‘मेरे पिता को पाकिस्तान ने नहीं, युद्ध ने मारा’ यह लिखने वाली गुरमेहर कौर को चारों ओर से लानत भेजी जा रही है. ज़रूर उस सैनिक की आत्मा अपनी बेटी के इस पतन पर रो रही होगी, ऐसा कहा भारत के गृह राज्यमंत्री ने.

बीस साल की गुरमेहर अपने ऊपर होने वाले हमले से विचलित न हुई. उसे जब बलात्कार करके राष्ट्रवादी सबक देने की धमकी दी गई, जिसका अनेक लोगों ने मज़ा लिया, तब वह लज्जित न हुई. उलटा इससे खुद को राष्ट्रवादी कहने वालों की शर्मनाक हिंसा ज़रूर उजागर हो गई - उन्हें भारत माता की प्रतिष्ठा की उतनी फिक्र नहीं, जितना अपना दबदबा मनवा लेने की इच्छा है.

गुरमेहर ने एक वीडियो के जरिए अपनी मनोयात्रा का वर्णन किया था. उसे सुनने और समझने के लिए एक ऐसा मस्तिष्क और हृदय चाहिए जो आत्मग्रस्त न हो और दूसरों से रिश्ता बनाने को उत्सुक हो. उस वीडियो में वे बताती हैं कि उनके पिता जब कारगिल युद्ध में मारे गए, तब वे दो साल की थीं. वे बड़ी हुईं, पाकिस्तानियों से नफरत करते हुए. और भारत में पाकिस्तानियों और मुसलमानों को एक मानने का जो सहज बोध है उस वजह से ही एक बार उन्होंने बुर्का पहने एक औरत पर हमला करने तक की कोशिश की थी. तब वे सिर्फ छह साल की थीं. यह वह क्षण था, जब अपनी बड़ी होती बेटी की घृणा से चिंतित होकर उनकी मां ने उन्हें समझाया कि अगर युद्ध न होता, उनके पिता न मारे जाते. पाकिस्तानियों की कोई दिलचस्पी उन्हें मारने में न थी. यह जंग थी, जिस वजह से वे मारे गए.

गुरमेहर और उनकी मां को बेहतर शब्द के अभाव में हम शांतिप्रिय कहेंगे, ऐसे लोग जो युद्ध नहीं चाहते. उनके बारे में पढ़ते वक्त मुझे भीष्म साहनी द्वारा अनूदित चिंगेज आइत्मातोव और मोहम्मेजानेव का नाटक फूजीयामा याद आ गया. यह पांच दोस्तों की कहानी है जो अपनी उम्र छिपाकर फौज में भर्ती हो जाते हैं ताकि हिटलर की सेना से लड़ रहे अपने मुल्क की हिफाजत कर सकें. उनमें से एक साबूर कवि है.

जंग जारी है. हालांकि हिटलर की सेना को पीछे धकेल दिया गया है, लेकिन अब सोवियत फौज आगे बढ़ रही है, यूरोप को हिटलर से आज़ाद करने. इस समय साबूर के मन में युद्ध से विरक्ति के भाव उठने लगते हैं. इस वक्त को याद करते हुए एक मित्र माम्बेत बहुत बाद में कहता है, ‘...यह ...एक ऐतिहासिक दायित्व था कि हम यूरोप के लोगों को फासिज्म से आज़ाद करें. और यह हो नहीं सकता कि एक सच्चा आदमी, एक देशभक्त इस बात को न समझ पाया हो. फिर यह कैसे हुआ कि उसकी शायरी में एक धुंधली सी शांतिप्रियता घुस आई ... .मैं उससे कहा करता - साबूर, तुम यह समझने की कोशिश करो कि इतिहास की मांग है कि जंग को खत्म करने के लिए हमारा जंग करना ज़रूरी हो गया है...’

साबूर ने इसका उत्तर दिया, ‘क्या तुम कल्पना कर सकते हो कि इसके लिए हमें कितनी कीमत चुकानी पड़ेगी? कितनी जानें जाएंगी और कितनी यातना सहनी पड़ेगी?’

साबूर ने उन्हीं यातना के क्षणों में एक कविता लिखी: ‘जिस क्षण खतरे की घंटी बंद होगी / हताहत लोगों के साए उठेंगे / और वह अदृश्य भीड़ / चुपचाप बढ़ती हुई मेरी ओर आएगी / मैं उन्हें क्या कहूंगा? / इस भयानक जंग में मरने वालों को / राहत देने के लिए / मैं क्या कह पाऊंगा? / मौत ने सभी को एक समान बना दिया है / सभी हताहत, प्रत्येक हताहत / मानवजाति का पुत्र है / कोई मार्शल नहीं, कोई सैनिक नहीं... / कोई भी अपना नहीं, कोई भी पराया नहीं / हमारे ऊपर वह कौन है / जिसने आनेवाली पीढ़ियों का भाग्य निर्णीत किया है?/ मानवता के अथाह सागर में यातना की सीमाएं कहां हैं?..’

मोर्चे पर जंग के बीच युद्ध को लेकर मन में उठने वाले इस संशय के कारण साबूर गिरफ्तार कर लिया जाता है. वह जो जंग में था और दुश्मनों को मारते हुए, जिनके चेहरे में उसे अपने चेहरे दीखने लगे थे. जिसे युद्ध की निरर्थकता का अहसास होने लगा था, इसलिए इस संशय के क्षण में पर्याप्त देशभक्त न रह गया था.

वियतनाम पर हमले के समय अपने देश के खिलाफ जाते हुए अमरीका में जो युद्ध-विरोधी लहर उठी, उसका सानी नहीं. सिर्फ मोहम्मद अली ही न थे, जिन्होंने सेना में भर्ती होने से इनकार किया और सज़ा भुगती.

