लोदी उपवन के पड़ोस में, थोड़ी देर के लिए, सनातन संगीत संस्कृति और इंटरनेशनल संटर ने मिलकर, अपने हरे और प्रफुल्‍ल परिसर में, शब्दों का एक उपवन सजाया, ‘वर्ड्स इन द गार्डन’ नाम से. इधर सार्वजनिक संसार में शब्दों का ऐसा व्यापक, अथक और निर्लज्ज दुरुपयोग और अवमूल्यन हो रहा है कि शब्दों के लिए साहित्य और विचार के अलावा, लगता है, कहीं जगह ही नहीं बची है. इसलिए इस उपवन का महत्व और बढ़ गया. यह याद दिलाने के लिए कि शब्द हमें याद दिलाते हैं, सचेत करते हैं, सोच-विचार के लिए विवश करते हैं, हमें अपनी सहज मानवीयता का अहसास कराते हैं और इनके माध्यम से हम दी हुई दुनिया से अलग एक वैकल्पिक दुनिया की कल्पना भी करते हैं.

आयोजन शहर, प्रकृति, प्रेम और अकेलेपन पर केंद्रित था और उसके सभी सत्रों के शीर्षक उर्दू के महाकवि मीर तकी मीर की शायरी से चुने गये थे. याद आता रहा कि यह दिल्ली मीर की दिल्ली थी और अब रोज इस अराजक होते जा रहे शहर में मीर भी था. सौभाग्य से सारे वक्ता लेखक, कलाकार, चिंतक, समाजशास्त्री आदि थे और राजनेताओं को जानबूझकर इस आयोजन से दूर रखा गया. इसने भी यह याद दिलाया कि सत्ता और राजनीति से आक्रांत दिल्ली में सोचने-विचारने, रचने-सहेजने, प्रश्न पूछने, उत्तरों की खोज करने, विकल्प के सपने देखने, असहमत होने वाले लोग भी हैं और यह दिल्ली उनकी भी है.

दो-एक अपवादों को छोड़कर इस आयोजन में भाग लेने वाले सभी प्रतिभागी दिल्ली के ही थे. उनमें से अनेक ऐसे हैं जो मूलतः दिल्ली के भले न हों, दशकों से यहां रहते हैं और राजधानी के सांस्कृतिक-बौद्धिक परिसर के उल्लेखनीय अंग रहे हैं. खुद दिल्ली को भी याद दिलाने की ज़रूरत है कि उसकी संपदा कितनी सघन-उत्कट-समृद्ध है और वह सत्ता और संपत्ति तक महदूद नहीं है.

जो बातचीत अनेक सत्रों में हुई उससे यह स्पष्ट होता है कि दिल्ली भारतीय वैचारिक और सर्जनात्मक बहुलता का भी एक जीवंत संस्करण है. यह नोट करना दिलचस्प है कि यह बहुलता-विपुलता दिल्ली के सार्वजनिक संस्थानों में, विशेषतः सरकार-पोषित संस्थानों में घट रही या सुनियोजित ढंग से घटायी जा रही है जबकि अनेक निजी प्रयत्न इसे पोसने-बचाने के लिए, सौभाग्य से, किये जा रहे हैं.

किसी तरह की सहमति पर पहुंचने या एकतान होने की कोई कोशिश के बजाय यह तरह-तरह की दृष्टियों और शैलियों का, असहमति और विवेक का एक वाद्यवृंद जैसा बन गया. इस उपवन में अनेक शब्दों के लिए जगह थी,उनका स्वागत और आदर था.यहांहिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी, पंजाबी और मलयालम भाषाओं का प्रतिनिधित्व था.इसने गहरे यह अहसास करायाकि हम सत्ता, रौबदाब के स्थापत्य के पड़ोस भर में नहीं ज्वलंत विचारों और सृजनशीलता के पड़ोस में भी इस शहर में रहते हैं.

