समाजवादी पार्टी (सपा) के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव अमर सिंह ने 1990 के दशक के मध्य में देश की राजनीति में कदम रखा. देखते ही देखते उन्होंने ऐसे शख्स के तौर पर पहचान बना ली जो मुश्किल समझौते भी आसानी से करा सकता था. यहां तक कि कभी राजनीतिक तौर पर दुश्मन समझी जाने वाली पार्टियों (जैसे कि सपा और कांग्रेस) के बीच भी. करीब एक दशक तक वे सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव से लेकर बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन, उद्योगपति अनिल अंबानी और सुब्रत राय तक कई हस्तियों के दाहिने हाथ की तरह दिखते रहे. इसके बाद 2009 से 2016 के बीच वे सार्वजनिक जीवन से दूर ही दिखे. 2016 में राज्य सभा सीट के साथ उनकी वापसी हुई और फिर हाल में सपा नेतृत्व में मचे झगड़े के बीच भी वे लगातार सुर्खियों में छाए रहे. अमर सिंह के साथ सत्याग्रह की सहयोगी वेबसाइट स्क्रोल.इन की बातचीत के प्रमुख अंश…

आप समाजवादी पार्टी के बारे में काफी कुछ जानते हैं. क्या आप बता सकते हैं कि सपा में ये जो गड़बड़झाला चल रहा है, इसका आखिर चक्कर क्या है‌?

यह बड़ा जटिल मसला है. इसमें बहुत सारी उलझनें भी हैं. यह समस्या पैदा कैसे हुई, मैं आपको बताता हूं. मुलायम सिंह यादव समाजवादी पार्टी के निर्विवाद नेता थे. और मैं ईमानदारी से कहूं तो उन्होंने अपने खून-पसीने से इस पार्टी को खड़ा किया है. वे जमीन से जुड़े व्यावहारिक नेता हैं, जो राजनीति में ही रहते हैं, उसी में सोते हैं. मैं उनसे 1990 के दशक के मध्य में मिला था. इसके बाद 2009 तक हम इतने नजदीक रहे कि हमें कोई अलग नहीं कर सका. जो मुझमें कमी थी, वे पूरी कर देते थे और उनकी खामियां मैं पूरी कर देता था.

यानी आप एक-दूसरे के पूरक थे?

बिल्कुल. लेकिन धीरे-धीरे चूंकि सपा पूरी तरह एक परिवार की पार्टी बन चुकी थी, इसलिए उसमें झगड़े भी होने ही थे. क्योंकि इस पार्टी में हर दूसरा सदस्य एक परिवार का ही सदस्य है. किसी न किसी का कुछ न कुछ लगता है. राजनीति में एक कहावत है, ‘दुश्मन तो दुश्मन होता है. लेकिन दोस्त ईर्ष्यालु होता है.’ सो, परिवार के भी बहुत से सदस्य खास तौर पर रामगोपाल यादव (मुलायम सिंह के चचेरे भाई) भी, जिनके पास दिल्ली में पार्टी का काम देखने की जिम्मेदारी थी, नाखुश थे. लेकिन वे मुलायम सिंह के जबर्दस्त प्रभाव की वजह से लंबे समय तक चुप रहे. मुलायम सिंह सत्ता में रहे हों, न रहे हों, लेकिन वे राष्ट्रीय राजनीति में अहम किरदार हमेशा रहे. केंद्र में जितनी गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा गठबंधन सरकारें बनीं, उनकी सक्रिय भागीदारी की वजह से ही बनीं. लेकिन इसी दौर में रामगोपाल को लगने लगा कि जैसे उनकी अनदेखी की जा रही है. जबकि वे खुद को ज्यादा पढ़ा-लिखा, बुद्धिजीवी, ईमानदार और सुसंस्कृत मानते थे. बस यहीं और संभवत: इसी वजह से 2009 से काफी पहले ही मुझसे छुटकारा पाने की साजिश रची जाने लगी.

लेकिन किसी पार्टी में ऐसा कुछ होने की संभावना होती ही है, नहीं?

