भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच खेली जा रही बॉर्डर-गावस्‍कर ट्रॉफी का दूसरा टेस्ट मैच शनिवार को बेंगलुरु के चिन्नास्वामी स्टेडियम में शुरू हो गया है. चार मैचों की सीरीज का पहला मैच हार चुकी भारतीय टीम के लिए यह मैच जीतना काफी अहम है. अगर, इस मैच में वह जीत हासिल करती है तो इससे उसके खिलाड़ियों का हौसला तो बढ़ेगा ही साथ ही वह इस सीरीज को जीतने की स्थिति में भी पहुंच जाएगी. इससे पहले पुणे में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ खेले गए टेस्ट मैच में हार ने भारतीय टीम सहित सभी को चौंका दिया था. मात्र एक टेस्ट में मिली यह हार चौंकाने वाली इसलिए थी क्योंकि पिछले पांच साल में अपनी सरजमीं पर कोई टेस्ट मैच न हारने वाली भारतीय टीम पहली पारी में 105 और दूसरी पारी में 107 पर सिमट गई थी.

हालांकि, इस बड़ी हार के बाद भी कोहली एंड कंपनी के पलटवार करने की क्षमता से इनकार नहीं किया जा सकता. वह टेस्ट की नंबर एक टीम है. कप्तान विराट कोहली का बयान भी आया है कि बेंगलुरु में टीम का प्रदर्शन पुणे जैसा नहीं होगा. उन्होंने यह भी कहा है कि कभी-कभी हार भी जरूरी होती है क्योंकि वह बताती है कि आपको किन चीजों पर ध्यान देने की जरूरत है. विश्लेषकों का मानना है कि फिलहाल भारतीय टीम को पांच अहम चीजों पर ध्यान देना होगा तभी वह बेंगलुरू टेस्ट में अच्छा प्रदर्शन कर सकती है.

1- सलामी जोड़ी द्वारा साझेदारी न कर पाना

टेस्ट क्रिकेट में भारतीय टीम काफी समय से सलामी जोड़ी के लंबी साझेदारी न कर पाने की समस्या से जूझ रही है. पिछले एक साल में भारतीय टीम ने इस समस्या से निपटने के लिए शिखर धवन, गौतम गंभीर और पार्थिव पटेल से भी पारी की शुरुआत कराई, लेकिन इससे निजात नहीं मिल सकी. इस समय भारतीय टीम की ओर से मुरली विजय और केएल ऱाहुल पारी की शुरुआत करते हैं. पिछले कुछ मैचों में दोनों का प्रदर्शन भले ही अच्छा रहा हो. लेकिन फिर भी ये दोनों पहले विकेट के लिए आपस में लंबी साझेदारियां करने असफल ही रहे हैं. इन दोनों की साझेदारी का औसत 19 रन प्रति पारी से भी कम रहा है. किसी मैच में यदि सलामी बल्‍लेबाज बड़ी साझेदारी करने में कामयाब होते हैं तो आगे के बल्‍लेबाजों को इस नींव के आधार पर बड़ा स्‍कोर खड़ा करने में ज्यादा परेशानी नहीं होती. बेंगलुरु टेस्ट में सलामी जोड़ी को एक बड़ी साझेदारी करनी ही होगी. हालांकि खबर लिखे जाने तक इस बार भी पुराना सिलसिला जारी रहा है. पहला विकेट 11 रन पर शुरुआती बल्लेबाज अभिनव मुकुंद के रूप में गिर चुका है.

2- मध्यक्रम के बल्लेबाजों को जिम्मेदारी लेने की जरूरत

पुणे में हुए पहले टेस्ट मैच में भारतीय मध्यक्रम ने ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों के सामने पूरी तरह से समर्पण कर दिया था. पहली पारी में मध्यक्रम के चार प्रमुख बल्लेबाज दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू सके थे. इसके अलावा इंग्लैंड के खिलाफ तिहरा शतक बनाने वाले करुण नायर की जगह विराट कोहली लगातार आजिंक्य रेहाणे को मौका दे रहे हैं. लेकिन, वे अपने खेल में निरंतरता हासिल करने और लंबी पारी खेलने में नाकाम रहे हैं. वह बांग्लादेश के खिलाफ अर्धशतक और फिर पुणे टेस्‍ट में पहली पारी में 13 और दूसरी में 18 रन बना पाए. ऐसे में रेहाणे को बेंगलुरु टेस्ट में खुद के चयन को सही साबित करने की जरूरत है. इसके अलावा बेंगलुरु टेस्ट में फॉर्म में चल रहे कप्तान विराट कोहली और चेतेश्वर पुजारा को भी पिच पर लंबा समय गुजारना होगा.

3- ऑस्ट्रेलियाई स्पिनरों को गंभीरता से खेलने की जरूरत

पुणे टेस्ट मैच में जब भारतीय टीम ऑस्ट्रेलियाई स्पिनरों के सामने ताश के पत्तों की तरह बिखर गई. तो पूर्व भारतीय बल्लेबाज सुनील गावस्कर का कहना था कि वे मान ही नहीं सकते कि भारतीय बल्लेबाज किसी कमजोरी की वजह से आउट हुए हैं. उनके मुताबिक भारतीय टीम ने ऑस्ट्रेलिया को गंभीरता से लिया ही नहीं, खासकर ऑस्ट्रेलियाई स्पिनरों को और यह लापरवाही उसे भारी पड़ी. पहली पारी में टीम के ऑलआउट होने के बाद भारतीय कोच अनिल कुंबले के बयान से भी ऐसा ही कुछ लग रहा था. स्टीव ओ कीफ़ के छह विकेट लेने के बाद भी कुंबले ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया. पहली पारी के बाद कुंबले का कहना था कि कीफ ने नियमित गेंदबाजी ही की है बस उन्होंने सही जगह पर गेंद डाली है. उन्होंने भारतीय टीम खराब प्रदर्शन का कारण एक बुरा दिन बता दिया.

