड्‌डी. असलियत बताए जाने पर उनका कहना था, ‘यह तो बहुत ही डरावना है.’ जबकि बेंगलुरू के नागराज बीके ने कहा, ‘मेरी इजाजत के बिना कोई मुझसे जुड़ी जानकारी किसी और को कैसे बेच सकता है. यह तो अपराध है.’ इसी तरह बेंगलुरू की श्रुति भी उस वक्त भौचक रह गईं जब उन्हें पता चला कि अमेजन से की गई खरीद के बाद डेटा ब्रोकर के जरिए उनसे संबंधित जानकारी अखबार के पास पहुंच चुकी है.

इस संबंध में अमेजन का कहना था कि डेटा कैसे लीक हुआ, इस बारे में उसे कोई जानकारी नहीं है. प्रवक्ता का कहना था कि कंपनी अपने ग्राहकों से जुड़ी जानकारी की गोपनीयता का पूरा ख्याल रखती है.एचडीएफसी और एक्सिस बैंक ने उस डेटा की पुष्टि करने से ही इनकार कर दिया जो ब्रोकर के जरिए अखबार तक पहुंचा था. अलबत्ता, इन बैंकों की ओर से यह कहा गया कि वे अपने ग्राहकों को पर्सनल डेटा की सुरक्षा से संबंधित सभी जानकारी समय-समय पर देते रहते हैं और उन्हें जागरूक करते रहते हैं.

इसी तरह हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक एटीएम से छेड़छाड़ करना या उनके जरिए धोखाधड़ी को अंजाम देना देश में कोई मुश्किल काम नहीं है. एटीएम में नकदी डालने वाले ओटीसी (वन टाइम कॉम्बिनेशन) तकनीक का इस्तेमाल नहीं करते. यह एक तरह का इलेक्ट्रॉनिक लॉक होता है. दिए गए कॉम्बिनेशन (वन टाइम पासवर्ड जैसा एक नंबर) के जरिए एटीएम में नकदी डालने वाला इसे एक बार ही खोल सकता है. एटीएम की सुरक्षा के लिए विकसित देशों में इस तकनीक का बखूबी इस्तेमाल किया जाता है.

हालांकि भारत में इसका इस्तेमाल कम होने या न होने से छेड़छाड़ करने वाले ‘चिल्ड्रन बैंक ऑफ इंडिया’ के नोट भी आसानी से एटीएम में रखने में सफल हो जाते हैं. पिछले हफ्ते ही दक्षिणी दिल्ली के एक एटीएम से इसी तरह के नोट निकलने का मामला सामने आ चुका है. इतना ही नहीं, खबर के अनुसार, बहुत सारे एटीएम बूथों पर सीसीटीवी (क्लोज सर्किट टीवी) कैमरे या तो हैं ही नहीं या फिर बंद पड़े हैं.

इस संबंध में कैश लॉजिस्टिक्स एसोसिएशन के सचिव एनएसजी राव कहते हैं, ‘हम बैंकों से कई बार अाग्रह कर चुके हैं कि वे अपने सभी एटीएम में ओटीसी लॉकिंग सिस्टम लगवाएं. लेकिन उनकी तरफ से इस पर ध्यान ही नहीं दिया जा रहा है. यहां तक कि बैंकों के पास इसकी भी पुख्ता जानकारी नहीं है कि उनके कितने एटीएम पर सीसीटीवी कैमरे चालू हालत में हैं या फिर बंद.’