नहीं, अगर उन्हें (रामगोपाल को) स्वर्गीय जनेश्वर मिश्र का आशीर्वाद न होता तो ऐसा कुछ कभी न हो पाता. लेकिन मुलायम सिंह यादव पर मेरा जिस तरह का प्रभाव था, उससे जनेश्वर मिश्र भी उस वक्त असंतुष्ट थे. स्वर्गीय मोहन सिंह और बृजभूषण तिवारी भी असंतुष्टों में शामिल थे. ये सभी कट्‌टर समाजवादी नहीं चाहते थे कि समाजवादी आंदोलन दिल्ली की चमक-दमक में उलझे. लेकिन आप ही देखिए, मुलायम सिंह यादव और उनके परिवार को बॉलीवुड से कितना प्यार है. इस परिवार के सदस्य ग्लैमर और तड़क-भड़क पसंद करते हैं. उन्होंने सालाना सैफई महोत्सव का आयोजन शुरू किया है. इसमें बड़े-बड़े फिल्मी सितारे, कारोबारी, रईस आदि सब आते हैं. लिहाजा, उन लोगों (समाजवादी नेताओं) का मेरे प्रति विरोध वैचारिक था क्योंकि वे सभी कट्‌टर लोहियावादी थे. उन्हें अव्यावहारिक हो जाने की कीमत पर भी यह ग्लैमर और तड़क-भड़क पसंद नहीं थी.

आखिर 2009 में हुआ क्या था?

विरोध लगातार बढ़ रहा था. रामगोपाल ने मौका देखकर इसे हवा देने और ज्यादा सुलगाने का काम किया. फिर 2009 में वे सभी मेरे खिलाफ एकजुट हो गए. मुलायम सिंह यादव पर दबाव बनाया गया कि मुझे पार्टी से बाहर कर दिया जाए.

लेकिन आप दोनों तो कभी अलग न होने वाले थे. फिर वे सफल कैसे हुए?

अभी हाल में ही मुझसे मुलायम सिंह यादव ने कहा था, ‘आपके और मेरे बीच फर्क यह है कि आप (अमर) बहुत निजी किस्म की राजनीति करते हैं. पहली बात यह है कि आप राजनीति में इसलिए हैं क्योंकि मुझे आपने दोस्त माना है. सो, इस दोस्ती के लिए आप राजनीति छोड़ सकते हैं. लेकिन मैं खांटी राजनेता हूं. राजनीतिक फायदे के लिए दोस्ती भी छोड़ दूंगा. यही आपके और मेरे बीच फर्क है.’

रामगोपाल यादव और उनके धड़े के लोग कहते हैं कि आप भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंट हैं?

यह एकदम फिजूल बात है. बल्कि वे तो रामगोपाल हैं जो भाजपा के साथ नजदीकियां बढ़ा रहे हैं. इसका अभी हाल का ही उदाहरण है, बिहार में महागठबंधन की योजना सही तरह से परवान न चढ़ पाना. इस महागठबंधन की योजना मुलायम सिंह यादव के घर पर बनी थी. सभी ने मुलायम सिंह को निर्विवाद नेता भी मान लिया था. सभी एक समान चुनाव चिन्ह पर चुनावी दंगल में उतरने को तैयार थे. पर तभी रामगोपाल ने यह बयान दे दिया, ‘महागठबंधन के मसौदे पर दस्तखत करना वैसा ही है, जैसे अपनी सजा-ए-मौत के आदेश पर हस्ताक्षर करना.’

यह सब उन्होंने इसलिए किया क्योंकि नोएडा में एक इंजीनियर थे यादव सिंह (बिना इंजीनियरिंग की डिग्री के ही नोएडा विकास प्राधिकरण में सालों-साल तक चीफ इंजीनियर रहे यादव सिंह ने राज्य के छह मुख्यमंत्रियों के साथ काम किया. अभी वे भ्रष्टाचार के आरोप में गाजियाबाद की डासना जेल में हैं). वे मायावती के खास थे, रामगोपाल के भी हैं. उन्हीं यादव सिंह का एक सहयोगी है, विनोद शाह, जिन्होंने रामगोपाल के बेटे अक्षय यादव (सपा सांसद) और बहू ऋचा अहलूवालिया के लिए एक कंपनी बनाई. उस कंपनी के निदेशक भी शाह हैं बल्कि वे रामगोपाल और मायावती, दोनों परिवारों के समान रूप से निदेशक हैं. नोएडा प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रमा रमन (उन्हें भी भ्रष्टाचार के आरोपों की वजह से पद हटा दिया गया था हालांकि बाद में उन्हें फिर वहीं तैनाती मिल गई) भी रामगोपाल और अखिलेश के खास हैं. राज्य के एक ताकतवर अधिकारी नवनीत सहगल भी मायावती और अखिलेश के नजदीक हैं.

