वाहन कंपनियां आमतौर पर लोगों के ध्यान में तब आती हैं जब वे किसी सेगमेंट में नया वाहन लॉन्च करती हैं. लेकिन भारत के कार बाजार में एक ऐसी कंपनी भी है जिसे गाड़ियों से ज्यादा सेगमेंट लॉन्च करने के लिए जाना जाता है. देश की पहली यात्री कार इंडिका और सूमो जैसी दमदार मल्टी यूटिलिटी व्हीकल से लेकर दुनिया की सबसे सस्ती कार नैनो तक, भारत में अधिकतर सेगमेंट्स की पहल का श्रेय टाटा मोटर्स के नाम है.

इस भारतीय वाहन कंपनी का सफर देश की आजादी के साथ ही शुरु हुआ था. टाटा मोटर्स की मूल कंपनी टाटा इंजिनियरिंग एंड लोकोमोटिव कंपनी (टेल्को) सन् 1945 में अस्तित्व में आयी थी. उस जमाने में टेल्को को रेल के इंजन बनाने के लिए जाना जाता था. लेकिन यह कंपनी सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं रहना चाहती थी. इसका सपना भारत की पटरियों के साथ यहां की सड़कों पर भी अपना आधिपत्य जमाने का था. इस दिशा में काम करते हुए टाटा ने व्यापारिक वाहनों के निर्माण की तरफ कदम बढ़ाना शुरु किया. 1970 आते-आते टेल्को इस श्रेणी के वाहन बाजार में शीर्ष पर आ गयी. आलम यह था कि सड़क पर हर तीन में से दो ट्रक टाटा के दिखाई देते थे. इस सफलता ने टाटा के सपने को जबरदस्त प्रोत्साहन दिया.

लेकिन 1980 के बाद देश की अर्थव्यवस्था के खुलने के साथ ही विदेशी कंपनियां भारत में आने लगी थीं. इसके चलते टाटा मोटर्स के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ती गयी और इसके शेयर नीचे आते गए. आर्थिक तौर पर अपनी मजबूती और बाजार के शीर्ष पर स्थान बनाए रखने के लिए टाटा ने यात्री कारों के निर्माण की तरफ रुख करने का फैसला लिया. सन् 1990 में टेल्को ने 1700 करोड़ रूपए का निवेश कर एक और कंपनी को खड़ा किया जो पूरी तरह से स्वदेशी यात्री कार बनाने के लिए समर्पित थी. इसी कंपनी को बाद में टाटा मोटर्स के नाम से जाना गया. टाटा मोटर्स बनने के बाद से ही साल दर साल अपनी नई गाड़ियों के साथ सेगमेंट और बाजार में दस्तक देती रही.

पिछले करीब ढाई दशक में टाटा ने कई कारें लॉन्च की हैं
पिछले करीब ढाई दशक में टाटा ने कई कारें लॉन्च की हैं

लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना था कि टाटा ने यह कदम उठाकर बड़ी गलती कर दी थी. हालांकि शुरुआत में इंडिका की रिकॉर्ड सेल ने इन सभी पूर्वानुमानों को एक बार तो गलत साबित कर दिया. लेकिन धीरे-धीरे वे सभी आशंकाएं सही साबित होने लगीं. समय के साथ टाटा हर बार अपने ही चालू किये सेगमेंट में पिछड़ने लगी और दूसरी कंपनियां उसका फायदा उठाने में सफल रहीं. हाल ही में खबर आई है कि मई 2017 में टाटा मोटर्स की बिक्री में बीते साल के मुकाबले करीब साढ़े चार फीसदी की गिरावट देखने को मिली है.

ऐसे में यह निश्चित तौर पर सोचने का विषय है कि देश की शीर्ष कंपनी जिसके पास तमाम संसाधनों के साथ गाड़ियों की इतनी बड़ी रेंज मौजूद है, वह इस तरह हर बार पिछड़ क्यों जाती है? यदि ऐसा सिर्फ एक या दो बार होता तो इसे इत्तेफाक माना जा सकता था. लेकिन जिस तरह टाटा हर बार उस पायदान से नीचे खिसकती गयी (जहां उसे होना चाहिए था) उसने यह साबित किया कि कहीं ना कहीं यह कंपनी अपने ही देश के ग्राहकों को समझने में बड़ी चूक कर रही है. विशेषज्ञ इस चूक के पीछे कई कारणों को जिम्मेदार मानते हैं.

