धड़धड़ाती हुई ट्रेन गुज़र रही थी कि तभी सोता हुआ 13 साल का बच्चा अपनी मां से लिपट गया और रोने लगा. ‘अम्मी, मुझे रेलगाड़ी से बहुत डर लगता है. वापस अपने घर चलो ना?’

सरदार बेगम की आंखें कुछ और फैल गयी थीं. वे उस छोटे से कमरे में न होने वाली किसी परछाई को भांपने की कोशिश कर रही थीं. उन्होंने बच्चे को कसकर सीने से लगा लिया. ट्रेन गुज़र चुकी थी पर सीटी की आवाज़ अभी भी दोनों के कानों के अंदर घुसकर दिमाग़ों को झनझना रही थी. ‘अम्मी, मैं अब्बा की गालियां और मार रोज़ खा लूंगा, उफ़ तक नहीं करूंगा. पर चलो, ख़ुदा के वास्ते चलो यहां से.’

‘अब यही अपना घर है और यहीं रहना है हमको, बेटा’ मां ने जैसे ऐलान कर दिया. ‘अपने अब्बा को भूल जाओ. वो ज़ालिम इंसान है. क्योंकि वो तुमसे नफरत करता हैं, उसने तुम्हे जान से मारने का अहद (प्रण) किया है.’ सरदार बेगम एक सांस में सब कह गयीं और आंखों से आंसू गिरने लगे. मां को रोता देख अब्दुल हई जोर-जोर से रोने लगा. ‘अम्मी, वादा करो तुम मुझे कभी छोड़ कर न जाओगी.’

‘मैं वादा करती हूं मेरे बच्चे.’

बक़ौल निदा फ़ाज़ली ‘हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी, जिसको भी देखना कई बार देखना.’ यक़ीनन बचपन के हादसे अब्दुल हई की आने वाले ज़िंदगी की अक्कासी थे. जब वह साहिर लुधयानवी के नाम से दुनिया में नुमूदार हुआ तो उसमें कई ‘साहिर’ नुमायां हुए. कहीं अधूरा तो कहीं मुकम्मल साहिर, कभी बेबाक तो कहीं अकेले घर से न निकलने वाला डरा-सहमा साहिर, मां से बेपनाह मोहब्बत करने वाला तो कहीं माशूक़ों का दिल तोड़ने वाला साहिर. कभी परचम पर लिखने वाला तो कहीं बरबत (एक अरबी वाद्ययंत्र) पर गाने वाला साहिर. आइये, ऐसे कुछ साहिरों से आपको मिलवाता हूं.

अदीबों का साहिर

24 की उम्र में साहिर लुधियानवी की किताब ‘तल्ख़ियां’ बाज़ार में आ चुकी थी और तकरीबन उन्होंने शोहरत की बुलंदियां हासिल कर ली थीं. वे उर्दू अख़बार ‘अदबे-लतीफ़’, ‘शाहकार’ और ‘सवेरा’ के मुदीर (संपादक) बन चुके थे. ‘सवेरा’ में उन्होंने हुकूमते-पाकिस्तान के ख़िलाफ़ लिखकर आफ़त मोल ले ली और नतीजतन उनके नाम गिरफ़्तारी का वारंट जारी हो गया. वे हिंदुस्तान चले आये और आकर प्रोग्रेसिव राइटर्स की जमात में शामिल हो गए. 50-60 के दशकों में मज़दूर संगठन, लाल सलाम, दरांती-हथौड़ा हर तरक़्क़ी पसंद शायर के शग़ल थे और सब फ़ैज़ अहमद, पाब्लो नेरुदा से मुतास्सिर. साहिर पर भी फ़ैज़, और मजाज़ का ख़ासा प्रभाव पड़ा. लिहाज़ा फ़ैज़ की ‘मुझसे पहले सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग’, या, ‘बोल के लब आज़ाद हैं तेरे ‘ की तर्ज़ पर उन्होंने कई कलाम लिखे. ‘किसी को उदास देखकर’ पढ़ने के बाद इस बात पर आप यक़ीन कर सकते हैं. कुछ इक्तिसाबात (अंश) पेशे-नज़र हैं

‘...मैं और तुम से तर्के-मोहब्बत की आरज़ू

दीवाना कर दिया है ग़मे-रोज़गार ने...’ (और फिर फ़ैज़ के अंदाज़ ही में पलटते हुए)

‘तुम्हारे ग़म के सिवा और भी ग़म हैं मुझे

नजात जिनसे में एक लमहा पा नहीं सकता

ये कारख़ाने में लोहे का शोरो-गुल जिसमें

है दफ़्न लाख़ों ग़रीबों की रूह का नग़मा।...’

