आस्था पाठक होमियोपैथी मेडिसिन एंड सर्जरी की छात्रा हैं और भोपाल में रहती हैं.


मेरे लिए बचपन का मतलब यादों की वो पोटली है जो आपके बगैर चाहे भी अचानक खुल जाती है. खूबसूरत अल्हड़पन से लेकर ढेर सारी शैतानियों से भरा एक पिटारा है बचपन, जिसके ताले की चाभी सिर्फ आप के पास होती है. खूब मज़ेदार, ढेर सारी सुनहरी यादों से भरा खुशहाल बचपन मेरे हिस्से में आया था. मैं घर का सबसे बड़ा बच्चा हूं इसलिए भी मुझे सबसे ज्यादा लाड़ मिला, शाबासियां मिलीं और साथ में मार पड़ी या कहूं बलभर कुटाई भी हुई. मेरी पैदाइश मध्य प्रदेश के छोटे से शहर शहडोल में हुई और बचपन भी वहीं बीता. यह किस्सा जो मैं आज बांट रही हूं, ज्यादातर लोगों के साथ घटता होगा. आश्चर्य ही है कि यह वाकया बहुत कम उम्र में मेरे साथ घटा फिर भी मुझे याद है या शायद घरवाले जब-तब इसका जिक्र करते रहते हैं इसलिए मैं कभी इसे भूल ही नहीं पाई.

मेरे घर में पूजा-पाठ वाला माहौल था. घर पर मुझे हमेशा से पूजा, आरती, सूर्यदेव को जल चढ़ाना, संध्या-बाती देखने को मिला. सुबह 6.30 से मेरा स्कूल होता था और मैं रोजाना ठीक 6 बजे बब्बा जी (दादा जी) के साथ पूजा करती थी. रोज पूजा खत्म होते-होते आखिर में दादी बोलतीं – ‘भगवान जी से अपने लिए भाई मांग लो. उसके साथ फिर खूब खेला करना. बच्चे लोगों की बातें भगवान कभी नहीं टालते.’ और बस मैं आंख बंद करके बोलती कि ‘भाई दे दीजिये भगवान जी.’ यह करते-करते कुछ वक्त ही बीता होगा और मैंने अपना चौथा जन्मदिन मनाया ही था कि आ गए ‘भाईसाब’. मेरा परिवार शंकरजी का भक्त था और छोटा भाई भी सोमवार को ही पैदा हुआ. सबने इसे शंकरजी की कृपा समझा. मुझे भी विश्वास हो गया कि भगवान जी सच में कित्ती जल्दी सुन लेते हैं. उधर भाईसाब सोमवारी थे तो सोमू नाम पड़ गया.

बचपन में एक समय आता है जब कोई और चीज इतनी नहीं अखरती जितना घर के बच्चों में सबसे बड़े होना अखरता है. खैर, उतनी सी उमर में भाई से पहला परिचय यह हुआ कि ये भैया हैं और भगवान जी भेजे हैं. फिर मैंने देखा कि उसके साथ खूब लाड़ होने लगा है, पापा के फूले पेट - जो अब तक सिर्फ मेरी जगह थी, पर उसे सुलाया जाने लगा है. और तो और उसका सेरेलक जो मुझे भी खूब पसंद था, उसके मुकाबले मुझे नाममात्र ही मिलता. बस फिर धीरे-धीरे मुझे मेरा प्यारा भाई दुश्मन लगने लगा. उन दिनों नया-नया दांत काटना सीखा था और नोच लेना भी. भाई से दुश्मनी निकालने के लिए मैंने कभी-कभी ये तरीके भी इस्तेमाल किए. ऐसे में वह जितना जोर लगाकर रो सकता था, रोता था.

फिर भी मां जब घर के काम में व्यस्त होती तब मुझे सोमू के साथ खेलने को कह देतीं. मैं उसके पास अपनी कविता की किताब पढ़ती पर उसे तो जैसे मुझसे कोई मतलब ही नहीं था. वो तो बस सोना जानता था. चौबीस में से बीस घंटे सोता रहता था और मैं बचपन से कम सोती थी. साढ़े पांच बजे उठकर ग्यारह बजे रात ही सोती थी. मुझे उसके इतना सोने से सख्त चिढ़ थी.

इतना ही बुरा नहीं था वो, कुछ और खामियां मैंने उसमें पाई थीं. मेरे घर में सब गोरे हैं. ठण्ड के दिनों में भाई को राई के तेल से मालिश कर धूप में लिटा दिया जाता था, इससे वो काला सा होने लगा. यह देखकर मुझे बड़ा बुरा लगता. आज उस भावना को शब्दों में व्यक्त करूं तो शायद तब मुझे महसूस होता था कि भगवान जी ने तो लुटिया डुबो दी मेरी, एक भाई मिला वो भी ‘घिनहा’. फिर मन में एक नया कीड़ा जागा. भाई को भगवान जी ने भेजा है तो क्यों न भाई को भगवान के पास वापस भेज दिया जाए! इसके कारण मम्मी भी परेशान हैं. मैं तो पापा के पेट पर सो भी नहीं पाती और न ही ये मेरे साथ खेलता है.