महत्वाकांक्षाएं

टाटा को इस वाहन श्रेणी में अपेक्षाकृत परिणाम न मिलने के पीछे जानकार इसकी महत्वाकांक्षाओं को प्रमुख रूप से जिम्मेदार ठहराते हैं. उनका मानना है कि टाटा सबसे छोटी कार नैनो से लेकर हेक्सा जैसी क्रॉसओवर तक हर सेगमेंट में अपनी उपस्थिति चाहती है. इसके अलावा व्यापारिक वाहनों के कई बड़े सेगमेंट में भी टाटा ने अपने पैर फंसा रखे हैं, जो कि टाटा का प्रमुख बाजार है. ऐसे में ज्यादा सेगमेंट में उलझने के कारण टाटा मोटर्स अपनी हर गाड़ी की परफॉर्मेंस पर फोकस नहीं कर पाती है और इसकी गाड़ियों की गुणवत्ता प्रभावित होती है. आंकड़ों पर ध्यान दें तो बाजार में टाटा की तुलना में कहीं ज्यादा यात्री गाड़ियां मारूति की हैं. लेकिन इनकी खासियत यह है कि इनमें से अधिकतर गाड़ियां सिर्फ दो ही सेगमेंट में हैं. इसके चलते मारूति अपनी गाड़ियों पर ज्यादा ध्यान देने के साथ इसका सीधा फायदा उठाने में सफल रहती है जबकि टाटा इस मामले में असफल मानी जाती है.

छवि

अधिकतर लोगों के जेहन में टाटा की छवि लोडिंग और टैक्सी वाहन बनाने से जुड़ी हुई है. ऐसे में भारत जैसे देश में जहां आज भी गाड़ियां विशेषज्ञों की बजाय रिश्तेदारों और दोस्तों से पूछ कर ली जाती है वहां टाटा को इस बात का नुकसान उठाना पड़ता है. कई बार देखने में आता है कि जो लोग गाड़ियों के बारे में कुछ खास नहीं जानते, वे भी सिर्फ इसी छवि के चलते टाटा की गाड़ी न खरीदने की सलाह देकर ग्राहक का ध्यान दूसरे विकल्पों की तरफ ले जाते हैं.

इसके अलावा टाटा का भारतीय कंपनी होना भी कभी-कभी इसके लिए घाटे का सौदा साबित होता है. लोगों के बीच एक धारणा यह भी है कि विदेशी गाड़ियों की परफॉर्मेंस और उनके फीचर्स अपेक्षाकृत बेहतर होते हैं. ऐसे में आम ग्राहक टाटा की बजाय बाहरी कंपनियों की गाड़ी खरीदना ज्यादा उचित समझता है.

रणनीति में कमी

कई जानकारों का मानना है कि भारत की होने के बावजूद टाटा देश के बाजार को कई बार नहीं समझ पाती और गलत रणनीतियां बना देती है. उदाहरण के तौर पर भारत जैसे देश में जहां आज भी कार को सुविधा से ज्यादा शान का प्रतीक समझा जाता है वहां टाटा ने नैनो को देश की सबसे सस्ती कार बताते हुए प्रमोट किया. जानकारों के मुताबिक कोई अपने नाम के साथ सबसे सस्ती गाड़ी का टैग नहीं जोड़ना नहीं चाहता. इस गलती का सीधा खामियाजा टाटा को उठाना पड़ा जिसे बाद में खुद रतन टाटा ने भी स्वीकार किया.