फ़ैज़ की नज़्म, ‘हम देखेंगे’ की तर्ज़ पर उनकी ‘आवाज़े-आदम’ है. साहिर का ज़िक्र ये भी है कि उन्होंने ‘परछाइयां’ के उन्वान (शीर्षक) से एक नज़्म लिखी है. ये उनकी सबसे बड़ी नज़्म है और जंग के माहौल का आईना है. इस नज़्म के चंद आख़िरी शेर पेश किये बग़ैर मुझे सुकून नहीं मिलेगा:

‘...गुज़िश्ता जंग में घर ही जले मगर इस बार

अजब नहीं कि ये तन्हाइयां भी जल जाएं

गुज़िश्ता जंग में पैकर जले मगर इस बार

अजब नहीं कि ये परछाइयां भी जल जाएं

तसव्वुरात की परछाइयां उभरती हैं!’

दोनों लगभग एक ही समय के शायर हुए हैं. साहिर का दिल भी मज़दूर और मज़लूमों के लिए धड़का तो सही और एक बार तो ऐलान भी कर दिया कि

‘...आज से ऐ मज़दूर किसानो! मेरे राग तुम्हारे हैं

फ़ाक़ाकश इंसानों! मेरे जोग-बिहाग तुम्हारे हैं

आज से मेरे फ़न का मक़सद ज़ंजीरें पिघलाना है

आज से मैं शबनम के बदले अंगारें बरसाऊंगा...’

पर फिर बाद में रोमांटिक शायरी की तरफ झुक गए. वो फ़ैज़ की तरह साम्यवाद के झंडाबरदार नहीं रहे. कैफ़ी आज़मी ने साहिर लुधियानवी के इसी मिज़ाज पर तंज़ कसते हुए कहा था कि उनके दिल में तो परचम है पर उनकी क़लम काग़ज़ पर मोहब्बत के नग़मे उकेरती है. साहिर के दोस्त और कहानीकार, प्रकाश पंडित ने कैफ़ी की बात को ग़लत साबित करने की नाकाम कोशिश उनकी नज़्मों पर अपने संकलन में की है.

साहिर के अंदर आये इस बदलाव को समझने के लिए उस दौर पर एक नज़र डाली जाए. 60 के दशक में रूस के कम्युनिस्ट लीडर निकिता ख्रुश्चेव ने स्टालिन के ख़िलाफ़ बोलकर और सोवियत रूस की अंदरूनी नीतियों में बदलाव करके साम्यवाद के अंत की शुरुआत कर दी थी. चीन की हिंदुस्तान से जंग ने वामपंथी आंदोलनों की जड़ें हिला दीं, अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी कम्युनिस्ट आंदोलन के विरोधाभास ज़ाहिर होते जा रहे थे और बचपन की ग़ुरबत और कम्युनिस्ट शायरों की बदहाली ने भी शायद साहिर की सोच में कुछ तब्दीली कर दी थी. ख़ैर, जो भी हो उनकी नफ़्सियाती (रोमांटिक) और नज़रियाती (गंभीर) शायरी दोनों ही कमाल की हैं.

दोस्तों का साहिर

साहिर लुधियानवी के वालिद रईस ज़मींदार थे. साहिर ने भी ख़ूब इनाम-ओ-इकराम-ओ-दौलत कमाई और दोस्तों पर ख़ूब ख़र्च भी की. उन्हें महफ़िलें जमाने का शौक रहा. रात भर चलती दावतों में, जिनमें महंगी शराबें और शेर-ओ-सुख़न के दौर होते थे, शरीक होने वाले राजिंदर सिंह बेदी, कृष्ण चन्दर, सरदार जाफ़री और जांनिसार ‘अख़्तर’ जैसे नाम थे. एक और शख़्स जिसका नाम मुक्तिदा हसन निदा था और जो आगे चलकर निदा फ़ाज़ली के नाम से मशहूर हुआ, उसे एक बार किसी दोस्त के साथ साहिर की एक महफ़िल में जाने का मौक़ा मिला. निदा फ़ाज़ली ने अपनी किताब ‘एक जवान मौत’ में इन महफ़िलों ज़बरदस्त ज़िक्र किया है. साहिर को मुसलसल बोलने की आदत थी और अपनी तारीफ़ें सुनना बेहद पसंद था. वो हर किसी शायर का मज़ाक़ उड़ाते और अपने दोस्तों को गालियों से भी ख़ूब नवाज़ते. अपने दोस्तों और नौजवान शायरों को दरबारी की हैसियत से देखने का नज़रिया शायद उन्हें अपने ज़मींदार बाप से विरसे में मिला था.