मैं दिन-रात सोचती रहती कि इसका क्या करूं और बस बदले की आग ऐसी जली कि जब भी मौका मिलता मैं उसे उठाकर पटक देती या दांत से काट लेती. कई बार तो मुंह दबाकर मारने की भी कोशिश की थी. यह सिलसिला करीब छह-आठ महीने तक चलता रहा. शायद मेरे बुरे इरादों का मुझ पर भी बुरा असर पड़ रहा था. पहले मैं घरभर में खूब चहल-पहल करती थी, अब उदासी घेर गयी थी. घर में दादी, बब्बा, बुआ, चाचा सब रहते थे. शायद बुआ और पापा ने मेरी हरकतें नोटिस कर ली थीं. और फिर मुझे उन दिनों खुद से बात करने की आदत लगी थी तो शायद किसी ने बड़बड़ाते हुए भी सुन लिया होगा.

पापा रोज रात को कहानी सुनाया करते थे. यह सब देखने के बाद उन्होंने मुझे एक कहानी सुनाई. एक भालू की कहानी जिसके दो बच्चे थे. दोनों एक-दूसरे से नफरत करते थे. वे एक-दूसरे को मारने की कोशिश किया करते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि मां दूसरे भालू को ज्यादा प्यार करती है. फिर एक बार ज्यादा खाने के लिए दोनों ही आपस में लड़कर मर गए. कहानी कुछ समझी, कुछ नहीं, पर फिर भाई की तरफ देखा तो बुरा लगा कि मैं भी तो ऐसा ही करने वाली थी.

उसके बाद दादा जी ने बच्चों के लिए आने वाली गीताप्रेस की एक सदाचार वाली किताब में एक किस्सा पढ़ने को कहा. मैने उसे बांच दिया पर मतलब नहीं समझी तो दादाजी से पूछा. उन्होंने मुझे समझाया कि खुद के बारे में सोचकर औरों को नुकसान पहुंचाना पाप है. उन दिनों होता यह भी था कि मोहल्ले के किसी बच्चे के पास अगर कोई अच्छी खिलौना कार आ जाए तो मैं जलभुन जाती थी और उसे तोड़ने की कोशिश करने लगती थी.

पापा और दादाजी की कहानियों का असर ये रहा कि पाप-पुण्य तो नहीं, पर यह जरूर समझ आ गया कि जो मैं कर रही हूं वह ठीक नहीं है. यह बात समझ आते ही धीरे-धीरे मैं सुधरने लगी. शायद उन्हीं कहानियों का असर रहा कि वक्त के साथ मन में जो ईर्ष्या वाला कीड़ा था वो मर गया. भाई, अब वापस प्यारा भाई हो गया था. उसे देखकर लगने लगा कि अभी इतना छोटा है, तभी तो पापा-मम्मी इतना ध्यान देते हैं. और हां, प्यार तो वो मुझसे भी करते हैं. अब मैं उसके पास बैठकर छोटे-छोटे बर्तनों वाले अपने खेल में उसे भी शामिल करती. उसे पढ़ाती भी. तब से वो जब भी बीमार पड़ता, हालत मेरी खराब हो जाती. जब भाई पहली बार स्कूल गया था, एक हफ्ते तक मेरे साथ ही रहा. मुझसे चिपका रहता था.

यह लगाव फिर कभी कम नहीं हुआ, और हां उमर बढ़ने के साथ-साथ हम शरारतें करते हुए पार्टनर्स इन क्राइम भी हो गए. अब वो बीस साल का हो गया है. हम दोनों अपनी पढ़ाई के चलते अलग-अलग शहरों में रहते हैं. हम जब भी मिलते हैं ये किस्सा याद करते हैं. वह तो कुछ कह नहीं पाता पर मैं उसे बताती हूं कि उसे मारने के लिए मैंने कितने जतन किये थे. मुझे लगता है कि अगर उन दिनों मेरी समझ खोलने वाली बातें मुझे न बताई गई होतीं तो हम दोनों बड़े तो जाते, लेकिन एक दूसरे के लिए ऐसा अपनापन नहीं होता. शायद वो मेरे लिए एक अलग किस्म का कॉम्पीटिशन बन जाता. उसके अच्छे नंबर लाने पर या तरक्की करने पर शायद खुशी नहीं जलन होती. लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो बस इसलिए कि तब पापा की एक छोटी सी कहानी ने मुझे जिंदगीभर का सबक दे दिया था.