मुक्तिबोध जितने बड़े राजनैतिक कवि हैं, उससे कहीं बड़े नैतिक कवि हैं

अपने वयस्क जीवन के आरंभ में मुक्तिबोध कुछ दिन ‘हंस’ में त्रिलोचन के साथ काम करते हुए बनारस में रहे थे. उसी बनारस में पिछले सप्ताहांत काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग ने मुक्तिबोध जन्मशती के सिलसिले में ‘मुक्तिबोध: सृजन और वैचारिकी का आत्मसंघर्ष’ विषय पर तीन दिनों का एक आयोजन किया. हिंदी अकादेमिक दुनिया में जिस तरह की भी मीडियोक्रिटी, कामचलाऊपन और अनुष्ठानपरकता हावी है, उससे यह आयोजन पूरी तरह मुक्त था. मैं इसमें कुल पांच ही सत्र सुन पाया लेकिन वे काफ़ी थे यह आश्वस्त कराने के लिए कि अगर शती-आयोजन में परिश्रम, कल्पनाशीलता और सुविचारिता से काम लिया जाये तो अच्छे नतीजे निकल सकते हैं. सभी निबंध और प्रस्तुतियां तैयारी और अध्यवसाय के साथ की गयीं. जिस ज़माने में मुक्तिबोध जीवित-सक्रिय थे उस ज़माने में अकादेमिक जगत में उनकी रत्ती भर जगह नहीं बन पायी थी. वही जगत्, अपने बहुमुख पतन के इन दिनों में उन्हें गंभीरता से ले रहा है और उसके पास कुछ विचार-जिजीविषा और जिज्ञासा बची हुई है.

सुखद अचरज की बात यह भी थी कि बड़ी संख्या में युवा छात्र और शोधार्थी इस आयोजन में उपस्थित थे. कविता पाठ के अलावा कुछ सत्रों में प्रेमचंद सभागार ठसाठस भरा रहा. अरुण कमल, राजेश जोशी, कुमार अम्बुज, प्रफुल्ल शिलेदार, बद्रीनारायण, सविता सिंह, अनुज लुगुन, व्योमेश शुक्ल आदि की कविताओं को ध्यान और सराहना के साथ सुना गया. बराबर लगता रहा कि जैसे स्पिक मैके संस्था युवा छात्रों के बीच शास्त्रीय संगीत और नृत्य के लिए रसिकता उपजाने का अभियान दशकों से सफलापूर्वक चला रही है वैसा ही अभियान कविता की रसिकता उकसाने-फैलाने के लिए किया जा सकता है. अगर पहल की जाये तो रज़ा फाउंडेशन उसमें कुछ मदद करने को तैयार है.

शम्भुनाथ, बद्रीनारायण, सविता सिंह, अरुण कमल, राजेश जोशी, कुमार अम्बुज, अनुज लुगुन, जयप्रकाश, मनोज कुमार सिंह आदि ने हमारे लोकतंत्र, मध्यवर्गीय समाज, नेहरू युग, वंचित वर्ग, स्त्रियों, विचारधारा, विश्व कविता, इतिहास आदि के संदर्भ में मुक्तिबोध के साहित्य, दृष्टि, विचार आदि की प्रासंगिकता की सुघर पड़ताल की. मैंने अपने किंचित् लंबे वक्तव्य में कुछ प्रश्न उठाये जिनमें प्रमुख यह था कि गांधी की तरह मुक्तिबोध का नामजाप बहुत होता है लेकिन उनके पथ पर कोई चलता नहीं है - शायद वैसा पथ बना ही नहीं क्योंकि अंततः मुक्तिबोध हिंदी साहित्य में एक बीहड़ का नाम है. मुक्तिबोध की राजनीति पर इतनी बात हुई है कि उनकी नीति पर ध्यान नहीं गया है. उनका अपना एक अध्यात्म भी है: उस अध्यात्म को गढ़ा है मुक्तिबोध के आत्माभियोग, आत्मसंशय, आत्मसंघर्ष, अंत:करण और सत्-चित्-वेदना पर आग्रह ने. यह पहचानने का समय आ गया है कि मुक्तिबोध जितने बड़े राजनैतिक कवि हैं, उससे कहीं बड़े नैतिक कवि हैं. हमारे समय में आत्मा के गुप्तचर और सहचर साथ-साथ.