जांनिसार अख़्तर साहिर के सबसे बड़े दरबारी थे. उनका रहना-खाना-पीना सब साहिर की ज़िम्मेदारी थी और साहिर की हां में हां मिलाना जांनिसार की. बक़ौल निदा, ‘...साहिर को अपनी तन्हाई से डर लगता था और जांनिसार उनके इस ख़ौफ़ को कम करने का माध्यम थे. इसके लिए उन्हें हर महीने एक तयशुदा रक़म भी मिलती थी. साहिर का नाम उन दिनों फिल्मों में सफलता की ज़मानत समझा जाता था. दूसरों की मदद करना उनके लिए मुश्किल न था और जांनिसार सिर्फ़ दोस्त ही नहीं ज़रूरत से ज़्यादा जल्दी शेर लिखने वाले शायर भी थे. साहिर को एक पंक्ति सोचने में जितना समय लगता था, जांनिसार उतने समय में 25 पंक्तियां जोड़ लेते थे. एक तरफ़ ज़रूरत थी, दूसरी ओर दौलत.’

जांनिसार ने अपने दौर में एक फिल्म बनाई थी - बहू बेगम. इस फिल्म के गीत साहिर के नाम पर हैं. ये फिल्म पिट गयी थी और गीतकार जांनिसार की साहिर को लेने की तिजारती मजबूरी को उनकी नाक़ाबिलियत समझा गया. निदा लिखते हैं, ‘जांनिसार तहज़ीबदार आदमी थे और उन्होंने घर की बात को बाहर नहीं निकाला पर एक शेर में कुछ इशारा ज़रूर किया है - ‘शायरी तुझको गंवाया है बहुत दिन हमने.’ अब न जांनिसार हैं और न ही साहिर जो ‘बहू बेगम ‘ के और बाक़ी गीतों का सच बताएं.

तहज़ीब यक़ीनन विरसे में मिलती है, जावेद अख़्तर साहब ने भी कभी इस बात पर से पर्दा नहीं हटाया. और फिर एक दिन किसी बात पर साहिर ने अपने इस ‘दरबारी’ दोस्त को गाली-गलौज करके घर से धक्के देकर बाहर करवा दिया था. उनकी महफ़िल में किसी और शायर की तारीफ करना मानो उन्हें अपनी बेइज़्ज़ती लगती थी और इसी जुर्म के तहत एक बार निदा फ़ाज़ली भी घर से बाहर फिंकवा दिए गए.

अमृता प्रीतम और सुधा मल्होत्रा का साहिर

कोई छह फुट ऊंचे, पीछे की ओर को बाल किये, ऊंची और चौड़ी पेशानी, खुरदुरा चेहरा और आवाज़ में नाक से बोलने का हल्के से पुट वाले साहिर की कई दीवानियां हुईं. रहे वे भी कइयों के दीवाने, पर शादी किसी से नहीं की. सबसे पहला इश्क़ प्रेम चौधरी से हुआ जिसके बाप ने उन्हें लाहौर कॉलेज से ही निकलवा दिया. फिर आयीं इसर कौर. कुछ दिन इश्क़ चला पर यहां भी बात नहीं बनी. अमृता प्रीतम ने अपनी किताब ‘रसीदी टिकट ‘ में अपने इश्क़ को तफ़्सील से बयां किया है. साहिर और अमृता दोनों अलहदा शख़्सियत के इंसान थे. दोनों शायरी के उस्ताद पर जहां साहिर ने अमृता से अपना इश्क़ दुनिया के सामने ज़ाहिर नहीं किया, वहीं अमृता ने कुछ भी न छुपाते हुए ईमानदारी और हिम्मत दिखाई है. उन्होंने बेबाकी से अपने साहिर के प्रति इश्क़ को ज़ाहिर किया है: ‘साहिर घंटों बैठा रहता और बस सिगरेटें फूंकता रहता और कुछ न कहता. उसके जाने के बाद में उन बचे हुए सिगरेटों के टुकड़े संभालकर रख लेती, फिर अकेले में पीती और साहिर के हाथ और होंठ महसूस करती. जब इमरोज़ के बच्चे की मां बनी तो बच्चे के साहिर के जैसे होने की ख़्वाहिश की. एक बार किसी इंटरव्यू में उन्होंने कहा भी कि, ‘अगर इमरोज़ मेरे सर पर छत है तो साहिर मेरा आसमां.’ अमृता ने साहिर का बहुत इंतज़ार किया पर वे नहीं आए.