लेकिन इससे भाजपा के साथ उनके संबंधों की बात कहां साबित होती है?

इसके बहुत से उदाहरण हैं. पहला तो बिहार का, जब उन्होंने महागठबंधन की योजना सफल नहीं होने दी. दूसरा अभी का, जब वे सपा में टूट का कारण बने हैं.

आप क्या कहना चाहते हैं कि वे यह सब अपने कारोबारी हितों की सुरक्षा के लिए कर रहे हैं?

अखिलेश यादव ने एनएम बिल्डवेल नामक कंपनी के शेयर आरके मनोचा से खरीदे. मनोचा भी यादव सिंह के सहयोगी और उनकी पत्नी कुसुमलता के पूर्व कारोबारी साझीदार हैं. इस कंपनी के खिलाफ कालेधन को सफेद करने के आरोप में जांच चल रही है. इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने 2015 में इस मामले में सीबीआई जांच के आदेश दिए हैं. यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त विशेष जांच दाल (एसआईटी) भी एनएम बिल्डवेल की जांच कर रहा है. यही वजह है कि रामगोपाल भाजपा की मदद करना चाहते हैं और यादव परिवार में झगड़ा कराकर वे ऐसा कर भी रहे हैं. हो सकता है, उनके भीतर कोई डर हो या यह भी संभव है कि वे इस तरह से एनएम बिल्डवेल के खिलाफ सीबीआई जांच रुकवाना चाहते हों.

आपके बारे में भी तो कहा जाता है कि आपके भाजपा के साथ काफी नजदीकी संबंध हैं?

अटल जी मुझे बहुत पसंद करते थे और मैं भी उनके काफी नजदीक था. यह मेरे लिए सम्मान की बात है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के स्वयंसेवक रहे उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री के प्रति भी मेरे मन श्रद्धा है. वे मेरे पिताजी के घनिष्ठ मित्र थे. मैं उन्हें बचपन में ‘चाचा’ कहा करता था. सो, आप कह सकते हैं कि 2003 में मैंने मुलायम सिंह यादव को मुख्यमंत्री बनवाने में एक अहम भूमिका निभाई थी. (उस वक्त उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी-भारतीय जनता पार्टी की गठबंधन सरकार गिर गई थी. उस वक्त मायावती चाहती थीं कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाए. लेकिन तत्कालीन राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री ने मुलायम सिंह यादव को सरकार बनाने के लिए बुला लिया था.)

यानी तब आपने भाजपा से साठगांठ की थी?

उस वक्त भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव (स्वर्गीय) प्रमोद महाजन ने मुझसे अनुरोध किया था कि हम केसरीनाथ त्रिपाठी (भाजपा नेता और 2002 से 2004 तक उत्तर प्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष) को न बदलें. वे मेरे अच्छे मित्रों में से थे. इसलिए हमने त्रिपाठी को नहीं छेड़ा. अगर आप इसे भाजपा के साथ साठगांठ कहते हैं, तो हां वह मैंने की थी. जहां तक भाजपा में दोस्तों की बात है तो मेरी अरुण जेटली से भी एक वकील और पारिवारिक सदस्य के तौर पर घनिष्ठ मित्रता है.

नरेंद्र मोदी से आपके संबंध कैसे हैं?

जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे, हम अच्छे दोस्त होते थे. मेरी शादी गुजरात के भावनगर राजघराने की राजकुमारी से हुई है. मैं मोदी को उस वक्त से जानता हूं जब वे 1990 के दशक के मध्य में दिल्ली आए थे. वे बहुत ही गर्मजोशी भरे और अच्छे इंसान थे, और अब भी वैसे ही हैं. लेकिन उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद उनसे मेरी मुलाकात कम ही हुई है.