आज लोकतंत्र का उपयोग तंत्र की खातिर लोक की बलि चढ़ाने के लिए भी किया जा रहा है

इन दिनों सत्ताधारी बड़े नेता हमें यह बताने में लगे हैं कि हमारे देश को, देशभक्ति को, हमारी सुरक्षा को बड़े ख़तरे पैदा हो गये हैं. सही है कि लोकतंत्र एक अर्थ में हमेशा ख़तरे में रहता है और हमें उसके प्रति सजग रहना चाहिये. पर ढाई-तीन वर्ष से हमारे विश्वविद्यालयों के परिसरों में अचानक ही अनेक राष्ट्र विरोधी तत्व सिर उठाने लगे हैं. एक छात्रा के यह इसरार करने पर कि वह ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् से नहीं डरती’, सांसद और मंत्री को देश की सुरक्षा ख़तरे में पड़ती दीखने लगी है. विडंबना यह है कि इस छात्रा पर जो शाब्दिक हमले हो रहे हैं, उसे हत्या और बलात्कार की धमकियां मिल रही हैं उन पर पुलिस कोई कार्रवाई नहीं कर रही है. आपातकाल को छोड़कर पुलिस इतनी पक्षधर पहले कभी नहीं हुई थी. हमारी सुरक्षा को असली ख़तरा तो पुलिस की निष्क्रियता से है. इस सिलसिले में दिल्ली पुलिस का, जो केंद्र सरकार के सीधे नियंत्रण में है, आचरण दुर्भाग्य से बेहद निंदनीय साबित हो रहा है.

इस बात को अलक्षित नहीं जाने दिया जा सकता कि जबसे केंद्र में भाजपा सरकार आयी है नागरिक जीवन में बहुत सारे छद्म प्रश्न सिर उठा रहे हैं. उनकी एक सीरीज जैसी चल रही है जिन पर नागरिकों को लगातार बांटने, उनमें दुराव पैदा करने की मुहीम बहुत सोची-समझी रणनीति के तहत चलायी जा रही है. ग़रीबी और बेरोज़गारी से ध्यान और प्रयत्न हटाकर जो समस्याएं उठायी जा रही हैं वे ऐसी मानसिकता पैदा कर रही हैं जिसमें हत्या, हिंसा, प्रहार, बदला आदि बढ़ने लग रहे हैं. हर नागरिक मानो शक के घेरे में आ रहा है. लोकतंत्र का उपयोग तंत्र के लिए लोक को अवमूल्यित करके उसकी बलि चढ़ाने के लिए भी किया जा रहा है.

आचार्य अमर्त्य सेन ने, उचित ही, इसे रेखांकित किया है कि देश के कुल 31-32 प्रतिशत मत प्राप्त करने वाली सत्ता बाक़ी लगभग सत्तर प्रतिशत भारतीयों की देशभक्ति नापने-जोखने का अधिकार खुलेआम हड़प रही है. सच तो यह है कि जो शक्तियां - वे राजनैतिक हों, वैचारिक हों, धार्मिक या आध्यात्मिक हों - इस समय अपने वचनों और कर्मों से भारतीय परंपरा की बहुलता, असहमति और विवेक की वृत्तियों को, भारतीय संविधान और लोकतंत्र की इस संदर्भ में बुनियादी प्रतिज्ञाओं को - जिनमें स्वतंत्रता-समता-न्याय के मूल्य अन्तर्भूत हैं - खंडित या बाधित कर रही हैं असली देशद्रोही हैं. वे हैं जो भारतीय परंपरा, भारतीय संविधान और भारतीय लोकतंत्र के विरुद्ध युद्ध छेड़ रहे हैं और उन्हें दंडित किया जाना चाहिये. पर ऐसा करते समय भी उनकी असहमति और प्रश्नांकन के अधिकार की, न्याय के साथ, रक्षा की जाना चाहिये. ऐसी शक्तियों का विरोध सिर्फ़ चुनाव के द्वारा किया जाये यह ज़रूरी नहीं है. इसके लिए एक बौद्धिक, वैचारिक और सांस्कृतिक अभियान व्यापक ढंग से चलाया जा सकता है.