इसी बीच सुधा मल्होत्रा से भी उन्हें इश्क़ हो गया. आज के पाठक शायद सुधा मल्होत्रा के नाम से आशना न हों - वो 50 -60 के दशक में एक बड़ी मारूफ़ गायिका थीं. सुधाजी का गाया एक गाना है - ‘तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक़ है तुमको. मेरी बात और है मैंने तो मोहब्बत की है...’ इत्तिफ़ाक़ देखिये ये लिखा भी साहिर ही ने था. साहिर इन्हें भी भूल गए.

ये साहिर की एक परेशानी थी कि वे अहम फ़ैसले अकेले नहीं ले पाते थे और उन्हें किसी दोस्त की बहुत ज़रूरत होती. लिहाज़ा, साहिर का हर इश्क़ अधूरा ही रहा. कुछ लोगों का ऐसा भी मानना था कि वे जानकर इश्क़ को अधूरा छोड़ देते थे जिससे अपनी शायरी में दर्द पैदा कर सकें. कमाल की बात ये कि अपनी हर माशूक़ा के लिए वे दीवानेपन की हद तक दीवाने भी थे. जिन चाय के प्यालों में अमृता या सुधा चाय पीती थीं उन्हें किसी को हाथ भी नहीं लगाने देते. उनकी और जांनिसार की दोस्ती ख़त्म होने के पीछे कारण था कि जांनिसार उनकी पुरानी माशूक़ा से राब्ता बढ़ा रहे थे.

सिनेमा का साहिर

लाहौर में छपी ‘तल्ख़ियां’ की शौहरत बंबई तक थी. बंबई में साहिर को प्रेम धवन का सहारा मिला. धवन अपने साथ ले जाकर उन्हें निर्माताओं और संगीतकारों से मिलवाते और इस तरह 1945 में आयी फिल्म ‘दोराहा’ में उन्हें पहला गीत लिखने का मौका मिला

‘मोहब्बत तर्क की मैंने, गिरेबां सी लिया मैंने

ज़माने अब ख़ुश हो ज़हर ये पी लिया मैंने’

पर ये सफ़र इतनी आसानी से बढ़ने वाला नहीं था. साहिर के फ़न को फ़िल्म वाले संजीदगी से नहीं ले रहे थे और साहिर इस बात पर अड़ गये कि लिखेंगे अपनी शर्तों पर और यह भी कि हल्का नहीं लिखेंगे. कभी बात बनती तो कभी बिगड़ जाती पर साहिर अपनी बात पर डटे रहे. आख़िरकार 1951 में एआर कारदार साहब की फिल्म ‘नौजवान‘ में उन्हें सही मायने में पहला ब्रेक मिला. उन्होंने इस फिल्म के सारे गाने लिखे. यहां से साहिर का वक़ार ऊंचा होता चला गया और वे फिल्मों के सफल होने की गारंटी बन गए. इसके बाद 1950-1975 का फिल्मी दौर सिर्फ़ साहिर के नाम हो गया. ‘प्यासा’, ‘फिर सुबह होगी’, ‘फंटूश’, ‘बाज़ी’, ‘काग़ज़ के फूल’, ‘चौदहवीं का चांद’, ‘शगुन’, ‘नया दौर’, ‘काजल’, ‘चंद्रलेखा’, ‘कभी-कभी’ जाने कितनी ऐसी फिल्में बनीं जो साहिर के गीतों और नग़्मों के बिना सोची ही नहीं जा सकती थीं. साहिर इतने हावी हो गए थे कि अगर फिल्म में उनका पसंदीदा संगीतकार नहीं होता तो वे गाने नहीं लिखते.