इसके अलावा जानकारों का एक वर्ग यह भी मानता है कि टाटा मोटर्स अपनी गाड़ियों की मार्केटिंग और उनके विज्ञापन में भी संतुलन नहीं बना पाती है. नई गाड़ियों की बात की जाए तो मध्यमवर्गीय परिवार के बजट को ध्यान में रखते हुए तैयार हुई टिएगो के विज्ञापन के लिए टाटा ने लियोनल मेसी जैसी शख्सियत को चुना. जानकारों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस चमकते खिलाड़ी की फेसवेल्यू बहुत है, लेकिन भारत के मध्यमवर्गीय परिवारों को मेसी उतना प्रभावित नहीं कर पाते हैं. उनका मानना है कि मेसी से काफी कम कीमत पर टाटा को कोई ऐसा चेहरा मिल जाता जो भारत के मध्यम वर्ग में ज्यादा जाना-पहचाना होता और उन्हें ज्यादा प्रभावित कर पाता. वहीं कई लोगों की यह शिकायत भी है कि अपने सेगमेंट में हाई फीचर्स से लैस जेस्ट के लिए टाटा ने उतना प्रचार नहीं किया जिससे इसे एक सेमीलग्जरी गाड़ी की तरह पेश कर लोगों को लुभाया जा सकता था.

लंबे समय ढर्रे में कोई बदलाव नहीं

कहा जाता है कि भारत विश्व में सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में एक है. जहां बदलाव कम समय में ही आ जाता है. जबकि ग्राहकों की मानें तो टाटा ने सालों तक अपनी गाड़ियों में कोई खास बदलाव नहीं किया. उसका अधिकतर ध्यान पुरानी गाड़ियों को अपडेट करने के बजाय ज्यादा से ज्यादा गाड़ियां लॉन्च करने में लगा रहा. यही कारण था सूमो जैसी लोगों की पसंदीदा गाड़ी भी बदलाव की रेस में दूसरों से पीछे रह गई और (टोयोटा) इन्नोवा और (महिंद्रा) बोलेरो जैसी गाड़ियों ने इसकी जगह ले ली.

जानकारों के मुताबिक डिजाइन के मामले में भी टाटा दूसरी कंपनियों से बहुत पीछे रह जाती है. इंडिका जैसी हैचबैक कार से लेकर आरिया जैसी क्रॉसओवर तक टाटा की सभी गाड़ियों का लगभग एक सा लुक आता है और ग्राहकों को एक बड़े वर्ग को इसलिए भी टाटा की गाड़ियों से हिचक होती है. हालांकि टिएगो और हाल में टिगोर के लांच से टाटा ने इस मोर्चे पर बड़ा बदलाव करने की कोशिश की है

ज्यादा मेंटनेंस और कीमत

अक्सर लोग टाटा की गाड़ियों की मेंटेनेंस को लेकर शिकायत करते हैं. एक यह भी बड़ा कारण है कि सामान्य ग्राहक टाटा की कार खरीदने से बचता है. देश का पहला स्पोर्ट्स यूटिलिटी व्हीकल (एसयूवी) सफारी अपने दमदार लुक और तमाम खूबियों के बाद भी इसी धारणा के चलते अपेक्षाकृत प्रचलन में नहीं है और महिंद्रा स्कोर्पियो इस बात का सीधे फायदा उठाती नजर आती है.

मेंटेनेंस के अलावा ग्राहकों को टाटा से एक शिकायत और है और वह है इसकी कीमत. लोगों को लगता है कि जब कोई गाड़ी देश में बन रही है तो सस्ती ही होगी. ऐसे में एक ही सेगमेंट में किसी देशी गाड़ी की विदेशी कंपनियों की तुलना में बराबर या उससे ज्यादा कीमत चुकाना ग्राहकों को ज्यादती लगती है. लेकिन जानकारों के मुताबिक सच्चाई यह है कि भारत में विनिर्माण के चलते कई बार संसाधनों की लागत ज्यादा बैठती है और वाहन की कीमतें बढ़ जाती है. ऐसा ही कुछ टाटा की बहुप्रतीक्षित क्रॉसओवर आरिया के मामले में देखने को मिला था. इस गाड़ी को टाटा ने इनोवा की टक्कर में उतारा था लेकिन ज्यादा कीमत के कारण ग्राहकों ने इस शानदार गाड़ी को खारिज कर दिया था. फिलहाल इस यदि हेक्सा की बात की जाए तो फीचर्स के लिहाज से टाटा ने इस गलती को सुधार लिया है.