मुलायम सिंह के पास आपकी वापसी कैसे हुई?

मुझे लगता है कि मेरे जाने के बाद मुलायम सिंह के जीवन में एक खालीपन सा आ गया था. मैंने हमेशा उनकी ढाल का काम किया. लेकिन मेरी अनुपस्थिति में उन्हें चारों तरफ से कंटीली नागफनियों ने घेर लिया.

उनके और उनके बेटे के बीच क्या बदल गया है?

मुझे लगता है, दो पीढ़ियों के बीच का फर्क, बेसब्री से उपचा लालच ही इस सब की वजह है. यह सब हर परिवार में होता है. वे बेटे से कहना चाहते थे, ‘मैं अभी थका नहीं हूं, रिटायर नहीं हुआ हूं.’ वे मुझे पार्टी में फिर शामिल कर बेटे को घुड़्की देना चाहते थे, उसके नट-बोल्ट कसना चाहते थे. लेकिन उनके बेटे ने इसे बड़ी गंभीरता से ले लिया और मुलायम सिंह को अपना प्रतिद्वंद्वी समझ लिया. बेटे ने अपनी पूरी राजनीतिक ताकत उनसे मोर्चा लेने में लगा दी.

आपने कहा है कि यादव परिवार ने झगड़े का यह ड्रामा खुद रचा है, ताकि अखिलेश की ताजपेशी आसानी से हो सके?

हां, बिल्कुल. यह सब मुलायम सिंह यादव का रचा खेल है. ताकि अखिलेश के विरोधियों को किनारे किया जा सके और मुलायम सिंह की गैरमौजूदगी में भी उनके सामने कोई चुनौती न रहे.

आप पक्के तौर पर ऐसा कैसे कह सकते हैं?

पहली बार (झगड़े के बाद) जब हम लोग चुनाव आयोग के पास गए तो वहां से लौटकर मैंने तीन-चार पूर्व चुनाव आयुक्तों से बात की. उन सबने बताया कि किसी पार्टी में इस तरह का मतभेद है तो आयोग किसी एक पक्ष को पार्टी का चुनाव चिन्ह आवंटित करने से पहले काफी पूछ-परख करता है. किस पक्ष के पास कितना बहुमत है, इसका सत्यापन कराया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया में कम से कम दो-तीन महीने लग जाते हैं और इस दौरान पार्टी चुनाव चिन्ह जब्त रहता है. यानी अखिलेश के पास भले बहुमत रहा हो, लेकिन उन्हें इतनी जल्दी पार्टी का चुनाव चिन्ह नहीं मिल सकता था. इसीलिए मुलायम सिंह जब दूसरी बार चुनाव आयोग गए तो मुझे अपने साथ नहीं ले गए, ताकि अखिलेश को पार्टी का चिन्ह आवंटित होने में कोई अड़चन न आए. यह मेरा पहला आरोप है. फिर उन्होंने मुझसे यह भी कहा कि मैं फिर कभी उनके घर न आऊं क्योंकि इससे आजम खान को दिक्कत होती है. जबकि सच यह है कि मुलायम सिंह हर किसी के साथ राजनीति करते हैं. अपने बेटे के साथ भी. यही उनकी समस्या है. लिहाजा, उनका विचार अपने बेटे को हटाना नहीं, बल्कि उन्हें सिर्फ सबक सिखाने का था. लेकिन हो गया उल्टा. बेटा ज्यादा चतुर निकला और उसने पिता को सबक सिखा दिया. पिता ने भी इसे बिना किसी दिक्कत के स्वीकार कर लिया क्योंकि उन्हें तो केक खाने से मतलब था, उसके टुकड़े-टुकड़े थोड़े ही करने थे.

आप किस्मत वाले हैं कि आपको राज्यसभा की सीट मिली?

मुझे अभी हाल में ही एक पत्र मिला है. इसमें कहा गया है कि अब मैं किसी पार्टी से संबद्ध नहीं हूं. यानी अब पूरी तरह स्वतंत्र हूं.

क्या आप भाजपा में शामिल हो रहे हैं? आपने कहा भी है कि हो सकता है?