राज कपूर की एक फिल्म ‘फिर सुबह होगी ‘ जो दोस्तोव्स्की के ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ पर आधिरित थी. इस फिल्म में साहिर की ज़िद पर फ़िल्म के मौसिक़ीकार के तौर पर शंकर-जयकिशन की जगह ख़य्याम को लिया गया. इस बात पर उन्होंने तर्क ये दिया कि शंकर-जयकिशन समाजवाद को ठीक से नहीं समझते. बलदेव राज चोपड़ा और यश चोपड़ा की लगभग सभी फिल्मों के गाने साहिर लुधियानवी ने ही लिखे.

बक़ौल यश चोपड़ा,’ साहिर के गीतों से किसी फिल्म का मेयार ऊंचा हो जाता है. ‘कभी-कभी’ के लिए यश चोपड़ा लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को लेना चाहते थे पर यहां भी साहिर की ही चली और ख़य्याम ने मौसिक़ी दी.

रेडियो सीलोन पर बजते गानों में पहले सिर्फ़ गायक और संगीतकार का ही नाम लिया जाता था. साहिर के आने के बाद गीतकार का भी नाम बोला जाने लगा. उनके असर ने गीतकारों को भी म्यूजिक कंपनी से रॉयल्टी में हक़ दिलवाया. कुछ एक गीतों को अगर छोड़ दें तो पहले वो गीत लिखते थे फिर मौसिक़ी तय होती थी और ये साहिर का ही उरूज था कि बतौर मेहनताना वे संगीतकार से एक रुपया ज़्यादा फ़ीस लेते थे. नसरीन मुन्नी कबीर की किताब ‘सिनेमा के बारे में’ में जावेद कहते हैं कि साहिर वो शख़्स थे जो फ़िल्मी गीतों को नग़्मों के नज़दीक लाये’ और जावेद की नज़र में साहिर और शैलेन्द्र का कोई सानी नहीं था.

मां जी का साहिर

1978 की एक शाम. बिस्तर पर बीमार मां जी का हाथ थामे हुए अब्दुल हई कह रहा है ‘मां जी, अकेले न छोड़ देना, आपने अहद किया है मेरे साथ रहने का’. सरदार बेगम ने अपनी बुझती हुई आंखों से उसकी तरफ़ देखा और कहा, ‘क्यों, एक न दिन तो सबको जाना ही है?’

‘मैं आपके बग़ैर नहीं रह पाऊंगा, तन्हा हो जाऊंगा...’

‘क्यों? अब तो इतने सारे लोग हैं तेरे इर्द-गिर्द, इतना मशहूर है तू. तेरे नाम का हर तरफ़ शोर है. अब कैसी तन्हाई?’

‘मुझे अब भी इस शोर के बीच ट्रेन की गड़गड़ाहट सुनाई देती है. मुझे डर लगता है. वापस अपने घर चलते हैं मां’

मां जी ने शायद प्रेम धवन का गाना, ‘जीना यहां, मरना यहां, इसके सिवा जाना कहां’ गुनगुनाते हुए अब्दुल हई को समझाया होगा और आंखें मूंद ली होंगी.

चलते-चलते

जावेद अख़्तर को उनकी बेरोज़गारी और मुफ़लिसी के दिनों में साहिर ने 200 रुपये दिए थे. बाद में कभी जब साहिर साहब उनसे किसी फिल्म के सेट पर मिलते तो वे कहते कि हालांकि अब वो उनके 200 रुपये लौटा सकते हैं पर देंगे नहीं. ये हंसी-मज़ाक़ का सिलसिला अचानक 25 अक्टूबर, 1980 को बंद हो गया. जब साहिर को दफ़्नाने के बाद जावेद और बाक़ी लोग क़ब्रिस्तान से बाहर आ रहे थे, तो एक शख़्स पीछे से भागता हुआ आया और बोला, ‘जावेद, मैं ख़ाली हाथ घर से आ गया था क़ब्रिस्तान वाला साहिर साहब को दफ़्नाने के पैसे मांग रहा है.’ जावेद ने पूछा ‘कितने?’ तो उसने कहा - ‘200 रुपये.’

यहां एक अजीब इत्तिफ़ाक़ ये भी है कि साहिर का मतलब जादू होता है और जावेद अख़्तर को भी उनके क़रीबी प्यार से जादू ही बुलाते हैं.