ग्राहकों के प्रति लापरवाही

टाटा से जुड़ चुके ग्राहकों की सबसे बड़ी शिकायत रहती है कि यह कंपनी सर्विस आफ्टर सेल देते समय ‘चलता है’ जैसा रूख अपना लेती है. यह लोगों को कतई गवारा नहीं होता. गौर करने वाली बात यह भी है कि दूसरी अधिकतर कंपनियों से लगभग एक सा आर्थिक वर्ग जुड़ा होता है क्योंकि उनके पास चुनिंदा सेगमेंट होते हैं. लेकिन टाटा मोटर्स के साथ ऐसा नहीं है. इस कंपनी से जुड़े ग्राहकों के वर्ग में इसकी गाड़ियों की ही तरह एक बड़ा अंतर देखने को मिलता है. लखटकिया नैनो से लेकर सबसे ज्यादा टैक्सी में चलने वाली इंडिका-इंडिगो सहित सफारी और आरिया तक को खरीदने वाले ग्राहक टाटा के सर्विस सेंटर आते हैं. ऐसे में छोटी गाड़ियों के मालिकों को लगता है कि सर्विस के दौरान उनकी गाड़ियों की उपेक्षा की जारही है. जबकि सेंटर पर एकसमान प्रतिक्रिया के कारण बड़ी गाड़ी के मालिकों के मन में अलग तरह की शिकायतें पैदा होती हैं.

ऐसे में कई ग्राहक और जानकार भी सुझाव देते हैं कि टाटा मोटर्स को कम से कम दो कैटेगरी के सर्विस सेंटर बनाने चाहिए. इसका पहला फायदा तो यह होगा कि वर्तमान सेंटरों से गाड़ियों का भार कम हो जाएगा. और दूसरे हर वर्ग के ग्राहक पर ज्यादा ध्यान दिया जा सकेगा जिससे लोगों का असंतोष कम होगा.

ज्यादा आवाज और कम रीसेल वैल्यू

टाटा मोटर्स की गाड़ियों के साथ ग्राहकों को कम गुणवत्ता की शिकायत भी रहती है. इसमें ज्यादा पैनल गैप से लेकर प्लास्टिक तक तमाम चीजें शामिल हैं. कई शिकायत करते हैं कि टाटा की गाड़ियों को खरीदने के कुछ ही समय के अंदर उनमें खटर-पटर होने लगती है. हालांकि यह एक सामान्य समस्या है जो दूसरी कंपनियों के साथ भी हो सकती है, लेकिन टाटा के साथ यह कुछ ज्यादा ही है. साथ ही जब पहले से किसी कंपनी को लेकर ग्राहकों के मन में संशय हो तो ऐसे में छोटी से छोटी कमी भी उस कंपनी के प्रति अंसतोष पैदा करने के लिए काफी रहती है. इसके अलावा टाटा की गाड़ियों की रीसेल वैल्यू कम होने की भी शिकायत होती है जो कि उनके न खरीदे जाने की एक और प्रमुख वजह बन जाती है.

एक अनुमान के मुताबिक पिछले 10-15 सालों में जिस तरह से भारत के कार बाजार में बढ़ोतरी हुई है उस हिसाब से अगले एक दशक बाद विश्व में सर्वाधिक कारों की खपत यहीं होगी. ऐसे में बाजार में अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखने के लिए टाटा मोटर्स को अपनी नीतियों से लेकर गाड़ियों की गुणवत्ता में बदलाव की सख्त जरूरत है. हालांकि टाटा की नई गाड़ियों जैसे टिएगो, टिगोर जेस्ट या हेक्सा की तरफ नज़र डालें तो लगता है कि टाटा अब इस दिशा में पहले से ज्यादा गंभीरता बरत रही है. अब देखने वाली बात यह है कि नई कारों के साथ टाटा फिर नई छलांग लगाएगी या फिर हर बार की तरह इस बार भी ग्राहक जल्द ही टाटा को टाटा कह देंगे.