हालांकि, इसके बाद कीफ ने दूसरी पारी में भी छह विकेट हासिल कर साबित कर दिया कि दिन बुरा नहीं था उनकी गेंदबाजी में ही धार है. जानकारों की मानें तो पुणे टेस्ट से पहले भारतीय टीम ने ऑस्ट्रेलियाई स्पिन गेंदबाजों को बिलकुल गंभीरता से नहीं और यही कारण था कि ऑस्‍ट्रेलिया के दो स्पिन गेंदबाज़ों ने कुल 17 विकेट लेकर भारतीय बल्लेबाजी की कमर तोड़ दी. ऐसे में भारतीय टीम को बेंगलुरु टेस्ट में ऑस्ट्रेलियाई स्पिन गेंदबाजों से सतर्क रहने की जरूरत है.

4- मिचेल स्टार्क और जोश हेजलवुड से खतरा

पुणे मैच में स्पिनरों के लिए मददगार पिच के बाद भी पहली पारी में शुरुआती तीन विकेट मिचेल स्टार्क और जोश हेजलवुड ने लिए थे. इनका शिकार बने बल्लेबाजों में कोई और नहीं बल्कि मुरली विजय, विराट कोहली और चेतेश्वर पुजारा शामिल थे. बाएं हाथ के तेज गेंदबाज मिचेल स्टार्क को पारी की शुरुआत में विकेट लेने के लिए जाना ही जाता है. साथ ही पुरानी गेंद से वे और हेजलवुड रिवर्स स्विंग कराने की क्षमता भी रखते हैं.

आईपीएल में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु की ओर से खेलने वाले स्टार्क बेंगलुरु की परिस्थितियों से भी काफी अच्छे से परिचित है. इसके अलावा बेंगलुरु की पिच पर उनकी कामयाबी की संभावना ज्यादा होने का एक कारण और भी है. पुणे की पिच पर पर आईसीसी की नाराजगी देखते हुए बेंगलुरु की पिच को लेकर बीसीसीआई काफी सतर्क है. बताया जा रहा है कि जहां पुणे की पिच एक दम सपाट थी वहीं इस पिच को लगातार पानी दिया जा रहा है और इस पर घास भी छोड़ी जा रही है. ऐसे हालात में अगर भारत पहले बल्लेबाजी करता है तो उसे मिचेल स्टार्क से काफी सतर्क रहना होगा.

5- फील्डिंग में मुस्तैदी जरूरी

पुणे टेस्‍ट में टीम इंडिया की खराब फील्डिंग भी हार का बड़ा कारण बनी थी. मैच में टीम इंडिया की फील्डिंग अपेक्षा के अनुरूप नहीं रही. ऑस्‍ट्रेलिया की दूसरी पारी में शतक बनाने वाले कप्तान स्‍टीव स्मिथ को भारतीय फील्‍डरों ने 23, 29 और 37 के व्यक्तिगत स्कोर पर तीन बार जीवनदान दिया. साथ ही पहली पारी में अर्द्धशतक बनाने वाले सलामी बल्लेबाज मैट रेनशॉ का भी एक कैच छोड़ा गया. इस खराब फील्डिंग से विराट कोहली खासे नाराज थे. मैच के बाद उनका अपने खिलाड़ियों को संदेश देते हुए कहना था कि एक लो-स्कोरिंग टेस्ट मैच में पांच-पांच कैच छोड़ने के बाद कोई भी टीम जीत की हकदार कैसे हो सकती है.

6- डीआरएस का समझदारी से इस्तेमाल

भारत लंबे समय तक डिसीज़न रिव्यू सिस्टम (डीआरएस) का विरोध करता रहा, लेकिन पिछले साल इंग्लैंड के खिलाफ पांच टेस्ट मैचों की सीरीज से वह ट्रायल के तौर पर इसे आजमाने के लिए तैयार हो गया और तब से सभी टेस्ट मैचों में यह प्रणाली अपनाई जा रही है. इंग्लैंड सीरीज के समय इस पर विराट कोहली ने कहा था कि यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है, मगर सात टेस्ट मैचों के बाद लगता है कि यह वाकई टीम इंडिया के लिए रॉकेट साइंस ही है.

इस मामले में भारतीय टीम का प्रदर्शन अब तक खराब ही रहा है. अब तक सात टेस्‍ट मैचों में टीम इंडिया ने बैटिंग या बॉलिंग करते हुए 55 बार इस सिस्‍टम की मदद ली जिसमें से उसे केवल 17 बार ही सफलता मिली है. अगर, पुणे टेस्ट की बात करें तो क्षेत्ररक्षण करते हुए विराट कोहली ने चार बार रिव्यू लिया लेकिन सभी मौकों पर वे गलत ही साबित हुए. बल्लेबाजी करते हुए लिए गए रिव्यू में भारत तीन में से केवल एक बार ही सफल रहा. जानकारों के मुताबिक डीआरएस के मामले में विराट कोहली को संयम और चतुराई दोनों दिखाने की जरूरत है क्योंकि इस तकनीक का सही इस्तेमाल मैच को पलटने की क्षमता रखता है.