महमूद दरवेश जो इस्राइली हमलों के बीच कुचली जा रही और लहूलुहान फिलस्तीनी जनता की आवाज़ थे, अपने दुश्मन की आंखों में अपना चेहरा देखते थे. महमूद की इस कविता को इस तरह भी पढ़ा जा सकता है, कि वे वे एक साझा इंसानियत की कल्पना कर रहे हैं. इसमें ये जो दो आमने-सामने बैठे हैं, वे शत्रु देशों के नागरिक हो सकते हैं:

वह शांत है, और मैं भी

वह नींबू वाली चाय पी रहा है,

और मैं कॉफ़ी पी रहा हूं,

यही फर्क है हम दोनों के बीच.

उसने पहन रखी है, जैसे मैंने, धारीदार बैगी शर्ट

और मैं पढ़ रहा हूं, जैसे कि वह, शाम का अखबार.

वह मुझे नज़र चुरा कर देखते नहीं देखता

मैं उसे नज़र चुरा कर देखते नहीं देखता,

वह शांत है, और मैं भी.

वह वेटर से कुछ मांगता है,

मैं वेटर से कुछ मांगता हूं...

एक काली बिल्ली हमारे बीच से गुजरती है,

मैं उसके रोयें सहलाता हूं

और वह उसके रोयें सहलाता है....

मैं उसे नहीं कहता : आज आसमान साफ़ था

और अधिक नीला

वह मुझसे नहीं कहता : आसमान आज साफ़ था.

वह दृश्य है और द्रष्टा

मैं दृश्य हूं और द्रष्टा

मैं अपना बायां पैर हिलाता हूं

वह अपना दायां पैर हिलाता है

मैं एक गीत की धुन गुनगुनाता हूं

वह उसी धुन का कोई गीत गुनगुनाता है.

मैं सोचता हूं : क्या वह आईना है जिसमें मैं खुद को देखता हूं?

तब मैं उसकी आंखों की ओर देखता हूं,

लेकिन मैं उसे नहीं देखता...

मैं कैफे से निकल आता हूं तेजी से .

मैं सोचता हूं, हो न हो वह एक ह्त्यारा है, या शायद

वह एक राहगीर है जो सोचता हो कि मैं हत्यारा हूं

वह डरा हुआ है, और मैं भी!

युद्ध विरोध या शांतिप्रियता एक कठिन और जटिल भावना है जबकि देशभक्ति और युद्धोन्माद एक आसान भावना. आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भावनाओं का एक वर्गीकरण इस प्रकार का किया है. राष्ट्रप्रेम या देशभक्ति का अविचारित अंगीकार किया जा सकता है जबकि शांति या युद्ध विरोध के लिए एक दीर्घ और कठिन अभ्यास की आवश्यकता है.

गुरमेहर पर जो हमले हो रहे हैं, उसका एक कारण यह भी है कि हमारे समाज में शांति के आंदोलन या अभियान लगभग मर चुके हैं. भारत-चीन युद्ध के वक्त जवाहरलाल नेहरू को लेकर जो अधैर्य दिनकर में पैदा हुआ था उसका कारण भी यही था कि वे उसी आसानी के शिकार हो गए थे.

उसी दिनकर ने यह भी लिखा, ‘...दिग्विजय करने वाले योद्धा इस देश में भी बहुत हुए, किंतु भारत नाम में जो दिव्यता है उसके प्रतीक यहां अर्जुन नहीं, युधिष्ठिर रहे हैं; चंद्रगुप्त नहीं अशोक रहे हैं. और आधुनिक काल में भी भारतवर्ष की जनता का निश्छल प्रेम लोकमान्य तिलक की अपेक्षा महात्मा गांधी को अधिक प्राप्त हुआ.’

दिनकर आगे लिखते हैं ‘अगले संसार के नेता वे होंगे जो धीर और सहनशील हैं. जो समझौते और सहअस्तित्व को कायरता नहीं, धर्म मानकर वरण करते हैं.’

दिनकर को लेकिन उस कठिनाई का अहसास है जो शांतिप्रियता की भावना को हासिल करने की है. ‘मनुष्य में अभी भैंस के कितने ही लक्षण विद्यमान हैं. भैंस में भी तो यह राष्ट्रीयता ही है कि वह दूसरी भैंस को अपने खूंटे के पास नहीं आने देती. छोटी और बड़ी मनुष्यता में संघर्ष है. और इस संघर्ष में बर्बरता विजयी और मनुष्यता पराजित होती देखी गयी है, तो क्या इस भय से हम संस्कृति के विकास पर...रोक लगा दें और उतनी बर्बरता बराबर लिए रहें जो बर्बरता के वार से बचने अथवा उसे नियंत्रित करने को आवश्यक है? उत्तर के लिए हमें चाणक्य-नीति के नहीं, अपने हृदय के पन्नों को उलटना चाहिए... :

पग-पग पर हिंसा की ज्वाला, चारों ओर गरल है;

मन को बांध शांति का पालन करना नहीं सरल है.

तब भी जो नरवीर असिव्रत (बेहद मुश्किल काम) दारुण पाल सकेंगे,

वसुधा को विष के विवर्त (चक्कर) से वही निकाल सकेंगे.’

गुरमेहर अगर कह पाती दिनकर को सिर्फ इतना कि असिव्रत का पालन नरवीर नहीं कर पा रहे हैं, ये स्त्रियां हैं जो यह कर रही हैं और ऐसा करने के लिए नर-घृणा का वार सह रही हैं.