मैंने ऐसा नहीं कहा. कुछ लोगों ने मुझसे इस संबंध में सवाल किया था, तो मैंने कोई जवाब नहीं दिया. अब भी कोई जवाब नहीं दे रहा हूं. अभी मेरी किसी से कोई बात नहीं चल रही है. हवा में घरौंदे बनाने का क्या मतलब है?

लेकिन मोदी सरकार से आपको काफी-कुछ हासिल हो रहा है? यादव परिवार में मचे घमासान के बाद आपकी सुरक्षा बढ़ा दी गई है?

अगर नीतीश कुमार नोटबंदी का समर्थन करते हैं तो क्या आप उन्हें भी भाजपा का एजेंट कहेंगे? वे तो रामगोपाल थे, जिन्होंने मुझे एक राष्ट्रीय टीवी चैनल पर खुलेआम धमकी दी थी कि मैं सही-सलामत घर नहीं जा पाऊंगा. इसके बाद मेरी सुरक्षा बढ़ाई गई.

उत्तर प्रदेश के चुनाव को लेकर आपका आकलन क्या कहता है?

सपा तो एक बंटा हुआ कुनबा है. अखिलेश ने पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी और अपने चाचा शिवपाल यादव के खिलाफ जिस तरह खुलेआम नफरत का प्रदर्शन किया, वह नहीं होना चाहिए था. इसका संदेश दूर तक जाएगा.

राहुल गांधी और अखिलेश यादव के एक साथ आने से क्या फर्क पड़ेगा?

मुझे लगता है कि इसमें दोनों का नुकसान है. पहली बात तो यह कि अखिलेश ने जो सीटें कांग्रेस को दी हैं, उन पर सपा का कार्यकर्ता नाराज है. दूसरी बात सपा का समर्थक मतदाता है, पिछड़ा वर्ग. जबकि कांग्रेस के समर्थकों में ज्यादातर अगड़ी जातियां हैं. ये दोनों वर्ग एक-दूसरे से उलझते रहते हैं. जहां तक मुस्लिमों का ताल्लुक है तो वे बाबरी मस्जिद ढहाए जाने का दोष कांग्रेस को भी देते रहे हैं. लेकिन अब वही कांग्रेस उस सपा के साथ है, जो मुस्लिमों की हमदर्द होने का दम भरती रही है. यह लोग कैसे स्वीकार कर पाएंगे. अखिलेश और राहुल नदी के दो किनारे की तरह हैं. वे साथ होकर भी एक नहीं हो सकते.

मुजफ्फरनगर जैसे दंगों के बावजूद मुस्लिम समाजवादी पार्टी पर भरोसा क्यों करते हैं?

हां, सपा का रिकॉर्ड भी बहुत साफ-सुथरा नहीं है. और मैं तो कहूंगा कि अगर लोग नरेंद्र मोदी के गुजरात में मुस्लिमों के कत्ले-आम पर बात करते हैं, तो उन्हें मुजफ्फरनगर में मुस्लिमों के कत्लेआम पर भी बात करनी चाहिए. इस तरह भेदभाव नहीं किया जा सकता. अगर मोदी के गुजरात में मुस्लिमों की हत्या सांप्रदायिक है तो मुजफ्फरनगर में भी है. बल्कि यहां तो और गंभीर आरोप है कि जब मुजफ्फरनगर जल रहा था, उस वक्त मुलायम सिंह और उनका परिवार सैफई में माधुरी दीक्षित, मल्लिका शेरावत और सलमान खान का नाच देख रहे थे.

आप खुद को इस वक्त कहां देखते हैं? क्या अब भी राजनीति में अपने लिए कोई बड़ी भूमिका देखते हैं?

मैंने यह सब किस्मत, परिस्थितियों और अवसरों पर छोड़ दिया है. अगर इन तीनों का साथ रहा, तो मैं कोई फैसला करूंगा. मैं 61 साल का हो गया हूं और पूरी तरह निचुड़ गया हूं. अब इससे ज्यादा निचुड़ना नहीं चाहता. अगर वैसी कोई स्थिति बनी तो मैं भाग जाऊंगा. मैं कोई संत नहीं हूं.